सावन का पवित्र महीना मुख्य रूप से भगवान शिव की आराधना के लिए जाना जाता है, परंतु इस माह में पड़ने वाले मंगलवार का भी अपना विशेष धार्मिक महत्व है। सावन के मंगलवार को ‘मंगला गौरी व्रत’ के रूप में मनाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह व्रत सुहागिन महिलाओं को अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद देता है, जबकि अविवाहित कन्याओं को सुयोग्य जीवनसाथी की प्राप्ति होती है। आइए जानते हैं साल 2026 में मंगला गौरी व्रत की प्रमुख तिथियां, इसका महत्व और पूजा की सही विधि।
सावन में मंगलवार का विशेष महत्व
वर्ष 2026 में सावन माह का शुभारंभ जल्द ही होने जा रहा है। पूरे सावन महीने में जहां भगवान शिव का रुद्राभिषेक और जलाभिषेक किया जाता है, वहीं माता पार्वती की उपासना के लिए मंगलवार का दिन अत्यंत खास माना गया है। सावन के सोमवार जितने फलदायी होते हैं, मंगलवार को रखा जाने वाला मंगला गौरी व्रत भी उतना ही कल्याणकारी माना जाता है।
मंगला गौरी व्रत क्यों रखा जाता है?
पौराणिक कथाओं के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को अपने पति के रूप में प्राप्त करने के लिए सावन माह में ही मंगला गौरी का कठोर व्रत किया था। इसी कारण सावन के प्रत्येक मंगलवार को यह व्रत रखने की परंपरा है। सुहागिन महिलाएं अपने पति की दीर्घायु और सुखमय दांपत्य जीवन के लिए यह व्रत करती हैं, जबकि कुंवारी कन्याएं मनचाहे वर की प्राप्ति के लिए माता गौरी की आराधना करती हैं।
सावन 2026: मंगला गौरी व्रत की तिथियां
साल 2026 के सावन माह में कुल चार मंगला गौरी व्रत रखे जाएंगे। इन व्रतों की महत्वपूर्ण तिथियां इस प्रकार हैं:
- पहला मंगला गौरी व्रत: 4 अगस्त 2026
- दूसरा मंगला गौरी व्रत: 11 अगस्त 2026
- तीसरा मंगला गौरी व्रत: 18 अगस्त 2026
- चौथा मंगला गौरी व्रत: 25 अगस्त 2026
व्रत का धार्मिक महत्व
- अखंड सौभाग्य: सुहागिन महिलाओं को इस व्रत के प्रभाव से सुख-समृद्धि और खुशहाल वैवाहिक जीवन का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
- विवाह की बाधाएं दूर: अविवाहित कन्याओं के विवाह में आ रही अड़चनें समाप्त होती हैं और सुयोग्य वर मिलने के योग बनते हैं।
- मंगल दोष निवारण: सच्ची श्रद्धा से किया गया यह व्रत कुंडली में मौजूद मंगल दोष के नकारात्मक प्रभावों को कम करने में भी अत्यंत लाभकारी माना जाता है।
- संतान सुख: इस व्रत को संतान प्राप्ति की कामना पूर्ण करने के लिए भी बेहद शुभ माना गया है।
मंगला गौरी व्रत की पूजा विधि
इस व्रत का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए विधि-विधान से पूजा करना आवश्यक है:
- संकल्प: व्रत वाले दिन प्रातः काल उठकर स्नान करें, स्वच्छ वस्त्र धारण करें और माता का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें।
- प्रतिमा स्थापना: घर के पूजा स्थल पर एक साफ चौकी पर लाल रंग का कपड़ा बिछाएं और उस पर भगवान शिव तथा माता पार्वती की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें।
- पूजन: माता गौरी को सिंदूर, धूप, दीप, ताजे पुष्प और नैवेद्य अर्पित करें।
- सुहाग सामग्री: माता को सुहाग का सामान चढ़ाना सबसे महत्वपूर्ण है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, पूजा में इस्तेमाल होने वाली सुहाग सामग्री और पूजन की वस्तुएं 16 की संख्या में रखना अत्यंत शुभ होता है।
- कथा व आरती: पूजा के अंत में मंगला गौरी व्रत की कथा का पाठ अवश्य करें और माता गौरी की आरती उतारकर पूजा को विधिवत रूप से संपन्न करें।





































