अमेरिका और ईरान के बीच जिस “नाजुक युद्धविराम” (Fragile Ceasefire) की उम्मीद दुनिया लगाए बैठी है, वह अब खतरे में नजर आ रहा है। इस्लामाबाद में वार्ता की मेज सजी है, लेकिन लेबनान की धरती से आने वाली बारूद की गंध ने कूटनीति की राह कठिन कर दी है।
लेबनान पर विवाद (The Lebanon Disagreement)
इस पूरे संकट का सबसे विवादास्पद बिंदु दक्षिणी लेबनान है। ईरान का दावा है कि इस्लामाबाद में होने वाले Peace Agreement के तहत लेबनान को भी सुरक्षा मिलनी चाहिए। हालांकि, इसके विपरीत Washington और Israel का रुख बिल्कुल स्पष्ट है:
- उनका कहना है कि प्रस्तावित युद्धविराम केवल सीधे टकराव को रोकने के लिए है।
- इजराइल ने स्पष्ट किया है कि हिज्बुल्लाह (Hezbollah) के ठिकानों पर उसकी सैन्य कार्रवाई जारी रहेगी।
- वाशिंगटन का तर्क है कि हिज्बुल्लाह को इस समझौते के दायरे में लाना संभव नहीं है।
राजनयिक प्रयासों में जटिलता (Diplomatic Complications)
मोजतबा खामेनेई के हालिया “सजा और मुआवजे” वाले बयान ने वार्ताकारों के लिए मुश्किलें बढ़ा दी हैं। अमेरिका के लिए एक ऐसी सरकार से बात करना चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है जो एक तरफ युद्धविराम की मेज पर है और दूसरी तरफ मुआवजे और दंड की मांग कर रही है। इजराइल द्वारा दक्षिणी लेबनान पर जारी हमलों ने ईरान के भीतर कट्टरपंथियों को यह कहने का मौका दे दिया है कि अमेरिका और उसके सहयोगी अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा नहीं कर रहे हैं।
युद्धविराम टूटने का खतरा (Risk of Collapse)
यदि इजराइल हिज्बुल्लाह पर अपने हमले जारी रखता है और मोजतबा खामेनेई होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण के अपने वादे को अमली जामा पहनाना शुरू करते हैं, तो 11 अप्रैल की Islamabad Peace Talks केवल एक औपचारिकता बनकर रह जाएगी।
मुख्य चुनौतियाँ:
- Lack of Consensus: युद्धविराम की सीमाओं (Geographical limits) पर सहमति न होना।
- Military Alert: ईरान की चेतावनी कि “उंगलियां अभी भी ट्रिगर पर हैं”।
- Strait of Hormuz: जहाजों पर लगने वाला ‘टैक्स’ और नए प्रबंधन का विवाद।
वर्तमान स्थिति को देखते हुए यह कहना गलत नहीं होगा कि मध्य पूर्व एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहाँ से एक तरफ शांति का पतला रास्ता जाता है और दूसरी तरफ एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध की गहरी खाई।



































