संवैधानिक सुरक्षा: इलाहाबाद हाईकोर्ट की Lucknow पीठ ने नागरिक अधिकारों की रक्षा करते हुए उन्नाव के मनोज कुमार की गिरफ्तारी को अवैध घोषित कर दिया है। अदालत ने माना कि पुलिस द्वारा गिरफ्तारी के आधार को लिखित रूप में न बताना एक गंभीर संवैधानिक चूक है। इस आधार पर कोर्ट ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को मंजूर करते हुए जेल में बंद व्यक्ति को तुरंत स्वतंत्र करने का निर्देश दिया है।
पुलिस की लापरवाही: सुनवाई के दौरान यह खुलासा हुआ कि असीवन थाना पुलिस ने मनोज कुमार को गिरफ्तार करते समय कोई भी कानूनी दस्तावेज नहीं दिखाया था। पुलिस ने केवल एफआईआर संख्या का सहारा लेकर हिरासत की प्रक्रिया पूरी की थी। हाईकोर्ट ने इसे सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्थापित स्थापित कानूनों का उल्लंघन माना है, जिसमें गिरफ्तारी के कारणों का खुलासा करना अनिवार्य बताया गया है।
आर्थिक दंड: उत्तर प्रदेश सरकार को इस मामले में कड़ी फटकार लगाते हुए कोर्ट ने 10 लाख रुपये का हर्जाना भरने का आदेश दिया है। सरकार को यह निर्देश दिया गया है कि वह आगामी चार हफ्तों के भीतर याचिकाकर्ता को हर्जाने की राशि मुहैया कराए। इसके साथ ही, जिम्मेदार और लापरवाह अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए सरकार को वसूली की अनुमति भी दी गई है।
याचिका का आधार: मनोज कुमार के पुत्र मुदित ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था और अपनी पिता की गिरफ्तारी को चुनौती दी थी। याचिका में मुख्य रूप से इस बात पर जोर दिया गया था कि गिरफ्तारी के दौरान किसी भी प्रकार का लिखित आधार प्रस्तुत नहीं किया गया। जस्टिस प्रमोद कुमार श्रीवास्तव और जस्टिस अब्दुल मोईन की पीठ ने इस दलील को कानून सम्मत पाया और पुलिस कार्रवाई को रद्द कर दिया।
रिमांड का रद्दीकरण: पुलिस ने मनोज कुमार को 27 जनवरी को हिरासत में लिया था और अगले दिन 28 जनवरी को मजिस्ट्रेट से रिमांड प्राप्त की थी। हाईकोर्ट ने मजिस्ट्रेट के उस रिमांड आदेश को भी रद्द कर दिया है, क्योंकि गिरफ्तारी की मूल प्रक्रिया ही दोषपूर्ण थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बिना लिखित आधार के किसी भी व्यक्ति की स्वतंत्रता को बाधित नहीं किया जा सकता।
रिहाई की शर्त: अदालत ने शासन और प्रशासन को सख्त निर्देश दिए हैं कि यदि याचिकाकर्ता मनोज कुमार किसी अन्य आपराधिक मामले में वांछित नहीं है, तो उसे तत्काल जेल से रिहा किया जाए। जजों की पीठ ने दोहराया कि गिरफ्तारी के समय लिखित विवरण देना पुलिस के लिए महज एक औपचारिकता नहीं बल्कि एक अनिवार्य कानूनी कर्तव्य है, जिसका पालन न करना दंडनीय है।



































