जापान के आइची-नागोया में आयोजित एशियन गेम्स 2026 में 26 सितंबर का दिन भारतीय एथलेटिक्स के लिए ऐतिहासिक बन गया। भारतीय सेना के 28 वर्षीय धावक सावन बरवाल ने पुरुष मैराथन में रजत पदक जीतकर भारत को इस स्पर्धा में 44 साल बाद पदक दिलाया। बरवाल ने 42.195 किलोमीटर की दौड़ 2 घंटे 11 मिनट 37 सेकंड में पूरी की और इसी के साथ नया राष्ट्रीय रिकॉर्ड भी कायम किया। यह एशियन गेम्स की पुरुष मैराथन स्पर्धा में भारत का 1982 के बाद पहला पदक है। इससे पहले भारत ने इस स्पर्धा में 1982 के दिल्ली एशियाई खेलों में कांस्य पदक जीता था। बरवाल का यह प्रदर्शन इसलिए भी खास रहा क्योंकि उन्होंने एशियाई खेलों की मैराथन में पदक जीतने की पुरानी भारतीय परंपरा को विदेशी धरती पर फिर से जीवित किया।
गोल्ड से महज 48 सेकंड दूर: पुरुष मैराथन में जापान के इचिताका यामाशिता ने 2 घंटे 10 मिनट 49 सेकंड के समय के साथ स्वर्ण पदक अपने नाम किया और सावन बरवाल से 48 सेकंड आगे रहे। चीन के पेइयू फेंग ने 2 घंटे 12 मिनट 13 सेकंड में दौड़ पूरी कर कांस्य पदक हासिल किया। बरवाल ने शुरुआत से ही अग्रणी धावकों के समूह में अपनी जगह बनाए रखी और दौड़ आगे बढ़ने के साथ पदक की स्थिति मजबूत करते गए। अंतिम चरण में यामाशिता ने बढ़त बनाई, लेकिन बरवाल ने अपनी रफ्तार बनाए रखते हुए दूसरा स्थान सुरक्षित रखा। इस रजत पदक के साथ वह एशियाई खेलों की मैराथन में पदक जीतने वाले भारत के चौथे पुरुष धावक बन गए हैं। इससे पहले 1951 के पहले एशियाई खेलों में छोटा सिंह ने स्वर्ण और सूरत सिंह माथुर ने कांस्य पदक जीता था, जबकि 1982 में होसुर कुक्काप्पा सीतारन ने कांस्य पदक हासिल किया था।
पुराना राष्ट्रीय रिकॉर्ड भी टूटा: सावन बरवाल ने नागोया में 2 घंटे 11 मिनट 37 सेकंड का समय निकालकर अपना ही राष्ट्रीय रिकॉर्ड बेहतर कर दिया। इससे पहले उन्होंने अप्रैल 2026 में रॉटरडम मैराथन में 2 घंटे 11 मिनट 58 सेकंड का समय निकालकर 48 साल पुराने राष्ट्रीय रिकॉर्ड को तोड़ा था। वह रिकॉर्ड महान भारतीय धावक शिवनाथ सिंह के नाम था, जिन्होंने 1978 में 2 घंटे 12 मिनट का समय दर्ज किया था। रॉटरडम में बरवाल की वह मैराथन उनकी पहली प्रतिस्पर्धी मैराथन थी और उसी प्रदर्शन से उन्होंने एशियाई खेलों के लिए अपनी जगह पक्की की थी। अब नागोया में उन्होंने अपने ही रिकॉर्ड में 21 सेकंड का सुधार करते हुए नया राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाया है। इससे पहले बरवाल मुख्य रूप से 5000 मीटर, 10000 मीटर और हाफ मैराथन जैसी स्पर्धाओं में हिस्सा लेते रहे थे और इसी साल मैराथन में आने के बाद इतनी कम अवधि में राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना ली।
पदक को बनाया था प्राथमिक लक्ष्य: रजत पदक जीतने के बाद सावन बरवाल ने कहा कि उनका मुख्य लक्ष्य पदक जीतना था, केवल अपना रिकॉर्ड सुधारना नहीं। उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनने पर उन्हें खुशी है, लेकिन देश के लिए इतने लंबे अंतराल के बाद पदक जीतना उनके लिए ज्यादा महत्वपूर्ण है। दौड़ की रणनीति के बारे में उन्होंने बताया कि उनका प्रयास लगभग 39.40 किलोमीटर तक पहले समूह के साथ बने रहने का था। वह इस रणनीति में सफल रहे और अंतिम एक-दो किलोमीटर में अपनी स्थिति के अनुसार फिनिश करने का फैसला किया। उन्होंने पूरी दौड़ के दौरान रफ्तार को यथासंभव एक जैसा बनाए रखने की कोशिश की। इस रणनीति का परिणाम यह रहा कि कठिन अंतिम चरण में भी वह पदक की स्थिति से बाहर नहीं हुए और राष्ट्रीय रिकॉर्ड के साथ रजत पदक अपने नाम किया।
ट्रैक से मैराथन तक का सफर: सावन बरवाल का मैराथन तक पहुंचने का सफर भी काफी दिलचस्प रहा है। उनका अधिकांश शुरुआती करियर ट्रैक स्पर्धाओं में बीता, लेकिन लंबी दूरी की दौड़ में उनकी सहनशक्ति को देखते हुए मैराथन की ओर उनका रुख हुआ। 2026 में रॉटरडम में पहली प्रतिस्पर्धी मैराथन दौड़ते हुए उन्होंने शिवनाथ सिंह का 48 साल पुराना रिकॉर्ड तोड़ दिया और इसके बाद एशियाई खेलों में भारत का प्रतिनिधित्व करने का अवसर मिला। एशियाई खेलों में नागोया की मैराथन उनकी दूसरी प्रतिस्पर्धी मैराथन रही और इसी में उन्होंने राष्ट्रीय रिकॉर्ड को फिर बेहतर कर दिया। विश्व एथलेटिक्स के रिकॉर्ड के अनुसार रॉटरडम में उनका पिछला सर्वश्रेष्ठ समय 2 घंटे 11 मिनट 58 सेकंड था, जिसे अब उन्होंने नागोया में पीछे छोड़ दिया है।
परिवार और सेना से जुड़ा सफर: हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले से आने वाले सावन बरवाल का पारिवारिक और खेल जीवन भी संघर्ष और मेहनत से जुड़ा रहा है। उनके पिता दिल्ली में चालक के रूप में काम करते थे, जबकि उनकी मां सुभद्रा देवी गृहिणी हैं। बरवाल 2019 में खेल कोटे के जरिए अपने भाई के साथ भारतीय सेना में शामिल हुए थे और सेना में रहते हुए उनकी खेल प्रतिभा को आगे बढ़ने का अवसर मिला। राष्ट्रीय रिकॉर्ड से लेकर एशियाई खेलों के पदक तक का उनका सफर बहुत कम समय में तेजी से आगे बढ़ा है। नागोया में मिला रजत पदक न केवल उनके व्यक्तिगत करियर की बड़ी उपलब्धि है, बल्कि एशियाई खेलों की मैराथन में भारत के 44 साल लंबे पदक इंतजार को खत्म करने वाला प्रदर्शन भी है।














































