विशेष अदालत द्वारा सत्ता के दुरुपयोग पर न्याय की चोट उत्तर प्रदेश के संत कबीर नगर जिले से न्यायपालिका की ताकत को दर्शाने वाली एक अत्यंत महत्वपूर्ण खबर सामने आई है। जिले में जनप्रतिनिधियों से जुड़े आपराधिक मामलों की सुनवाई के लिए विशेष रूप से गठित एमपी-एमएलए कोर्ट (MP-MLA Court) ने एक कड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत की मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) व विशेष न्यायाधीश चेतना त्यागी ने कानून के शासन को सर्वोपरि मानते हुए पूर्व विधायक मोहम्मद ताबिश खान और उनके भाई इफ्तिखार को दोषी पाया है। यह पूरा मामला साल 2016 में एक पुलिस अधिकारी के साथ हुई मारपीट और अभद्रता से जुड़ा हुआ है। मजिस्ट्रेट चेतना त्यागी ने अपना निर्णय सुनाते हुए दोनों भाइयों को तीन-तीन साल जेल की कड़ी सजा का आदेश दिया है। इसके साथ ही, अदालत ने दोनों पर चार-चार हजार रुपये का नकद जुर्माना भी लगाया है, जिससे यह साबित होता है कि कानून के हाथ बहुत लंबे और निष्पक्ष होते हैं।
वर्ष दो हजार सोलह का वह विवादित और हिंसक दिन इस पूरे मुकदमे की शुरुआत आठ साल पहले हुई एक शर्मनाक घटना से हुई थी। सरकार की तरफ से इस मामले की पैरवी कर रहे अभियोजक विशाल श्रीवास्तव ने घटना की विस्तृत जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि यह विवाद 26 नवंबर 2016 को सामने आया था, जब संत कबीर नगर के धर्मसिंहवा थाने में तैनात सिपाही कमाल खान अपनी ड्यूटी कर रहे थे। उसी समय पूर्व विधायक मोहम्मद ताबिश खान अपने भाई और कई अन्य समर्थकों के हुजूम के साथ अचानक पुलिस स्टेशन के अंदर दाखिल हो गए। पुलिस थाने जैसी सुरक्षित जगह पर एक भीड़ द्वारा घुसकर हंगामा करना कानून-व्यवस्था का खुला मखौल उड़ाने जैसा था। इसी हिंसक और अप्रिय घटना के तुरंत बाद, पीड़ित पुलिस कांस्टेबल कमाल खान ने अपने उच्चाधिकारियों को सूचति करते हुए धर्मसिंहवा थाने में ही आरोपियों के खिलाफ नामजद प्राथमिकी (FIR) दर्ज करवा दी थी।
चुनावी खुन्नस निकालने के लिए सिपाही पर जानलेवा हमला कांस्टेबल कमाल खान की ओर से लिखाई गई शिकायत के पन्नों में उस दिन की बर्बरता का पूरा ब्यौरा दर्ज है। सिपाही ने अपनी एफआईआर में आरोप लगाया था कि ताबिश खान और उनके भाई इफ्तिखार ने थाने के अंदर उनके साथ अत्यंत ही अभद्र व्यवहार किया। उन्होंने न केवल गाली-गलौज की, बल्कि हाथापाई पर उतारू होते हुए कांस्टेबल की सरकारी वर्दी तक फाड़ डाली। पुलिसकर्मी को सरेआम धमकाने की इस घटना के पीछे की असली वजह एक राजनीतिक खुन्नस थी। शिकायत के अनुसार, कुछ समय पूर्व ही इलाके में ब्लॉक प्रमुख के चुनाव संपन्न हुए थे। उन चुनावों के दौरान कांस्टेबल कमाल खान ने पूरी ईमानदारी से अपनी ड्यूटी निभाई थी, जो आरोपियों को रास नहीं आई। उसी निष्पक्ष भूमिका की सजा देने और सिपाही को निशाना बनाने के दुर्भावनापूर्ण उद्देश्य से ही यह पूरी घटना को अंजाम दिया गया था।
