पुलिस की जांच में मुख्य आरोपी सत्यम मिश्रा के आपराधिक जीवन का अहम खुलासा हुआ है। आर्थिक तंगी के कारण उसने अपनी इंटरमीडिएट की पढ़ाई बीच में ही मजबूरी में छोड़ दी थी। शुरुआत में उसने एक पेंटर के रूप में और बाद में कमर्शियल ड्राइवर के तौर पर काम किया। साल 2018 में उसे गांजे की बुरी लत लग गई और वह इस काले धंधे में पूरी तरह उतर गया। उसने अपने भाई शुभम मिश्रा के साथ मिलकर एक बड़ा संगठित नेटवर्क बड़ी चालाकी से बना लिया।
गिरोह का काम करने का तरीका: जांच में पता चला है कि इस गिरोह के सदस्यों ने अपना काम बहुत व्यवस्थित रूप से बांट रखा था। सत्यम मिश्रा और शुभम मिश्रा मुख्य रूप से पार्सल की पैकेजिंग का काम सावधानी से संभालते थे। राहुल झा पार्सल की बुकिंग और उन्हें सही पते पर भेजने का महत्वपूर्ण काम करता था। अवैध ड्रग्स के ऑर्डर मुख्य रूप से वॉट्सऐप और दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के जरिए लिए जाते थे। ड्रग्स के बदले मिलने वाला सारा पेमेंट आधुनिक यूपीआई नेटवर्क के माध्यम से सुरक्षित प्राप्त किया जाता था।
हजारों ग्राहकों का नेटवर्क: इस खतरनाक सिंडिकेट की पहुंच देश की आर्थिक राजधानी तक बहुत गहराई से फैल चुकी थी। मुंबई में इस ग्रुप का कथित तौर पर एक हजार से ज्यादा रेगुलर ग्राहकों का एक मजबूत नेटवर्क था। झारखंड से ट्रेन के जरिए भारी मात्रा में गांजे की बड़ी खेप लगातार मंगाई जाती थी। इस अवैध खेप को सचिन मिश्रा और संतोष पंडित के घरों में बहुत ही सुरक्षित तरीके से रखा जाता था। बाद में इसे लोकल लेवल पर बांटने के लिए छोटी पुड़ियों में दोबारा पैक करने का काम किया जाता था।
कोड वर्ड का इस्तेमाल: आरोपियों ने पुलिस और एजेंसियों की नजरों से बचने के लिए एक बहुत ही खास योजना बनाई थी। वे ड्रग्स की अलग-अलग मात्रा के लिए विशेष प्रकार के गुप्त शब्दों का प्रयोग बड़ी चालाकी से करते थे। गांजे का आदी हो चुका ग्राहक ऑर्डर देते समय माल के लिए “मैंगो” जैसे कोड वर्ड का इस्तेमाल करता था। इसके अलावा सिंडिकेट द्वारा “स्टिक” और “फ्लावर” जैसे शब्दों का भी जमकर प्रयोग किया जाता था। इन कोड वर्ड्स की वजह से किसी को उनके असली और गैरकानूनी माल की भनक बिल्कुल नहीं लग पाती थी।
काले धन का निवेश: पुलिस ने इस गिरोह के वित्तीय लेन-देन को लेकर भी कई अहम और चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। सत्यम मिश्रा ड्रग्स के धंधे से हुई भारी काली कमाई को अपने महंगे शौक पूरे करने में लगाता था। उसने इस अवैध पैसे को सोने और महंगी गाड़ियों की खरीदारी में जमकर और बिना किसी डर के निवेश किया। पैसों को छिपाने के लिए वह कई अलग-अलग बैंक अकाउंट और यूपीआई आईडी का इस्तेमाल करता था। उसने पैसे डायवर्ट करने के लिए अपनी मां के बैंक अकाउंट का भी बेहद गैरकानूनी तरीके से इस्तेमाल किया।
निगरानी और सख्त कार्रवाई: इस बड़े खुलासे के बाद पुलिस और प्रशासन पूरी तरह से सतर्क होकर आगे की कार्रवाई कर रहे हैं। हैदराबाद पुलिस ने पोस्टल और कूरियर चैनलों की निगरानी पहले के मुकाबले काफी ज्यादा बढ़ा दी है। इस सिंडिकेट के फरार चल रहे बाकी चार सदस्यों का पता लगाने की कोशिशें भी लगातार जारी हैं। विभिन्न राज्यों की पुलिस के साथ मिलकर एक मजबूत अभियान चलाने की पूरी तैयारी की जा रही है। भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए पार्सल स्क्रीनिंग की खामियों को भी जल्द दूर किया जाएगा।





































