कपिल सिब्बल ने अच्छी पहल की है सबको उनके साथ जुड़ना चाहिए, राबड़ी देवी से सीबीआई की पूछताछ गलत है… यह दोनों प्रतिक्रियाएं दिल्ली के सीएम और आम आदमी पार्टी के संयोयक अरविंद केजरीवाल की हैं।
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेताओं और कुछ राजनीतिक विश्लेषकों को ने इसके बाद केजरीवाल को उनकी पुरानी बातें याद दिलाई हैं। उन्हें बताया जा रहा है कि किस तरह 10 साल पहले वह इन्हीं नेताओं को सबसे बड़े भ्रष्टाचारी का तमगा देते थे और अब उनसे ही यारी में कोई हिचक नहीं है। लालू और सिब्बल के अलावा केजरीवाल के नए साथी समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव भी हैं, जिनके पिता मुलायम सिंह यादव को लेकर भी वह कठोर शब्दों का इस्तेमाल कर चुके हैं।
राजनीति में दोस्ती और दुश्मनी कभी स्थायी नहीं रही है। भाजपा और कांग्रेस के रिश्ते को अपवाद मान लें तो कभी भी कोई भी दल किसी के साथ गठबंधन या समर्थन को तैयार हो सकता है। चुनावी राजनीति की मजबूरी कहें या सत्ता का अवसरवाद, नए साथी बनाना या पुराने को छोड़ना आम बात है। एक राजनीतिक दल के तौर पर आम आदमी पार्टी के साथ भी यही बात लागू होती है। यदि ऐसा है तो फिर केजरीवाल को लेकर ही सवाल क्यों? दरअसल, इसके पीछे केजरीवाल का ही दिया गया ‘प्रमाणपत्र’ है, जिसे अन्ना आंदोलन और फिर राजनीतिक के शुरुआती दौर में वह बांटा करते थे। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के अगुआ रहे केजरीवाल ने तब लालू यादव और मुलायम सिंह यादव जैसे नेताओं को भ्रष्टाचारी बताकर बेहद हमलावर हुआ करते थे। कपिल सिब्बल को भी उन्होंने यूपीए सरकार के ‘सबसे बड़े भ्रष्टाचारी’ कहकर संबोधित किया था।
जब लालू के संग तस्वीर पर दी थी सफाई
राजनीति में आने के तुरंत बाद आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस के समर्थन से दिल्ली में 49 दिन की सरकार जरूर बनाई, लेकिन ‘नई तरह की राजनीति’ का वादा करके आए अरविंद केजरीवाल ने दूसरे दलों से दूरी बनाए रखी। बाद में किसी नेता का समर्थन किया भी तो उसकी छवि को ध्यान में रखते हुए ही। यही वजह है कि जब नवंबर 2015 में नीतीश कुमार के शपथ ग्रहण समारोह में लालू प्रसाद यादव के साथ केजरीवाल की तस्वीर सामने आई तो उनसे इसी तरह के सवाल किए गए थे। तब केजरीवाल ने सफाई देते हुए हुए कहा था कि वह लालू के भ्रष्टाचार के रिकॉर्ड के खिलाफ हैं। उन्होंने यह भी कहा था कि असल में लालू ने ही उनसे हाथ मिलाया और खींचकर गले लगा लिया, हाथ पकड़कर उठा दिया।
अब खुलकर दोस्ती की क्या वजह?
पिछले एक दशक में दिल्ली के बाद पंजाब जीत चुकी ‘आप’की नजरें दूसरे राज्यों के साथ राष्ट्रीय राजनीति में प्रमुख स्थान हासिल करना है। खुद को कांग्रेस का विकल्प और बीजेपी के सामने एकमात्र चुनौती के रूप में पेश करने की कोशिश में पार्टी ने कई दलों को साथ लेना शुरू किया है। हाल के दिनों में तेलंगाना के सीएम के चंद्रशेखर राव, सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव, झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेता हेमंत सोरेन, बिहार के डेप्युटी सीएम तेजस्वी यादव जैसे नेताओं के साथ उनकी मुलाकातों को 2024 की तैयारी के रूप में देखा जा रहा है। इस बीच दिल्ली के शराब घोटाले में केंद्रीय जांच एजेंसियों के ऐक्शन ने ‘आप’ को उन दलों के साथ ला दिया है जिनके नेताओं के खिलाफ सीबीआई और ईडी की पड़ताल चल रही है। इन दलों का कहना है कि केंद्र सरकार जांच एजेंसियों का दुरुपयोग करते हुए विपक्षी पार्टियों को परेशान कर रही है। पहले लालू के छोटे बेटे तेजस्वी यादव ने सिसोदिया की गिरफ्तारी के मुद्दे पर ‘आप’ का साथ देते हुए पीएम मोदी को लेटर लिखा तो अगले ही दिन राबड़ी के आवास पर सीबीआई की टीम पहुंची तो केजरीवाल ने इसे विपक्ष को प्रताड़ित करने की कोशिश बताया। वरिष्ठ वकील और कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने ‘इंसाफ के सिपाही’ नाम से मुहिम शुरू करते हुए विपक्षी दलों को कथित प्रताड़ना से मुक्ति दिलाने के लिए लड़ाई की बात कही तो केजरीवाल ने उनके समर्थन में देरी नहीं की।
बीजेपी ने पुरानी बातें याद दिला की घेराबंदी
एक तरफ जहां केजरीवाल आरजेडी और सपा जैसे दलों से नजदीकी बढ़ा रहे हैं तो दूसरी तरफ भाजपा उन्हें पुरानी बातें याद दिलाकर घेराबंदी में जुट गई है। बीजेपी के सांसद परवेश वर्मा ने विपक्षी दलों की ओर से पीएम मोदी को लिखे गए लेटर को साझा करते हुए ट्विटर पर लिखा, ‘आज जिनसे चिट्ठी लिखवा रहे हैं, ये वही नेता और परिवार हैं जिन पर अरविंद केजरीवाल जी ने खुद एक समय पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे।’ वहीं, कपिल सिब्बल के समर्थन में केजरीवाल के बयान पर आप संयोजक के पुराने ट्वीट और बयान दिखाकर बीजेपी ने तीखी टिप्पणी की। सांसद ने लिखा, ‘एक साथ सभी भ्रष्टाचारी मिले और भ्रष्टाचारी चोरों को जेल से छुड़वाने के अभियान में जुट गए।’





























