3 जून 2026, बुधवार के दिन हिंदू धर्म में विभुवन संकष्टी चतुर्थी का विशेष व्रत रखा जाएगा। यह व्रत इसलिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह हर 3 साल में केवल एक बार, ‘अधिक मास’ (मलमास) के दौरान आता है। मान्यता है कि इस पावन दिन विघ्नहर्ता भगवान गणेश की सच्चे मन से पूजा करने से भक्तों के जीवन के सभी दुख, दरिद्रता और भयंकर संकट शीघ्र दूर हो जाते हैं।
इस दिन गणपति बप्पा की पूजा-अर्चना के साथ-साथ ‘श्री गणेश चालीसा’ का पाठ करने से व्रत का पुण्य फल कई गुना अधिक बढ़ जाता है। इसके प्रभाव से कुंडली के सभी अशुभ ग्रहों का दुष्प्रभाव खत्म हो जाता है और घर में सुख-समृद्धि, संपन्नता और असीम खुशहाली का वास होता है।
॥ श्री गणेश चालीसा ॥
॥ दोहा ॥ जय गणपति सदगुण सदन, कविवर बदन कृपाल। विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥
॥ चौपाई ॥ जय जय जय गणपति गणराजू। मंगल भरण करण शुभः काजू॥ जै गजबदन सदन सुखदाता। विश्व विनायका बुद्धि विधाता॥
वक्र तुण्ड शुची शुण्ड सुहावना। तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन॥ राजत मणि मुक्तन उर माला। स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला॥
पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं। मोदक भोग सुगन्धित फूलं॥ सुन्दर पीताम्बर तन साजित। चरण पादुका मुनि मन राजित॥
धनि शिव सुवन षडानन भ्राता। गौरी लालन विश्व-विख्याता॥ ऋद्धि-सिद्धि तव चंवर सुधारे। मुषक वाहन सोहत द्वारे॥
कहौ जन्म शुभ कथा तुम्हारी। अति शुची पावन मंगलकारी॥ एक समय गिरिराज कुमारी। पुत्र हेतु तप कीन्हा भारी॥
भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा। तब पहुंच्यो तुम धरी द्विज रूपा॥ अतिथि जानी के गौरी सुखारी। बहुविधि सेवा करी तुम्हारी॥
अति प्रसन्न हवै तुम वर दीन्हा। मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा॥ मिलहि पुत्र तुहि, बुद्धि विशाला। बिना गर्भ धारण यहि काला॥
गणनायक गुण ज्ञान निधाना। पूजित प्रथम रूप भगवाना॥ अस कही अन्तर्धान रूप हवै। पालना पर बालक स्वरूप हवै॥
बनि शिशु रुदन जबहिं तुम ठाना। लखि मुख सुख नहिं गौरी समाना॥ सकल मगन, सुखमंगल गावहिं। नाभ ते सुरन, सुमन वर्षावहिं॥
शम्भु, उमा, बहुदान लुटावहिं। सुर मुनिजन, सुत देखन आवहिं॥ लखि अति आनन्द मंगल साजा। देखन भी आये शनि राजा॥
निज अवगुण गुनि शनि मन माहीं। बालक, देखन चाहत नाहीं॥ गिरिजा कछु मन भेद बढायो। उत्सव मोर, न शनि तुही भायो॥
कहत लगे शनि, मन सकुचाई। का करिहौ, शिशु मोहि दिखाई॥ नहिं विश्वास, उमा उर भयऊ। शनि सों बालक देखन कहयऊ॥
पदतहिं शनि दृग कोण प्रकाशा। बालक सिर उड़ि गयो अकाशा॥ गिरिजा गिरी विकल हवै धरणी। सो दुःख दशा गयो नहीं वरणी॥
हाहाकार मच्यौ कैलाशा। शनि कीन्हों लखि सुत को नाशा॥ तुरत गरुड़ चढ़ि विष्णु सिधायो। काटी चक्र सो गज सिर लाये॥
बालक के धड़ ऊपर धारयो। प्राण मन्त्र पढ़ि शंकर डारयो॥ नाम गणेश शम्भु तब कीन्हे। प्रथम पूज्य बुद्धि निधि, वर दीन्हे॥
बुद्धि परीक्षा जब शिव कीन्हा। पृथ्वी कर प्रदक्षिणा लीन्हा॥ चले षडानन, भरमि भुलाई। रचे बैठ तुम बुद्धि उपाई॥
चरण मातु-पितु के धर लीन्हें। तिनके सात प्रदक्षिण कीन्हें॥ धनि गणेश कही शिव हिये हरषे। नभ ते सुरन सुमन बहु बरसे॥
तुम्हरी महिमा बुद्धि बड़ाई। शेष सहसमुख सके न गाई॥ मैं मतिहीन मलीन दुखारी। करहूं कौन विधि विनय तुम्हारी॥
भजत रामसुन्दर प्रभुदासा। जग प्रयाग, ककरा, दुर्वासा॥ अब प्रभु दया दीना पर कीजै। अपनी शक्ति भक्ति कुछ दीजै॥
॥ दोहा ॥ श्री गणेश यह चालीसा, पाठ करै कर ध्यान। नित नव मंगल गृह बसै, लहे जगत सन्मान॥ सम्बन्ध अपने सहस्र दश, ऋषि पंचमी दिनेश। पूरण चालीसा भयो, मंगल मूर्ती गणेश॥
गणेश चालीसा पाठ के अचूक नियम
विभुवन संकष्टी चतुर्थी के दिन पाठ का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए इन विशेष नियमों का पालन अवश्य करें:
- स्नान और स्वच्छता: शाम के समय पूजा से पूर्व स्नान करें और साफ-स्वच्छ वस्त्र (हो सके तो हल्के या पीले रंग के) धारण करें।
- दीपक प्रज्वलित करें: भगवान गणेश की मूर्ति या चित्र के सामने शुद्ध गाय के घी का एक दीपक जलाएं।
- तिलक और भोग: गणपति बप्पा को सिंदूर का तिलक लगाएं और उन्हें उनकी अत्यंत प्रिय ‘दूर्वा’ (हरी घास) और मोदकों का भोग अर्पित करें।
- आसन और एकाग्रता: जमीन पर लाल रंग का साफ आसन बिछाएं। उस पर बैठकर पूरी एकाग्रता और सच्ची श्रद्धा के साथ श्री गणेश चालीसा का पाठ शुरू करें।
- आरती और मंत्र जाप: पाठ पूरा होने के बाद भगवान गणेश की कपूर और घी से आरती करें। अंत में उनके सिद्ध मंत्रों (जैसे: ॐ गं गणपतये नमः) का जाप करते हुए सुख-शांति की प्रार्थना करें।





































