संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र में इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के संबोधन के दौरान कई देशों के प्रतिनिधि सभागार से बाहर चले गए। नेतन्याहू के मंच पर पहुंचने के साथ ही कई प्रतिनिधियों ने विरोध जताते हुए बाहर निकलना शुरू किया। इसके जवाब में नेतन्याहू ने बाहर जाने वालों पर तीखी टिप्पणी की और उन्हें नैतिक रूप से कायर बताया। इसके बावजूद उन्होंने अपना भाषण जारी रखा और ईरान, इजरायल की सुरक्षा, अमेरिका के साथ साझेदारी तथा विभिन्न मोर्चों पर चल रहे संघर्ष को लेकर अपने विचार सामने रखे।
ईरान की सरकार के गिरने का दावा: नेतन्याहू ने अपने संबोधन में ईरान की मौजूदा सरकार के भविष्य को लेकर बड़ा दावा किया। उन्होंने कहा कि एक दिन ईरान के लोग अपने शासन के खिलाफ खड़े होंगे और मौजूदा शासन का अंत होगा। नेतन्याहू ने ईरानी शासन पर झूठ, भ्रष्टाचार और क्रूरता के सहारे सत्ता चलाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि ईरान में बदलाव का दिन बहुत दूर नहीं हो सकता। उनके मुताबिक जनता की ताकत अंततः सत्ता में बैठे लोगों पर भारी पड़ेगी। यह दावा नेतन्याहू के भाषण के प्रमुख राजनीतिक संदेशों में शामिल रहा।
ईरान पर कार्रवाई को बताया आसान फैसला: नेतन्याहू ने ईरान के परमाणु ठिकानों पर इजरायल की सैन्य कार्रवाई का उल्लेख करते हुए कहा कि इन ठिकानों को नष्ट करना बेहद कठिन था, लेकिन प्रधानमंत्री के तौर पर उनके लिए यह सबसे आसान फैसलों में से एक था। उन्होंने अपने फैसले को इजरायल की सुरक्षा से जोड़ते हुए कहा कि यदि यह कार्रवाई नहीं की जाती तो उनके अनुसार गंभीर परिणाम सामने आ सकते थे। नेतन्याहू ने यह भी दावा किया कि कुछ देशों के नेता सार्वजनिक मंच पर इजरायल की कार्रवाई की आलोचना करते हैं, लेकिन निजी बातचीत में उसके लिए धन्यवाद देते हैं। उन्होंने इस विरोधाभास को पाखंड बताया।
ट्रंप को बताया सबसे बड़ा साझेदार: नेतन्याहू ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए भी विशेष प्रशंसा व्यक्त की। उन्होंने कहा कि इजरायल को ट्रंप से बड़ा कोई साझेदार नहीं मिला। नेतन्याहू ने ट्रंप के नेतृत्व को साहसी बताते हुए कहा कि उन्होंने अमेरिका, इजरायल और दुनिया के सामने मौजूद बड़े खतरे का सामना किया। नेतन्याहू के अनुसार अमेरिका और इजरायल ने मिलकर जो कदम उठाए, उनका उद्देश्य केवल दोनों देशों की सुरक्षा करना नहीं था, बल्कि उनके शब्दों में सभ्यता की रक्षा करना भी था।
सात मोर्चों का जिक्र: अपने भाषण में नेतन्याहू ने इजरायल की मौजूदा सुरक्षा चुनौतियों को सात मोर्चों से जोड़कर पेश किया। उन्होंने हमास, हिजबुल्लाह, हूती, ईरान, इराक में ईरान समर्थित मिलिशिया, सीरिया में ईरान समर्थित मिलिशिया और पश्चिमी तट में फिलिस्तीनी सशस्त्र समूहों का उल्लेख किया। नेतन्याहू ने कहा कि पिछले तीन वर्षों से इजरायली सैनिक दिन-रात इन मोर्चों पर संघर्ष कर रहे हैं। उन्होंने इस स्थिति को इजरायल के लिए व्यापक सुरक्षा चुनौती के रूप में प्रस्तुत किया और दावा किया कि इन सभी ताकतों का लक्ष्य इजरायल को समाप्त करना है।
इजरायल की सैन्य कार्रवाई का बचाव: नेतन्याहू ने अपने संबोधन में ईरान के साथ संघर्ष के अलावा इजरायल की व्यापक सैन्य कार्रवाई का भी बचाव किया। उन्होंने कहा कि इजरायल ने कई दिशाओं से सामने आए खतरों का जवाब दिया है। उनके अनुसार ईरान की सैन्य और परमाणु क्षमताओं के खिलाफ कार्रवाई इजरायल की सुरक्षा के लिए आवश्यक थी। नेतन्याहू ने अमेरिका के साथ सहयोग को भी इस कार्रवाई का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया और कहा कि दोनों देशों ने मिलकर सामने आए खतरों का सामना किया। उनके भाषण में इजरायल की सुरक्षा नीति और उसके सैन्य फैसलों का बचाव प्रमुख रूप से दिखाई दिया।
संयुक्त राष्ट्र में भाषण का असर: नेतन्याहू के संबोधन में ईरान की सरकार को लेकर दावा, परमाणु ठिकानों पर हमले का बचाव, ट्रंप की प्रशंसा और सात मोर्चों पर संघर्ष का उल्लेख प्रमुख रहा। वहीं भाषण के शुरुआती हिस्से में कई प्रतिनिधियों के सभागार से बाहर जाने की घटना ने भी अंतरराष्ट्रीय ध्यान खींचा। नेतन्याहू ने विरोध करने वाले प्रतिनिधियों पर तीखी प्रतिक्रिया दी और इसके बाद अपना संबोधन जारी रखा। इस तरह उनका संयुक्त राष्ट्र भाषण ईरान और इजरायल के बीच संघर्ष के साथ-साथ अमेरिका के साथ इजरायल की साझेदारी और अंतरराष्ट्रीय आलोचना पर केंद्रित रहा।














































