मद्रास हाई कोर्ट ने गोवध के मामले में सुनवाई करते हुए एक बेहद सख्त और ऐतिहासिक निर्देश जारी किया था। न्यायमूर्ति जी.आर. स्वामीनाथन और न्यायमूर्ति वी. लक्ष्मणन की खंडपीठ ने इस महत्वपूर्ण मामले की विस्तार से सुनवाई की थी। इस पीठ ने स्पष्ट निर्देश दिया था कि बकरीद या किसी भी अन्य दिन किसी भी गाय या बछड़े का वध न किया जाए। अदालत का यह आदेश राज्य भर में गोवध को पूरी तरह से प्रतिबंधित करने के मजबूत इरादे से दिया गया था। इसी कड़े निर्देश के बाद राज्य सरकार ने अदालत के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का मन बनाया।
निर्धारित बूचड़खानों और वैध प्रमाण पत्र की अनिवार्यता अदालत ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि पशु वध की प्रक्रिया केवल निर्धारित स्थानों पर ही होनी चाहिए। हाई कोर्ट के अनुसार पशुओं का वध केवल सरकार द्वारा निर्धारित बूचड़खानों में ही किया जा सकता है। इसके अलावा किसी भी पशु के वध के लिए सक्षम अधिकारी का वैध प्रमाण पत्र होना भी पूरी तरह अनिवार्य है। अदालत ने कहा कि बिना उचित प्रमाण पत्र के किसी भी पशु को मारना कानून का सीधा और गंभीर उल्लंघन है। इस व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य अवैध गोवध को रोकना और पशुओं की सुरक्षा को पूरी तरह सुनिश्चित करना है।
संविधान के अनुच्छेद 48 का दिया गया हवाला अपने इस बड़े फैसले को सही ठहराने के लिए मद्रास हाई कोर्ट ने भारतीय संविधान का भी विशेष हवाला दिया। अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 48 का उल्लेख किया जो दुधारू पशुओं के संरक्षण की विशेष रूप से बात करता है। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि गोवध पर प्रतिबंध लगाना ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए बहुत जरूरी है। इसके साथ ही अदालत का मानना था कि दूध उत्पादन को बढ़ाने के लिए भी गायों की रक्षा करना बेहद आवश्यक है। न्यायालय ने इन संवैधानिक और आर्थिक तर्कों के आधार पर ही अपने इस कड़े फैसले की मजबूत नींव रखी थी।
बकरीद और इस्लाम पर अदालत की विशेष टिप्पणी सुनवाई के दौरान मद्रास हाई कोर्ट ने धार्मिक मान्यताओं को लेकर भी एक बेहद महत्वपूर्ण और स्पष्ट टिप्पणी की थी। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि बकरीद के मौके पर गाय की कुर्बानी देना इस्लाम धर्म का अनिवार्य हिस्सा नहीं है। न्यायालय ने यह टिप्पणी उन दावों को खारिज करने के लिए की थी जिनमें गोवध को धार्मिक स्वतंत्रता से जोड़ा जाता है। इस स्पष्टीकरण के जरिए कोर्ट ने साफ कर दिया कि गोवंश की रक्षा धार्मिक नियमों से किसी भी तरह नहीं टकराती है। अदालत की इस विशेष टिप्पणी ने पूरे मामले में एक नया और बेहद संवेदनशील कानूनी आयाम भी जोड़ दिया है।
राज्य सरकार ने गिनाए आदेश के विरोधाभास राज्य सरकार ने हाई कोर्ट के इस पूरे आदेश को व्यावहारिक और कानूनी तौर पर पूरी तरह से विरोधाभासी करार दिया है। सरकार का तर्क है कि जब 1958 का कानून कुछ शर्तों के साथ गोवध की अनुमति देता है, तो पूर्ण प्रतिबंध कैसे लगाया जा सकता है। सरकार के अनुसार हाई कोर्ट का यह आदेश राज्य के स्थापित कानूनों के साथ सीधे तौर पर टकराव की स्थिति पैदा कर रहा है। सरकार ने कहा कि हाई कोर्ट एक तरफ तो कानून की शर्तों का पालन करने को कहता है और दूसरी तरफ वध पर पूर्ण रोक लगा रहा है। इसी असमंजस को दूर करने के लिए राज्य प्रशासन ने शीर्ष अदालत से इस मामले में हस्तक्षेप करने की गुहार लगाई है।
सुप्रीम कोर्ट से मामले को सुलझाने की उम्मीद अब इस पूरे जटिल कानूनी मामले की चाबी देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट के हाथों में आ गई है। राज्य सरकार को पूरी उम्मीद है कि शीर्ष अदालत इस विरोधाभासी फैसले पर अपना स्पष्ट और अंतिम रुख साफ करेगी। सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई यह तय करेगी कि राज्य का 1958 का कानून मान्य होगा या हाई कोर्ट का नया प्रतिबंध लागू रहेगा। यह फैसला भविष्य में पशु संरक्षण और राज्यों के विधायी अधिकारों के लिए एक बहुत बड़ी मिसाल भी बन सकता है। फिलहाल सभी की निगाहें अब सुप्रीम कोर्ट की आगामी सुनवाई और उसके अंतिम फैसले पर पूरी तरह से टिकी हुई हैं।


























































