उत्तर प्रदेश की राजनीति में काबीना विस्तार के 6 दिन बीत जाने के बाद भी मंत्रियों को उनके विभागों का प्रभार न मिलना एक बड़ा मुद्दा बन गया है। इस मुद्दे को लेकर समाजवादी पार्टी यानी सपा सरकार की कार्यप्रणाली पर लगातार तीखे तंज कस रही है और घेराबंदी में जुटी है। दूसरी तरफ सत्ताधारी दल बीजेपी इस पूरे मामले में रक्षात्मक रवैया अपनाते हुए पूरी तरह से बचाव की मुद्रा में नजर आ रही है। विभागों की इस खींचतान के बीच भारतीय जनता पार्टी के बड़े नेताओं के दिल्ली से लखनऊ तक के लगातार दौरे और बैठकें जारी हैं। सरकार के इस फैसले में हो रही देरी के कारण नए मंत्रियों के समर्थकों को भी अपने विभागों का काफी बेसब्री से इंतजार है।
शीर्ष नेतृत्व के साथ बैठकें: विभागों के इस बड़े सस्पेंस को खत्म करने के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने खुद कमान संभालते हुए दिल्ली में वरिष्ठ नेताओं से संवाद स्थापित किया था। बीते दिनों मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने देश के गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात कर उत्तर प्रदेश के राजनीतिक हालात और काबीना विस्तार पर चर्चा की थी। इसके बाद उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के साथ भी एक बेहद अहम और लंबी बैठक को अंजाम दिया था। इन दोनों शीर्ष नेताओं से मुलाकात के बाद राजनीतिक हलकों में यह कयास लगाए जा रहे थे कि अब मंत्रियों की सूची तुरंत फाइनल हो जाएगी। परंतु इन मुलाकातों को बीते भी अब दो दिन होने को हैं और संशय की स्थिति लगातार वैसी ही बनी हुई है।
मिशन 2027 पर टिकी नजर: उत्तर प्रदेश सचिवालय और राजनीतिक सूत्रों की मानें तो भारतीय जनता पार्टी का पूरा ध्यान इस समय साल 2027 में होने वाले उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव पर ही टिका हुआ है। बीजेपी आगामी चुनाव को पूरी तरह से ध्यान में रखते हुए ही इस बार मंत्रियों के बीच सभी महत्वपूर्ण विभागों का आवंटन करना चाहती है। पार्टी अपने वोट बैंक और आम जनता में यह संदेश कतई नहीं देना चाहती कि यह कैबिनेट विस्तार सिर्फ तात्कालिक चुनावी और सियासी समीकरण को साधने के लिए किया गया है। इसी रणनीतिक सोच के कारण पार्टी का केंद्रीय और प्रांतीय नेतृत्व विभागों के चयन में किसी भी प्रकार की जल्दबाजी दिखाने के मूड में बिल्कुल नहीं है।
भूपेंद्र चौधरी और सुरेंद्र दिलेर: भारतीय जनता पार्टी की इस नई प्रशासनिक और राजनीतिक रणनीति के तहत उन विशेष लोगों को अच्छे और बड़े विभाग देने की योजना बनाई गई है। इसके तहत बीजेपी, अपनी यूपी इकाई के पूर्व अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी को सरकार के भीतर कोई बहुत अच्छा और बड़ा विभाग सौंपना चाहती है। इसके साथ ही पार्टी सुरेंद्र दिलेर को भी मंत्रिमंडल में एक मजबूत और प्रभावशाली विभाग की जिम्मेदारी देने की पूरी तैयारी में लगी हुई है। इन दोनों बड़े नेताओं को महत्वपूर्ण विभाग सौंपने के पीछे पार्टी का असली मकसद साल 2027 के चुनाव के लिहाज से पूरे पश्चिमी यूपी क्षेत्र में अपनी स्थिति को पहले से और अधिक मजबूत करना है।
ब्राह्मणों को साधने की कोशिश: पश्चिमी यूपी के साथ-साथ बीजेपी का मुख्य फोकस इस बार समाजवादी पार्टी यानी सपा से बगावत करके आए नेताओं को सरकार में उचित स्थान और मान-सम्मान देना भी है। इसी कड़ी में बीजेपी, सपा के बागियों में से एक प्रमुख चेहरे मनोज पांडेय को भी काबीना में एक बहुत अच्छा विभाग देने का पूरा मन बना चुकी है। इस बड़े फैसले के जरिए वह न सिर्फ उत्तर प्रदेश के ब्राह्मण समाज के बीच अपनी पैठ और पकड़ को मजबूत करेगी, बल्कि इसके साथ ही वह रायबरेली जिले में अपना एक और बड़ा और कद्दावर नेता स्थापित करने की कोशिश में जुटी हुई है।
मंत्रियों की नाराजगी का डर: रायबरेली संसदीय क्षेत्र वर्तमान में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बड़े नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का अपना मुख्य राजनीतिक गढ़ माना जाता है। इस वीआईपी क्षेत्र में बीजेपी आगामी चुनाव के नजरिए से मनोज पांडेय पर कोई भी ऐसा जल्दबाजी का फैसला नहीं करना चाहती जो सिर्फ कोरम पूरा करने जैसा दिखाई दे। रायबरेली में अभी बीजेपी के पास अदिति सिंह विधायक के रूप में हैं, तो वहीं दिनेश प्रताप सिंह राज्य मंत्री के तौर पर कार्यरत हैं। अब समस्या यह है कि ये अच्छे विभाग इस समय जिन मौजूदा मंत्रियों के पास हैं, उनसे विभाग वापस लेने पर उनके नाराज होने का खतरा है, इसलिए बीजेपी ‘देर आए, दुरुस्त आए’ वाले मोड में काम कर रही है।





































