सदाबहार अभिनेता की 103वीं जयंती: हिंदी सिनेमा के इतिहास में देव आनंद एक ऐसे कलाकार रहे, जिन्होंने अपने अभिनय, आकर्षक व्यक्तित्व, अनोखे अंदाज और यादगार फिल्मों के जरिए दर्शकों के दिलों में विशेष स्थान बनाया। उनकी लोकप्रियता केवल पर्दे पर निभाए गए किरदारों तक सीमित नहीं थी, बल्कि उनका पहनावा, संवाद बोलने का तरीका, चेहरे की मुस्कान और जीवन के प्रति उत्साह भी उनकी पहचान बन गए थे। 26 सितंबर 1923 को जन्मे देव आनंद की 26 सितंबर 2026 को 103वीं जयंती मनाई गई। इस अवसर पर उनके लंबे फिल्मी सफर, निजी जीवन और सिनेमा से जुड़े दिलचस्प किस्सों को एक बार फिर याद किया जा रहा है। अपने करीब छह दशक के करियर में उन्होंने रोमांटिक नायक से लेकर गंभीर और चुनौतीपूर्ण भूमिकाओं तक दर्शकों को प्रभावित किया। एक समय ऐसा भी था जब उनकी लोकप्रियता इतनी अधिक थी कि सार्वजनिक स्थानों पर उनकी झलक पाने के लिए प्रशंसकों की भीड़ उमड़ पड़ती थी। उनकी फिल्मों के गीत, संवाद और किरदार आज भी हिंदी सिनेमा की विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। नई पीढ़ी के दर्शक भी उनकी फिल्मों के माध्यम से उस दौर के सिनेमा, संगीत और अभिनय की खास शैली से परिचित हो रहे हैं।
असली नाम और शुरुआती संघर्ष: देव आनंद का वास्तविक नाम धर्मदेव पिशोरीमल आनंद था। उनका जन्म तत्कालीन अविभाजित भारत के पंजाब प्रांत में गुरदासपुर जिले के शकरगढ़ में एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था। उन्होंने लाहौर में अंग्रेजी साहित्य की पढ़ाई की और स्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद अभिनय की दुनिया में अपना भविष्य बनाने का फैसला किया। फिल्मों में पहचान बनाने की इच्छा उन्हें मुंबई ले आई, लेकिन शुरुआती दिनों में उन्हें आर्थिक कठिनाइयों और संघर्ष का सामना करना पड़ा। अभिनय में अवसर मिलने से पहले उन्होंने गुजारे के लिए नौकरी भी की। बताया जाता है कि एक क्लर्क के रूप में उन्हें पहली बार केवल 85 रुपये वेतन मिला था। इसके बाद उन्होंने सैन्य सेंसर कार्यालय में काम किया, जहां उन्हें 160 रुपये मासिक वेतन मिलने लगा। हालांकि, नौकरी के दौरान भी उनका मन अभिनय की दुनिया में ही लगा रहा। करीब दो साल के संघर्ष के बाद वर्ष 1946 में फिल्म ‘हम एक हैं’ से उन्हें हिंदी सिनेमा में प्रवेश करने का अवसर मिला। इस फिल्म ने उनके अभिनय करियर की शुरुआत की और धीरे-धीरे वह फिल्म उद्योग में अपनी अलग पहचान बनाने लगे।
अशोक कुमार से मिला बड़ा अवसर: देव आनंद के अभिनय की दुनिया में आने के पीछे दिग्गज अभिनेता अशोक कुमार की महत्वपूर्ण भूमिका रही। देव आनंद उनके अभिनय से बेहद प्रभावित थे और उन्हें अपना प्रेरणास्रोत मानते थे। दिलचस्प बात यह रही कि जिस कलाकार को देखकर उन्होंने फिल्मी दुनिया में आने का सपना देखा था, उसी कलाकार के माध्यम से उन्हें करियर में आगे बढ़ने का महत्वपूर्ण अवसर मिला। अशोक कुमार से जुड़े सहयोग के बाद देव आनंद को फिल्म ‘जिद्दी’ में काम करने का मौका मिला। इस फिल्म ने उन्हें दर्शकों के बीच नई पहचान दिलाई और उनके करियर को महत्वपूर्ण दिशा दी। इसके बाद उन्होंने ‘विद्या’, ‘जीत’, ‘शायर’, ‘अफसर’, ‘दो सितारे’ और ‘सनम’ जैसी फिल्मों में अभिनय किया। समय के साथ उनकी लोकप्रियता बढ़ती गई और वह हिंदी सिनेमा के प्रमुख अभिनेताओं में शामिल हो गए। उनके अभिनय की खासियत यह थी कि वह रोमांटिक भूमिकाओं में सहज दिखाई देते थे, जबकि गंभीर किरदारों में भी अपनी अलग छाप छोड़ते थे। उनके करियर में करीब 116 फिल्मों का उल्लेख मिलता है। अभिनय के साथ उन्होंने फिल्म निर्माण और निर्देशन के क्षेत्र में भी अपनी पहचान बनाई। उनकी अंतिम फिल्म ‘चार्जशीट’ थी, जो वर्ष 2011 में उनके निधन से कुछ समय पहले प्रदर्शित हुई थी।
