ब्रह्म पुराण का आध्यात्मिक, ऐतिहासिक एवं ज्योतिषीय महत्व: इस पवित्र आदिपुराण में केवल धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का ही मार्ग नहीं है, बल्कि यह ज्योतिष शास्त्र, योग और ब्रह्मांड के उत्पत्ति रहस्यों का भी एक विशाल और अद्भुत ज्ञानकोश है।
ब्रह्म पुराण का परिचय और स्वरूप ब्रह्म पुराण हिंदू धर्म के 18 महापुराणों में से एक प्रमुख और सर्वोपरि पुराण है। पुराणों की दी गयी सूची में इसे प्रथम स्थान पर रखा जाता है, इसीलिए कुछ विद्वान इसे ‘पहला पुराण’ या ‘आदिपुराण’ भी मानते हैं। इसमें साकार ब्रह्म की उपासना का विधान है और ‘ब्रह्म’ को सर्वोपरि माना गया है। प्राचीन पवित्र भूमि नैमिषारण्य में महर्षि व्यास के शिष्य सूत मुनि ने यह पुराण एकत्रित ऋषि-वृन्द को सुनाया था। महर्षि व्यास ने इसे सर्वप्रथम लिपिबद्ध किया था।
सम्पूर्ण ‘ब्रह्म पुराण’ के दो भाग हैं, जिनमें कुल २४६ अध्याय और लगभग १०,००० श्लोक हैं। इस पुराण की मुख्य कथा लोमहर्षण सूत जी एवं शौनक ऋषियों के संवाद के माध्यम से वर्णित है, जो प्राचीन काल में स्वयं ब्रह्मा जी ने दक्ष प्रजापति को सुनाई थी।
ग्रंथ में वर्णित प्रमुख विषय
- सृष्टि और भूगोल: सृष्टि का जन्म, जल की उत्पत्ति, भूगोल, पाताल, स्वर्ग, और नरक का निरूपण।
- वंश वर्णन: मनुवंश, सूर्य और चन्द्र वंशों का विस्तार, ययाति या पुरु के वंश–वर्णन से मानव-विकास का इतिहास।
- कथाएँ एवं अवतार: शिव-पार्वती विवाह, कृष्ण लीला, भगवान रामचन्द्र के अवतार की कथा। श्रीकृष्ण-चरित्र की ब्रह्मरूप में विस्तृत व्याख्या होने के कारण ही यह ‘ब्रह्मपुराण’ के नाम से प्रसिद्ध है।
- धर्म और कर्म: विष्णु पूजन, वर्णाश्रम धर्म, श्राद्धकर्म, यमलोक का विवरण और पितरों का तर्पण।
धार्मिक एवं पर्यटन की दृष्टि से महत्व ब्रह्म पुराण का धार्मिक दृष्टि से अत्यन्त महत्त्व है। इसके साथ ही, पर्यटन और तीर्थाटन की दृष्टि से भी यह बहुमूल्य है। इसमें भद्र तीर्थ, पतत्रि तीर्थ, विप्र तीर्थ, भानु तीर्थ, भिल्ल तीर्थ, एकाम्रक क्षेत्र और पुरुषोत्तम क्षेत्र का विस्तार से वर्णन मिलता है। इसमें सांख्य और योग दर्शन की विशद व्याख्या करके मोक्ष–प्राप्ति के उपायों और महाप्रलय के विषय पर गहरा प्रकाश डाला गया है।
कथा विस्तार: सृष्टि की उत्पत्ति से लेकर वंशों के विकास तक
पुराण का आरंभ और ब्रह्म का स्वरूप ब्रह्मपुराण का आरंभ इस कथा के साथ होता है कि प्राचीन काल में नैमिषारण्य में मुनियों का आगमन हुआ। मुनियों की जिज्ञासा पर सूतजी ने ब्रह्म पुराण सुनाना आरंभ किया। सूतजी ने सर्वप्रथम उस ब्रह्म को नमस्कार किया जिसके द्वारा माया से परिपूर्ण यह संसार रचा गया है। वह विष्णु, अविकारी, शुद्ध परमात्म, शाश्वत, सर्वव्यापक, अजन्मा और हिरण्यगर्भ हरि है।
