सीबीएसई द्वारा अगस्त के महीने में निकाले गए मूल टेंडर के दस्तावेजों में नियम उल्लंघन पर बेहद सख्त कार्रवाई का स्पष्ट प्रावधान था। अट्ठाईस अगस्त दो हजार पच्चीस को जारी किए गए इस शुरुआती टेंडर में कंपनी को ब्लैकलिस्ट करने का नियम मुख्य रूप से शामिल था। टेंडर की शर्तों के अनुसार, किसी भी प्रकार की गंभीर लापरवाही होने पर समिति सीधे कंपनी को कारण बताओ नोटिस जारी कर सकती थी। ऐसे मामलों में समिति के पास कंपनी की परफॉर्मेंस बैंक गारंटी को पूरी तरह से जब्त करने का एक विशेष और कड़ा अधिकार था। इसके अलावा बार-बार नियमों का उल्लंघन होने पर कंपनी को काली सूची में डालने और अनुबंध समाप्त करने की मजबूत व्यवस्था भी थी।
संशोधन से हटाया क्लॉज मूल टेंडर जारी होने के कुछ ही समय बाद नियमों में एक बहुत ही विवादास्पद और चौंकाने वाला बड़ा बदलाव कर दिया गया। बीस सितंबर दो हजार पच्चीस को सीबीएसई के अधिकारियों ने टेंडर के नियमों में एक नया संशोधन या कोरिजेंडम अचानक जारी किया। इस नए संशोधन के जरिए सबसे कड़े नियम यानी कंपनी को ब्लैकलिस्ट करने के अहम प्रावधान को टेंडर से पूरी तरह हटा दिया गया। इस बदलाव के बाद आर्थिक जुर्माना और सिक्योरिटी डिपॉजिट जब्त करने जैसे कुछ पुराने प्रावधान तो पहले की ही तरह बिल्कुल बने रहे। लेकिन ब्लैकलिस्ट करने का सबसे बड़ा अधिकार हटा दिए जाने से इस पूरी टेंडर प्रक्रिया की पारदर्शिता पर बहुत बड़े सवाल खड़े हो गए।
दिसंबर में मिला ठेका नियमों में यह बड़ा बदलाव करने के कुछ ही महीनों बाद टेंडर आवंटन की इस पूरी विवादित प्रक्रिया को अंतिम रूप दे दिया गया। पांच दिसंबर दो हजार पच्चीस को कोएम्प्ट एडू टेक को यह महत्वपूर्ण ठेका आधिकारिक और कानूनी तौर पर पूरी तरह से दे दिया गया। ब्लैकलिस्टिंग का नियम हटने के बाद इस कंपनी ने लाखों छात्रों की कॉपियों के मूल्यांकन का यह बड़ा कॉन्ट्रैक्ट अपने नाम कर लिया। नियम बदलने के इस पूरे खेल ने कंपनी को भविष्य में होने वाली किसी भी बड़ी कानूनी कार्रवाई से एक तरह की सुरक्षा दे दी। इसी के बाद से इस पूरे कॉन्ट्रैक्ट पर विवाद शुरू हो गया और अधिकारियों की कार्यप्रणाली भी शक के घेरे में पूरी तरह आ गई।
पंद्रह मिनट पर जुर्माना अनुबंध में कंपनी पर नकेल कसने के लिए ब्लैकलिस्टिंग की जगह सिर्फ भारी आर्थिक दंड लगाने की व्यवस्था को ही लागू किया गया है। वर्तमान नियमों के तहत अलग-अलग गलतियों और देरी के लिए कंपनी पर लाखों रुपये का भारी भरकम आर्थिक जुर्माना लगाया जा सकता है। अनुबंध में यह स्पष्ट किया गया है कि सीबीएसई द्वारा चिह्नित गंभीर मुद्दों के समाधान में होने वाली देरी पर भारी फाइन देना होगा। इन गंभीर तकनीकी मुद्दों को सुलझाने में प्रत्येक पंद्रह मिनट की देरी होने पर कंपनी पर एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया है। यह जुर्माना सिस्टम की सुरक्षा और कामकाज की निरंतरता को सुनिश्चित करने के लिए एक आर्थिक दबाव के रूप में ही शामिल किया गया है।
रिपोर्ट में देरी पर सजा सिस्टम में आई तकनीकी खामियों को सुधारने के अलावा रिपोर्ट सौंपने में होने वाली देरी के लिए भी कड़े जुर्माने का प्रावधान रखा गया है। नियमों के अनुसार मूल कारण विश्लेषण और सुधारात्मक कार्य योजना की पूरी रिपोर्ट तय समय सीमा के भीतर प्रस्तुत करना कंपनी के लिए अनिवार्य है। यदि कंपनी इस महत्वपूर्ण सुधारात्मक रिपोर्ट को प्रस्तुत करने में किसी भी प्रकार की विफलता दिखाती है तो उसे भारी दंड भुगतना होगा। इस रिपोर्ट को सौंपने में प्रत्येक साठ मिनट की देरी होने पर कंपनी पर सीधे तौर पर एक लाख रुपये का जुर्माना लागू होता है। इस नियम का मुख्य उद्देश्य कंपनी की जवाबदेही तय करना और सिस्टम की खामियों को जल्द से जल्द दूर करवाना सुनिश्चित करना है।
सुरक्षा राशि और कार्रवाई भले ही वर्तमान नियमों के अनुसार इस विवादित कंपनी को किसी भी स्थिति में हमेशा के लिए ब्लैकलिस्ट नहीं किया जा सकता है। लेकिन फिर भी सीबीएसई के पास कंपनी की लापरवाही पर लगाम कसने के लिए कुछ अन्य कड़े प्रशासनिक अधिकार अभी भी पूरी तरह मौजूद हैं। बोर्ड के पास यह अधिकार है कि वह बार-बार नियम टूटने पर कॉन्ट्रैक्ट को आगे बढ़ने से रोक सकता है और कार्रवाई कर सकता है। समझौते में सीबीएसई को यह शक्ति दी गई है कि गंभीर मामलों में वह कंपनी की पूरी सुरक्षा जमा राशि को तुरंत जब्त कर ले। इन सभी आर्थिक दंडों के बावजूद अगर काम में सुधार नहीं होता है तो अंतिम विकल्प के तौर पर अनुबंध को समाप्त किया जा सकता है।





































