सनातन धर्म में कई सारे ग्रंथ, पुराण और शास्त्र है जिनमें रहस्यमयी जानकारियां छिपी हुई है इन्हीं वेदों और पुराणों में रुद्र का भी वर्णन मिलता है आध्यात्मिक और धार्मिक दोनों ही रूप में रुद्र को बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है वेदों में रुद्र का वर्णन है तो वही पुराणों में शिव का बखान किया गया है रुद्र का मानव रूप ही शिव हैऋग्वेद में रुद्र का वर्णन किया गया है इनको हिरण्यगर्भ यानी अग्नि के रूप में इस सृष्टि का रचयिता माना गया है ऋग्वेद में ऋचाओं में इनसे आयु, स्वास्थ्य और अपनी जीवन की रक्षा की कामना की गई है मान्यता है कि इन्हीं के द्वारा मानव जीवन संभव और सुरक्षित है तो आज हम अपने इस लेख द्वारा रुद्र और शिव से जुड़े अंतर पर चर्चा कर रहे हैं तो आइए जानते हैं।
धार्मिक पुराणों और शास्त्रों के अनुसार ब्रह्म के प्रकृति को मानव रूप दिया गया है जिससे सरल ढंग में भी सामान्य समाज समझ सके। मानव रूप में शिव आधार हैं शक्ति के प्रयोग का, इसलिए लिए शिव शंकर देवी काली के नीचे लेटे हैं ताकि संहार शक्ति का प्रयोग कल्याण के लिए हो। पुराणों में खासकर महिलाओं और कम पढ़े लिखें लोग जो संस्कृत के जानकार नहीं थे जिसे शूद्र कहा जाता है को ध्यान रख रचा गया। पुराणों की रचना इस बात की साक्षी है कि सनातनी व्यवस्था इस वर्ग के लिए भी सकारात्मक सोच के साथ जागरूक था।मानव समाज वैसा नहीं था जेसा वामपंथी और हिंदू विरोधी इतिहासकार ने अपने लेखन में दिखाया है वही ग्यारह रुद्र ग्यारह संस्कृतियों में प्रचलित शिव का सनातन संस्कृति में समापन है हिंदू धर्म में किसी भी संस्कृति को नष्ट करने की परंपरा नहीं रही है ऐसे में उनको हम अपने साथ लेकर चलने में ही विश्वास रखते हैं आपको बता दें कि वेद की तीन पद्धति मानी जाती है जिसमें ज्ञान मार्ग, उपासना मार्ग और कर्मकांड शामिल है इन्हीं पर चलकर मनुष्य को अपने जीवन में सफलता और मोक्ष की प्राप्ति होती है।



































