New York में हुई आत्मदाह की यह हालिया घटना तिब्बती स्वतंत्रता आंदोलन का एक बहुत ही चरम और दुखद रूप है। मौके से मिला ‘China Out Of Tibet’ का पर्चा इस विरोध प्रदर्शन की मुख्य वजह को दर्शाता है। यह नारा और यह पूरी घटना सीधे तौर पर ‘फ्री तिब्बत कैंपेन’ समूह से जुड़ी हुई मानी जाती है। यह समूह लंबे समय से तिब्बत की आजादी और मानवाधिकारों के लिए वैश्विक स्तर पर संघर्ष कर रहा है। इस दर्दनाक घटना ने पूरी दुनिया का ध्यान एक बार फिर से इस पुराने विवाद की ओर खींच लिया है।
आत्मदाह का लंबा और दुखद इतिहास: ‘फ्री तिब्बत कैंपेन’ समूह के आंकड़ों के मुताबिक आत्मदाह की यह कोई पहली घटना बिल्कुल नहीं है। रिपोर्ट के अनुसार मार्च 2009 से लेकर अब तक तिब्बत के अंदर डेढ़ सौ से ज्यादा लोग ऐसा कर चुके हैं। इन सभी लोगों ने चीनी कब्जे और ज्यादतियों के खिलाफ अपनी जान देकर भारी विरोध दर्ज कराया है। इतनी बड़ी संख्या में लोगों का यह कदम उठाना वहां की गंभीर और तनावपूर्ण स्थिति को उजागर करता है। चीनी सरकार की कठोर नीतियों के खिलाफ तिब्बती लोग लंबे समय से इसी तरह अपना आक्रोश व्यक्त करते आ रहे हैं।
प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांगें: इन आत्मदाह की घटनाओं के दौरान कई प्रदर्शनकारियों ने लगातार अपनी विभिन्न मांगें और नारे बुलंद किए हैं। वे आग की लपटों में घिरने के बावजूद अक्सर Dalai Lama की लंबी उम्र की कामना के नारे लगाते हैं। इसके साथ ही वे उनकी तिब्बत वापसी और Panchen Lama की जल्द रिहाई की जोरदार मांग भी करते रहे हैं। तिब्बत में मानवाधिकारों की रक्षा और पूरी स्वतंत्रता उनके इस कड़े संघर्ष का सबसे अहम हिस्सा है। इन लोगों का सर्वोच्च बलिदान सिर्फ अपने देश की धार्मिक और राजनीतिक आजादी को फिर से हासिल करने के लिए है।
चीनी प्रशासन का सख्त रवैया: ‘फ्री तिब्बत कैंपेन’ समूह की आधिकारिक वेबसाइट पर चीनी प्रशासन के सख्त और अमानवीय रवैये की जानकारी दी गई है। वेबसाइट के अनुसार इन प्रदर्शनकारियों की मदद करने या उन्हें प्रोत्साहित करने वाले लोगों को बेहद सख्त सजा दी जाती है। यहां तक कि इस पूरे आंदोलन से जुड़ी जानकारी विदेश में साझा करने वालों पर भी कठोर कार्रवाई होती है। यह सख्त नियम आंदोलन की आवाज को पूरी तरह से दबाने और दुनिया से छिपाने के लिए बनाए गए हैं। इसके बावजूद यह स्वतंत्रता आंदोलन तिब्बत को आजादी दिलाने और Dalai Lama को सत्ता सौंपने की मांग पर डटा हुआ है।
तिब्बत पर चीनी कब्जे की शुरुआत: तिब्बत के इस पूरे विवाद और संघर्ष की असली जड़ ऐतिहासिक दस्तावेजों और पुरानी घटनाओं में मौजूद है। इतिहास के पन्नों के अनुसार साल 1951 में एक विवादास्पद 17 सूत्रीय समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे। इसी समझौते के ठीक बाद China की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने पहली बार तिब्बत की सीमा में प्रवेश किया था। चीनी प्रशासन ने उस समय दुनिया के सामने इसे एक शांतिपूर्ण संक्रमण का माध्यम बताने का प्रयास किया था। लेकिन तिब्बती लोग इसे अपनी मातृभूमि पर एक जबरन और अवैध सैन्य कब्जे की शुरुआत के रूप में देखते हैं।
पहले की स्वतंत्र प्रशासनिक व्यवस्था: साल 1951 से पहले तिब्बत की अपनी एक बिल्कुल अलग और पूरी तरह से स्वतंत्र पहचान कायम थी। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के नियंत्रण से पहले तिब्बत में वास्तविक रूप से पूर्ण स्वायत्तता मौजूद थी। उस समय वहां अपनी खुद की एक अलग और सुचारू रूप से चलने वाली प्रशासनिक व्यवस्था काम करती थी। चीनी हस्तक्षेप के बाद उस पारंपरिक व्यवस्था और पुरानी स्वतंत्रता को पूरी तरह से कुचल कर रख दिया गया। आज का यह पूरा संघर्ष उसी खोई हुई व्यवस्था और स्वायत्तता को वापस पाने की एक बड़ी और लंबी लड़ाई है।





































