उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के अंतिम संस्कार के लिए बुलंदशहर में नरौरा के बंसी घाट पर तैयारियां लगभग पूरी हो चुकी हैं। उनका अंतिम संस्कार सोमवार शाम को किया जाएगा।
पूर्व सीएम सिंह का शनिवार देर रात निधन हो गया था। वे लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे थे। उनके अंतिम संस्कार को लेकर बुलंदशहर के डीएम रवींद्र कुमार ने समाचार एजेंसी एएनआई को बताया, “यूपी के पूर्व CM कल्याण सिंह के अंतिम संस्कार के लिए यहां पूरा ज़िला प्रशासन तैयारियों में लगा हुआ है।गौरतलब है कि रविवार को सिंह के पार्थिव शरीर को अलीगढ़ के अहिल्याबाई होल्कर स्टेडियम पहुंचाया गया। इस दौरान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी अहिल्याबाई होल्कर स्टेडियम पहुंचकर सिंह को श्रद्धांजलि दी।
कुछ ऐसा रहा था पूर्व सीएम कल्याण सिंह का जीवन
1980 के दशक के आखिरी दिन थे। तब भारत में मंडल राजनीति अपने चरम पर थी। ये वो दौर था जब आक्रामक हिंदुत्व की राजनीति की आंखों में आंखे डालकर पिछड़ी जाति की राजनीति अपने वजूद को तराश रही थी।
दरअसल, इस समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के लिए बड़ी चुनौती थी कि ऐसा क्या किया जाए कि पिछड़े वर्ग की राजनीति की उफनती धारा में हिंदुत्व का भी संगम हो जाए। तब कल्याण सिंह की शक्ल में संघ को मानो इस चुनौतीरूपी ताले की सबसे बेहतरीन चाबी मिल गई थी। सिंह पिछड़े वर्ग में आने वाले लोधी समुदाय के, एक उभरते हिंदुवादी नेता थे जिसे आरएसएस ने एक “स्वाभाविक नेता” के रूप में पेश करना शुरू कर दिया।
इसके बाद कल्याण सिंह का जुड़ाव जाहिर तौर पर भारतीय जनता पार्टी से भी हो गया। संगठन में कल्याण सिंह का कद कितनी तेजी से बढ़ा था, ये बात इससे समझी जा सकती है कि 1991 में वे राजनीति के दृष्टि से उत्तर प्रदेश जैसे महत्वपूर्ण राज्य भारतीय जनता पार्टी सरकार के पहले मुख्यमंत्री बनाए गए।
एक शिक्षक जिसने जनसंघ से लेकर भाजपा तक हर कक्षा में दमदारी से हाजिरी दी
1932 में जन्मे कल्याण सिंह युवावस्था में ही हिंदुत्व की विचारधारा की ओर खिंचे चले आए थे। उस समय जब राजनीतिक परिदृश्य पर नेहरूवादी कांग्रेस का दबदबा था, इस नई राह पर चलना आसान नहीं था। लेकिन एटा के अतरौली के रायपुर इंटर कॉलेज में सामाजिक विज्ञान के इस युवा शिक्षक को इस नई डगर पर चलने में कोई चुनौती नजर नहीं आ रही थी। नतीजतन उन्होंने क्षेत्र में अपने आप को भारतीय जनसंघ के सक्रिय कार्यकर्ता के रूप में स्थापित किया और 1967 में जनसंघ के टिकट पर अतरौली विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की।
कल्याण सिंह उन पहली पंक्ति के नेताओं में शुमार माने जाते हैं जिन्होंने जनसंघ की विचारधारा को आगे बढ़ाना शुरू किया था। संगठन में राजनीतिक तौर पर मजबूत स्तंभ माने जाने वाले सिंह धीरे-धीरे भारत में लगातार बन रहे नवीन सामाजिक समीकरणों को कुशलता से साधने का प्रयास कर रहे थे। इस तरह एक पिछड़ी जाति का नेता हिंदुत्व का चेहरा बनने लगा था।
चुनाव जीतने से लेकर 1977 तक यानी कि लोकतंत्र के काले अध्याय माने जाने वाले आपातकाल के बाद के युग में, सिंह ने अपने निर्वाचन क्षेत्र पर एक मजबूत पकड़ बनाए रखी और लगातार तीन बार चुनाव जीते। लेकिन सिंह के राजनीतिक जीवन में सबसे बड़ा मोड़ 1977 में आया।