काले कोट और अनोखे अंदाज का किस्सा: देव आनंद की लोकप्रियता के साथ उनके पहनावे और व्यक्तित्व से जुड़े कई किस्से भी फिल्मी दुनिया में चर्चित रहे हैं। खासतौर पर काले रंग के कोट में उनका अंदाज प्रशंसकों के बीच बेहद लोकप्रिय था। फिल्म ‘काला पानी’ के बाद उनके काले कपड़ों को लेकर एक कहानी प्रचलित हुई कि उनकी आकर्षक छवि से प्रभावित होकर कुछ महिला प्रशंसकों ने आत्मघाती कदम उठाए और इसी वजह से उनके काला कोट पहनने पर पाबंदी लगा दी गई। हालांकि, इस कथित प्रतिबंध और उससे जुड़ी घटनाओं की स्वतंत्र पुष्टि नहीं मिलती। इसे देव आनंद की लोकप्रियता से जुड़ी चर्चित फिल्मी किंवदंती के रूप में देखा जाता है। उनके व्यक्तित्व का वास्तविक आकर्षण उनकी सहज मुस्कान, अलग ढंग से संवाद बोलने की शैली और आत्मविश्वास से भरे अभिनय में दिखाई देता था। वह अपने दौर के प्रमुख फैशन प्रतीकों में गिने जाते थे और उनका अंदाज दूसरे अभिनेताओं से अलग पहचान रखता था। उनकी फिल्मों में रोमांस, संगीत और अभिनय का ऐसा मेल देखने को मिलता था, जिसने उन्हें लंबे समय तक दर्शकों का पसंदीदा कलाकार बनाए रखा।
फिल्मों से राजनीति तक का सफर: अभिनय और फिल्म निर्माण के अलावा देव आनंद ने सार्वजनिक जीवन में भी अपनी भागीदारी दर्ज कराई। वर्ष 1975 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कार्यकाल में घोषित आपातकाल का उन्होंने विरोध किया था। वर्ष 1977 के आम चुनावों के दौरान वह उन फिल्मी हस्तियों में शामिल रहे, जिन्होंने आपातकाल के खिलाफ सार्वजनिक रूप से आवाज उठाई। इसके बाद उन्होंने नेशनल पार्टी ऑफ इंडिया नाम से एक राजनीतिक दल भी बनाया। हालांकि, संगठनात्मक कठिनाइयों और चुनाव लड़ने के लिए उम्मीदवारों की व्यवस्था नहीं हो पाने के कारण यह दल चुनावी मैदान में उतरने से पहले ही समाप्त हो गया। देव आनंद का यह अध्याय उनके फिल्मी करियर से अलग सार्वजनिक और राजनीतिक गतिविधियों में उनकी भागीदारी को दर्शाता है।
चार्ली चैपलिन के प्रति उनका लगाव भी बेहद खास था। वर्ष 1954 में स्विट्जरलैंड के मॉन्ट्रो में जब उनकी मुलाकात महान हास्य अभिनेता चार्ली चैपलिन से हुई, तो वह उत्साह में उनका जयकारा लगाने लगे। देव आनंद के इस अंदाज को देखकर चैपलिन हंस पड़े और उन्होंने अपने निवास पर उनका स्वागत किया। यह मुलाकात देव आनंद के जीवन के यादगार किस्सों में शामिल है।
यादगार फिल्मों की अमिट विरासत: देव आनंद के फिल्मी सफर में कई ऐसी फिल्में शामिल हैं, जिन्होंने अलग-अलग पीढ़ियों के दर्शकों पर अपनी छाप छोड़ी। ‘बाजी’, ‘टैक्सी ड्राइवर’, ‘काला पानी’, ‘सीआईडी’, ‘असली नकली’, ‘तेरे घर के सामने’, ‘गाइड’, ‘हम दोनों’, ‘जाली नोट’, ‘मंजिल’, ‘द रिटर्न ऑफ ज्वेल थीफ’, ‘वारंट’ और ‘बारिश’ जैसी फिल्में उनके अभिनय की विविधता को सामने लाती हैं। उनके करियर से जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा प्रकाश मेहरा की फिल्म ‘जंजीर’ का भी है। इस फिल्म में विजय की भूमिका पहले देव आनंद को प्रस्तावित की गई थी, लेकिन उन्होंने इसे स्वीकार नहीं किया। बाद में यह किरदार अमिताभ बच्चन ने निभाया और फिल्म उनके करियर का महत्वपूर्ण पड़ाव बनी। देव आनंद ने अपने लंबे करियर में अनेक प्रमुख कलाकारों के साथ काम किया, लेकिन अमिताभ बच्चन के साथ किसी फिल्म में उनकी जोड़ी पर्दे पर नहीं दिखाई दी।
देव आनंद की 103वीं जयंती के अवसर पर उनकी सदाबहार फिल्मों को फिर से देखने का अवसर भी दर्शकों के पास है। अल्ट्रा प्ले और अल्ट्रा मीडिया एंड एंटरटेनमेंट के डिजिटल मंचों तथा यूट्यूब पर उनकी कई लोकप्रिय फिल्मों का आनंद लिया जा सकता है। अल्ट्रा मीडिया एंड एंटरटेनमेंट के संस्थापक सुशील कुमार अग्रवाल ने देव आनंद को याद करते हुए उन्हें युवा ऊर्जा, विशिष्ट शैली और कहानी कहने के अनोखे अंदाज का प्रतिनिधित्व करने वाला कलाकार बताया। देव आनंद का निधन 3 दिसंबर 2011 को लंदन में हुआ था, लेकिन उनकी फिल्में, यादगार गीत और अभिनय की खास शैली आज भी दर्शकों के बीच उनकी पहचान को जीवित रखे हुए हैं।













































