हाई कोर्ट का हस्तक्षेप: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले से संबंधित एक मामले में एक व्यक्ति के पक्ष में फैसला सुनाया है। अदालत ने जिला प्रशासन द्वारा दिए गए उस आदेश को अवैध माना है, जिसमें एक व्यक्ति को गुंडा अधिनियम के तहत छह माह के लिए जिले से निर्वासित कर दिया गया था। अदालत ने कहा कि कानून का प्रयोग बहुत ही सावधानी से किया जाना चाहिए।
सतेंद्र पर लगे आरोप: इस कानूनी विवाद के केंद्र में सतेंद्र नामक व्यक्ति था, जिसके विरुद्ध बुलंदशहर प्रशासन ने दो केसों के आधार पर गुंडा एक्ट लगाया था। प्रशासन का आरोप था कि सतेंद्र एक खतरनाक अपराधी है जो समाज की शांति के लिए खतरा बना हुआ है। अधिकारियों के अनुसार, उसके डर के कारण लोग उसके विरुद्ध साक्ष्य देने से कतराते थे, जिसके कारण उसका क्षेत्र से बाहर जाना आवश्यक था।
वकीलों की दलीलें: अदालती कार्यवाही के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने मजबूती से पक्ष रखा कि अलग-अलग और छिटपुट घटनाओं से किसी व्यक्ति की प्रकृति या आदत को परिभाषित नहीं किया जा सकता। इसके विपरीत, राज्य सरकार के अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि विभिन्न धाराओं में दर्ज मामले व्यक्ति की आपराधिक संलिप्तता को दर्शाते हैं और इससे उसकी आदतन अपराधी होने की पुष्टि होती है।
अदालत की कड़ी टिप्पणी: न्यायमूर्ति संदीप जैन ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद कहा कि राज्य सरकार की ओर से की जाने वाली ऐसी दंडात्मक कार्रवाई व्यक्ति के सम्मान को गंभीर चोट पहुँचाती है। अदालत ने स्पष्ट किया कि बिना पर्याप्त आधार और बिना ‘आदतन अपराधी’ के तत्व को साबित किए किसी भी नागरिक को “गुंडा” के रूप में प्रस्तुत करना न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता।
अधिनियम की व्याख्या: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने गुंडा नियंत्रण अधिनियम की धारा 2(बी) का उल्लेख करते हुए बताया कि इसमें ‘आदतन’ शब्द का विशेष महत्व है। यदि किसी व्यक्ति ने लंबे समय के अंतराल में कोई अपराध किया है, तो उसे आदतन अपराधी नहीं माना जा सकता। अदालत के अनुसार, निर्वासन जैसे सख्त कदम उठाने के लिए महज एक या दो आपराधिक मामले पर्याप्त साक्ष्य नहीं माने जा सकते।
फैसले का निष्कर्ष: अंततः अदालत ने पूर्व के न्यायिक उदाहरणों और विशेषकर ललनी पांडेय केस का हवाला देते हुए याचिकाकर्ता को राहत प्रदान की। उच्च न्यायालय ने अपर जिला मजिस्ट्रेट द्वारा 12 फरवरी, 2025 को जारी आदेश को निरस्त कर दिया है। इस फैसले ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को गुंडा एक्ट की कार्यवाही करने से पहले अपराधों की गंभीरता और निरंतरता को जांचना अनिवार्य होगा।



