कानून के रखवालों पर हमले की संगीन आपराधिक धाराएं सरकारी वकील विशाल श्रीवास्तव ने अदालत की कार्यवाही का विवरण देते हुए बताया कि पुलिस ने इस घटना को बेहद गंभीरता से लिया था। आरोपियों के खिलाफ केवल मामूली धाराओं में नहीं, बल्कि कई अत्यंत कठोर और संगीन धाराओं के तहत आपराधिक मुकदमा कायम किया गया था। इन धाराओं में मुख्य रूप से थाने के अंदर बलवा (दंगा) करने, एक व्यक्ति को जानबूझकर चोट पहुंचाने, अपनी सरकारी ड्यूटी कर रहे एक लोक सेवक के काम में बाधा डालने और उस पर हिंसक हमला करने जैसे आरोप शामिल थे। इसके अतिरिक्त, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने, जानबूझकर अपमान करने और भविष्य के लिए गंभीर आपराधिक धमकियां देने जैसी कई अन्य सख्त धाराएं भी लगाई गई थीं, ताकि आरोपियों को उनके किए की कड़ी सजा मिल सके और समाज में एक कड़ा संदेश जाए।
जमानत मिलने के बावजूद अंततः न्यायपालिका का कड़ा प्रहार न्याय की डगर लंबी जरूर होती है, लेकिन सत्य की जीत सुनिश्चित होती है, यह बात इस मामले में पूरी तरह से सच साबित हुई है। जब इस मामले में पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर कानूनी कार्यवाही शुरू की थी, तो उस समय आरोपियों ने अपनी राजनीतिक पहुंच और कानूनी दांवपेच का सहारा लेते हुए अदालत से जमानत प्राप्त कर ली थी। जमानत पर बाहर रहने के कारण वे कई सालों तक स्वतंत्र रूप से घूमते रहे। हालांकि, अदालत में इस मामले की सघन सुनवाई, गवाहों के परीक्षण और सबूतों पर बहस का दौर अनवरत चलता रहा। वर्षों तक चली इस लंबी और थकाऊ न्यायिक प्रक्रिया के बाद, आखिरकार शुक्रवार को अदालत ने दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया। विशेष अदालत ने सभी सबूतों को पुख्ता मानते हुए दोनों आरोपियों को इस घृणित कृत्य के लिए पूरी तरह से दोषी ठहराया और कारावास की सजा सुना दी।
खेसरहा विधानसभा से शुरू हुआ था राजनीतिक सफर सजायाफ्ता मोहम्मद ताबिश खान का इस क्षेत्र में अपना एक राजनीतिक वजूद रहा है। उनका यह सियासी सफर कई साल पुराना है। अगर हम उनके पुराने राजनीतिक जीवन पर नजर डालें, तो ज्ञात होता है कि उन्होंने अपनी बड़ी राजनीतिक पारी की शुरुआत बहुजन समाज पार्टी (BSP) के साथ की थी। साल 2007 में जब उत्तर प्रदेश में विधानसभा के चुनाव हुए थे, तब बसपा ने उन पर विश्वास जताते हुए उन्हें खेसरहा विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र से अपना प्रत्याशी घोषित किया था। उस चुनाव में ताबिश खान ने जीत हासिल करते हुए खेसरहा सीट से विधायकी का चुनाव जीता था और विधानसभा की सीढ़ियां चढ़ी थीं। एक समय जो व्यक्ति जनता की आवाज बनकर कानून बनाने वाले पवित्र सदन में बैठा था, आज उसी व्यक्ति को कानून तोड़ने और एक वर्दीधारी रक्षक पर हमला करने के संगीन जुर्म में तीन साल के लिए सलाखों के पीछे भेज दिया गया है।



