दरअसल, आपातकाल के बाद हुए चुनावों में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया था, और राज्य में पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार की शक्ल में जनता पार्टी सत्ता की सीढ़ियां चढ़ी। सिंह अब जनता पार्टी के विधायक थे और उन्हें राज्य की पहली गैर-कांग्रेसी सरकार में मंत्री बनाया गया था। तब तक जनसंघ ने अपना विलय जनता पार्टी बनाने के लिए अन्य कांग्रेस विरोधी दलों के साथ कर लिया।
हालांकि जनता पार्टी का अस्तित्व भारतीय राजनीति में एक बुलबुले मानिंद साबित हुआ और 1980 के अगले ही विधानसभा चुनावों में पार्टी को सत्ता से बाहर का रास्ता देखना पड़ा। लेकिन तब तक आपातकाल और जेपी आंदोलन आरएसएस की राष्ट्रवादी बहुसंख्यकवादी राजनीति को एक नया जीवन दे चुके थे। और इसी साल यानी कि 1980 में भारतीय जनता पार्टी अस्तित्व में आई।
तब तक सिंह आरएसएस, जनसंघ और जनता पार्टी में अपने आप को मजबूती के साथ साबित कर चुके थे और जाहिर तौर पर वे भाजपा से जुड़कर उस राज्य में सबसे अहम भूमिका निभाने वाले थे जो आने वाले वर्षों में हिंदुत्व और भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी प्रयोगशाला साबित होने वाला था।
राम मंदिर आंदोलन और कल्याण सिंह का उदय
भाजपा की स्थापना ही हिंदुत्व की राजनीति को एक दमदार धक्का लगाने के लिए की गई थी। 1980 के दशक के मध्य तक अयोध्या में श्री राम जन्मभूमि को मुक्त कराने का आंदोलन गति पकड़ने लगा था। आंदोलनकारी ठीक उसी स्थान को रामजन्मभूमी मानते थे जहां बाबरी मस्जिद थी। आगे चलकर ये विवाद आजाद भारत के सबसे बड़े विवादों में शामिल हो गया।
1986 में जब बाबरी मस्जिद के ताले एक अदालत के आदेश से खोले गए, आरएसएस-भाजपा के लिए आशा की नई किरण पैदा हुई। लोकसभा में सिर्फ दो सांसदों वाली पार्टी ने 1989 में अगले आम चुनावों में 85 सीटों पर पहुंचने का कारण ढूंढ लिया था। और इस नई राजनीतिक करवट के बीच अतरौली के विधायक कल्याण सिंह अपनी दमदार मौजूदगी दर्ज कर रहे थे। इस दौरान पिछड़ी जाति की उभरती राजनीति ने भी सिंह को पार्टी में एक मजबूत स्थान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
1991 में जैसे ही भाजपा ने राजनीतिक सत्ता में कदम रखा, विधानसभा चुनावों में स्पष्ट बहुमत हासिल करते हुए, आरएसएस के स्वाभाविक नेता मुख्यमंत्री पद के लिए पसंदीदा विकल्प बन गए। इसके बाद से राममंदिर की मांग और तेज होती चली गई।
एक असफल वादा
सत्ता में आने के बाद जैसे ही कल्याण सिंह सरकार ने अयोध्या में विवादित स्थल के आसपास 2.27 एकड़ जमीन के अधिग्रहण के साथ राम चबूतरे का निर्माण किया, इस मुद्दे को लेकर उन्माद खतरनाक रूप से बढ़ गया था। और जब विहिप और बीजेपी ने राम मंदिर के लिए ‘कारसेवा’ की घोषणा की, तो विभिन्न वर्गों और संस्थाओं की तरफ से बाबरी मस्जिद की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई गई।
लेकिन सिंह ने उन लोगों के डर को दूर करने की कोशिश करते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दिया, जिसमें यह सुनिश्चित करने का वादा किया गया था कि बाबरी मस्जिद के ढांचे को कोई नुकसान नहीं होगा। लेकिन ये एक ऐसा वादा साबित हुआ जिसे निभाने में सिंह असफल साबित हुए।