सृष्टि रचना के रूप में पहले महत् तत्त्व उत्पन्न हुआ, फिर अहंकार और पंचमहाभूतों की उत्पत्ति हुई। भगवान् स्वयंभू ने सृष्टि की उत्पत्ति के लिए सबसे पहले ‘नार’ (जल) की उत्पत्ति की और उसमें बीज डाला गया, जिससे एक अंडा निकला। यह अंडा ब्रह्म का ज्ञानकोश था, जिसे भगवान नारायण ने स्वर्ग और पृथ्वी में विभक्त कर दिया। इसके बाद दिशाओं, काल, मन, वाणी, काम, क्रोध और प्रजापतियों (मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, कृतु और वसिष्ठ) की रचना हुई।
मानवी सृष्टि और मनुवंश का विकास ब्रह्मा ने मैथुनी सृष्टि करने का विचार किया और स्वयं के दो भाग किए, जिससे मनु और शतरूपा की उत्पत्ति हुई। मनु और शतरूपा से वीर नाम का पुत्र उत्पन्न हुआ। इसी वंश में ध्रुव जैसे परम तपस्वी और राजा पृथु जैसे चक्रवर्ती सम्राट हुए। राजा पृथु ने अपने परिश्रम से पृथ्वी को अन्नदायिनी और उर्वरा बनाया, जिसके कारण लोग उन्हें साक्षात् विष्णु मानने लगे।
दक्ष प्रजापति और देव-दानव उत्पत्ति प्रजापति दक्ष ने सृष्टि का असीम विस्तार किया। उन्होंने अपनी साठ कन्याओं को ऋषियों को सौंप दिया, जिनसे सम्पूर्ण चल-अचल, देव, दानव, गंधर्व, यक्ष, पशु-पक्षी और वनस्पतियों की उत्पत्ति हुई। महर्षि कश्यप की विभिन्न पत्नियों से अनेक वंश चले:
- अदिति: से 12 पुत्र (आदित्य) उत्पन्न हुए।
- दिति: से हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष जैसे शक्तिशाली दैत्य जन्मे (जिनके वंश में प्रह्लाद और बलि हुए)।
- दनु: से विप्रचित आदि बलशाली दानव उत्पन्न हुए।
- अन्य पत्नियाँ: विनता से गरुड़ और अरुण, कद्रू से सर्प, सुरसा से नाग, सुरभि से गाएं और खसा से यक्ष-राक्षस पैदा हुए।
इन्द्र का छल और मरुद्गणों का जन्म देवताओं और दानवों में संघर्ष बढ़ने पर दिति ने देवों को दंडित करने वाले पुत्र की प्राप्ति के लिए गर्भ धारण किया। इन्द्र ने छल से उस गर्भ के टुकड़े कर दिए, जो बाद में ‘मरुद्गण’ देव कहलाए और इन्द्र के सहायक बने।
सूर्य वंश का आरंभ और विवस्वान की कथा कश्यप मुनि के पुत्र विवस्वान (सूर्य) का विवाह त्वष्टा की पुत्री संज्ञा से हुआ, जिनसे यम और यमुना का जन्म हुआ। सूर्य के तेज को न सह पाने के कारण संज्ञा अपनी प्रतिमूर्ति ‘छाया’ को छोड़कर चली गईं। छाया से सावर्णि मनु और शनैश्चर (शनि ग्रह) का जन्म हुआ। बाद में विवस्वान और संज्ञा के पुनर्मिलन से अश्विनीकुमारों की उत्पत्ति हुई। छाया के पुत्र सावर्णि ही आगे चलकर लोकपाल मनु बने और उन्हीं के वंश (इक्ष्वाकु आदि) से सूर्य-वंश की महान परम्परा आगे बढ़ी।





































