लखनऊ में एक ही शहर के भीतर डॉ. अंबेडकर का दूसरा बड़ा स्मारक बनना केवल एक निर्माण कार्य नहीं है, बल्कि यह उत्तर प्रदेश की Social Engineering का एक बड़ा हिस्सा है। बीजेपी का यह कदम सीधे तौर पर प्रदेश के दलित मतदाताओं को एक बड़ा संदेश देने की कोशिश है।
बीजेपी की बदली हुई रणनीति (Shift in BJP’s Ideology)
दिलचस्प बात यह है कि कभी बीजेपी ने विपक्षी दलों द्वारा करोड़ों रुपये खर्च कर स्मारक बनवाने की कड़ी आलोचना की थी। लेकिन अब, सत्ताधारी दल खुद उसी राह पर है। जानकारों का मानना है कि 2024 के लोकसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के हाथों मिली चुनौती के बाद बीजेपी ने अपनी रणनीति बदल ली है। 2024 में विपक्ष ने ‘संविधान बचाओ’ और ‘आरक्षण बचाओ’ के नारों से दलित वोटों में बड़ी सेंधमारी की थी, जिसका नुकसान बीजेपी को सीटों की संख्या में उठाना पड़ा।
वोटों का ध्रुवीकरण और मायावती का प्रभाव (Countering BSP & SP)
2014 के बाद से जैसे-जैसे बहुजन समाज पार्टी (BSP) कमजोर हुई, उसका मुख्य वोट बैंक बीजेपी की ओर खिसका था। लेकिन पिछले चुनाव में यह वोट बैंक सपा-कांग्रेस गठबंधन की ओर मुड़ गया। अब बीजेपी इस स्मारक के जरिए निम्नलिखित लक्ष्य साधना चाहती है:
- स्वयं को दलित हितैषी दिखाना: स्मारक और सांस्कृतिक केंद्र बनाकर बीजेपी यह जताना चाहती है कि वह बाबा साहेब के आदर्शों के प्रति प्रतिबद्ध है।
- 2027 के चुनाव की तैयारी: 2022 में नींव रखना और 2027 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले उद्घाटन करना, मतदाताओं को प्रभावित करने की एक सोची-समझी क्रोनोलॉजी (Chronology) लगती है।
- विपक्ष के नैरेटिव को काटना: ‘संविधान बदलने’ के आरोपों को धोने के लिए बीजेपी अब सांस्कृतिक प्रतीकों का सहारा ले रही है।
निष्कर्ष (Conclusion)
लखनऊ का यह नया अंबेडकर स्मारक आगामी चुनावों में एक प्रमुख चुनावी मुद्दा बनेगा। जहाँ बीजेपी इसे सम्मान और विकास से जोड़ रही है, वहीं विपक्ष इसे ‘चुनावी दिखावा’ करार दे सकता है। अंततः, यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या ईंट और पत्थर से बना यह सांस्कृतिक केंद्र दलित मतदाताओं के दिल और दिमाग में अपनी जगह बना पाएगा या नहीं।



