6 दिसंबर 1992 को वही हुआ जिसकी आशंका जताई जा रही थी। उन्मादी भीड़ ने बाबरी मस्जिद ढांचे को ढहा दिया। नतीजतन तुरत-फुरत में उत्तरप्रदेश की कल्याण सिंह सरकार को बर्खास्त कर दिया गया था और राज्य को राष्ट्रपति शासन के अधीन कर दिया गया था। उत्तर प्रदेश में पहली ही सरकार के इस तरह खत्म हो जाने से भाजपा और सिंह के लिए मुसीबत खड़ी हो गई थी।
भाजपा से ही बगावत
बाबरी विध्वंस के बाद के कुछ साल भाजपा और कल्याण सिंह दोनों के लिए चुनौती भरे थे। उस घटना के बाद उत्तर प्रदेश में पिछड़े और दलित जाति- आधारित राजनीति तेजी से उभरी और सूबे के राजनीतिक परिदृश्य पर समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) तेजी से हावी होती चली गई। हालांकि 1997 में, भाजपा एक बार फिर से सत्ता में काबिज होने में सफल हुई, लेकिन बसपा के साथ गठबंधन कर के।
कल्याण सिंह इस गठबंधन सरकार के साथ एक बार फिर उत्तर प्रदेश के भी मुखिया बने, लेकिन इस बार स्थितियां पहले जैसी नहीं थी। पार्टी में चल रही प्रतिस्पर्धा और सिंह की राजनीतिक शैली ने उनके विरोधियों के लिए मार्ग प्रशस्त किया। धीरे-धीरे ये मतभेद इतने बढ़ गए कि 1999 में सिंह ने भाजपा छोड़ दी और राष्ट्रीय क्रांति पार्टी की स्थापना की।
लेकिन ये एक ऐसा प्रयोग था जिसे ज्यादा सफलता नहीं मिली और जो कभी भाजपा के ‘स्वाभाविक नेता’ थे, हाशिए पर पहुंचते नजर आ रहे थे। हालांकि 2004 में वे फिर से बीजेपी में शामिल हुए, लेकिन इस बीच नदी में बहुत सा पानी बह चुका था।
दूसरी बगावत और एक अप्रत्याशित गठबंधन
पार्टी में अपनी खोई हुई जमीन को तलाशने में असमर्थ रहे सिंह ने एक बार फिर 2009 में जन क्रांति पार्टी बनाने के लिए भाजपा छोड़ दी। इसके बाद सिंह ने वो राजनीतिक कदम उठाया जिसकी उम्मीद बहुत कम लोगों को रही होगी।
असल में जन क्रांति पार्टी बनाने के बाद सिंह ने समाजवादी पार्टी के प्रमुख मुलायम सिंह यादव के साथ गठबंधन कर लिया। बता दें कि ये वही मुलायम सिंह यादव थे जिन्होंने 1989 में अपनी सरकार के समय में कारसेवकों पर गोली चलाने के आदेश दिए थे, और इसके चलते भाजपा उन्हें खलनायक के रूप में चित्रित करती रहती थी।
एक आखिरी घर वापसी और उसके बाद
2014 से पहले भाजपा में नरेंद्र मोदी युग की शुरूआत के साथ ही, किसी जमाने में हिंदुत्व के पोस्टर बॉय रहे सिंह के लिए एक बार फिर ‘घर वापसी’ करने का समय आ गया था। ये कोई छिपी हुई बात नहीं कि उस समय “हिंदू हृदय सम्राट” के तौर पर उभर रहे मोदी के दिल में अब भी सिंह के लिए उतनी ही जगह बाकी थी।
सिंह वापस पार्टी में आए और अपनी पूरी ताकत से इसकी सेवा करने का वादा किया। हालांकि बढ़ती उम्र को देखते हुए उन्होंने सक्रिय राजनीति से परहेज किया और बीजेपी ने उनकी जगह उनके बेटे राजवीर को उनके निर्वाचन क्षेत्र एटा से मौका दिया।
2014 में भारत के प्रधानमंत्री के तौर पर पद संभालने के बाद, मोदी ने जल्द ही सिंह को राजस्थान के राज्यपाल के रूप में नियुक्त किया। इस पद पर सिंह सितंबर 2019 तक रहे।





































