हिंदू धर्म में भगवान गणेश को प्रथम पूजनीय और विघ्नहर्ता देवता माना जाता है। प्रत्येक महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखा जाता है और आश्विन मास की कृष्ण पक्ष चतुर्थी को विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी के नाम से जाना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन श्रद्धापूर्वक व्रत रखकर भगवान गणेश की पूजा करने से जीवन में आने वाले संकट और बाधाएं दूर करने के लिए गणपति की कृपा प्राप्त होती है। वर्ष 2026 में यह व्रत 29 सितंबर, मंगलवार को रखा जाएगा। चतुर्थी तिथि 29 सितंबर को शाम 5 बजकर 9 मिनट से शुरू होकर 30 सितंबर को दोपहर 2 बजकर 55 मिनट तक रहेगी। संकष्टी व्रत में चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद पारण करने की परंपरा है, इसलिए इस दिन चंद्रोदय का समय भी विशेष महत्व रखता है।
विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी व्रत 2026 शुभ मुहूर्त: पंचांग के अनुसार आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि 29 सितंबर 2026 को शाम 5 बजकर 9 मिनट पर आरंभ होगी और 30 सितंबर को दोपहर 2 बजकर 55 मिनट पर समाप्त होगी। चूंकि संकष्टी चतुर्थी के व्रत में चंद्रमा को अर्घ्य देने की परंपरा है और 29 सितंबर की रात चतुर्थी के दौरान चंद्रोदय होगा, इसलिए व्रत 29 सितंबर को ही रखा जाएगा। इस दिन चंद्रोदय रात 8 बजकर 20 मिनट पर बताया गया है। वहीं ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4 बजकर 53 मिनट से सुबह 5 बजकर 41 मिनट तक रहेगा और अभिजित मुहूर्त दोपहर 12 बजकर 5 मिनट से दोपहर 12 बजकर 53 मिनट तक रहेगा। चंद्रोदय का वास्तविक समय स्थान के अनुसार कुछ अंतर के साथ हो सकता है, इसलिए स्थानीय पंचांग के अनुसार चंद्रमा के दर्शन का समय देखना उचित रहेगा।
विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी का धार्मिक महत्व: संकष्टी शब्द का संबंध संकटों से मुक्ति की धार्मिक भावना से माना जाता है। इस व्रत में भगवान गणेश की आराधना करके भक्त अपने जीवन से विघ्न और परेशानियां दूर करने तथा सुख, शांति और सफलता की कामना करते हैं। गणपति को बुद्धि, विवेक और शुभारंभ का देवता माना जाता है, इसलिए किसी भी कठिन परिस्थिति में उनकी पूजा को विशेष फलदायी मानने की परंपरा है। संकष्टी चतुर्थी पर दिनभर व्रत रखने, गणेश जी का स्मरण करने, उनकी पूजा करने और शाम को चंद्रमा को अर्घ्य देने की परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्रद्धा से किया गया यह व्रत भक्त को संयम, भक्ति और सकारात्मक संकल्प से जोड़ता है। वर्ष 2026 में यह चतुर्थी मंगलवार को पड़ रही है, इसलिए इसे अंगारकी संकष्टी चतुर्थी भी कहा जाता है। अंगारकी नाम मंगल से संबंधित है और मंगलवार के दिन पड़ने वाली संकष्टी को परंपरागत रूप से विशेष माना जाता है।
विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी पूजा की तैयारी: पूजा से पहले सुबह उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और मन में व्रत का संकल्प लें। इसके बाद पूजा स्थल की अच्छी तरह सफाई करें और गंगाजल का छिड़काव करके स्थान को शुद्ध करें। लकड़ी की चौकी पर स्वच्छ वस्त्र बिछाकर भगवान गणेश की मूर्ति या तस्वीर स्थापित की जा सकती है। पूजा के लिए जल, फूल, रोली, अक्षत, दूर्वा, फल, मोदक और बूंदी के लड्डू जैसी सामग्री तैयार रखें। इसके साथ धूप और दीप की व्यवस्था भी करें। गणेश पूजा में दूर्वा और मोदक का विशेष महत्व माना जाता है। पूजा के दौरान श्रद्धा के साथ भगवान गणेश का ध्यान करते हुए उनके मंत्रों का जाप और गणेश चालीसा का पाठ किया जा सकता है। संकष्टी चतुर्थी की पूजा में गणेश अथर्वशीर्ष या गणेश स्तोत्र का पाठ करने की परंपरा भी कई स्थानों पर प्रचलित है।
विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी पूजा विधि: प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनने के बाद भगवान गणेश के सामने व्रत का संकल्प लें। इसके बाद पूजा स्थल को साफ करके गंगाजल का छिड़काव करें। चौकी स्थापित करके उस पर गणेश जी की मूर्ति या तस्वीर रखें। भगवान गणेश को जल अर्पित करने के बाद रोली, अक्षत, फूल और दूर्वा चढ़ाएं। इसके बाद फल, मोदक और बूंदी के लड्डू का भोग लगाएं। धूप और दीप जलाकर भगवान गणेश का ध्यान करें और श्रद्धापूर्वक गणेश चालीसा का पाठ तथा गणपति मंत्रों का जाप करें। पूजा के बाद गणेश जी की आरती करें। संकष्टी चतुर्थी की शाम को भी गणपति की दोबारा पूजा करने की परंपरा है। इस दौरान भगवान गणेश को भोग अर्पित कर उनका स्मरण करें और व्रत कथा का पाठ या श्रवण करें। पूजा के अंत में भगवान गणेश से जाने-अनजाने हुई भूल के लिए क्षमा प्रार्थना करें।
गणेश मंत्र और चंद्रमा को अर्घ्य देने की विधि: भगवान गणेश की पूजा के दौरान श्रद्धालु गणेश गायत्री मंत्र और विघ्ननाशक मंत्र का जाप कर सकते हैं। गणेश गायत्री मंत्र इस प्रकार है।
ॐ एकदन्ताय विद्महे।
वक्रतुण्डाय धीमहि।
तन्नो दन्ती प्रचोदयात् ॥
विघ्ननाशक मंत्र के रूप में इस मंत्र का जाप किया जाता है।
ॐ गं गौं गणपतये विघ्न विनाशिने स्वाहा ॥
पूजा की शुरुआत में भगवान गणेश का ध्यान करते हुए यह श्लोक भी पढ़ा जा सकता है।
श्री वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥
शाम को चंद्रोदय होने के बाद चंद्रमा को अर्घ्य देने की परंपरा है। इसके लिए स्वच्छ जल लेकर चंद्रमा को अर्घ्य दें और भगवान गणेश का स्मरण करें। चंद्रमा को अर्घ्य देते समय यह मंत्र पढ़ा जा सकता है।
गगनार्णवमाणिक्य चन्द्र दाक्षायणीपते।
गृहाणार्घ्यं मया दत्तं गणेशप्रतिरूपक ॥
चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद भगवान गणेश की पूजा पूर्ण करके व्रत का पारण किया जाता है। संकष्टी चतुर्थी की घरेलू पूजा परंपरा में चंद्र दर्शन और अर्घ्य के बाद ही व्रत खोलने का विशेष महत्व माना जाता है।













































