कूटनीतिक मंच पर ईरान का कड़ा रुख और वार्ता का बहिष्कार अंतरराष्ट्रीय संबंधों के पटल पर एक बार फिर से अमेरिका और ईरान के बीच की तल्खी खुलकर सामने आ गई है। ईरान ने एक अत्यंत साहसिक और कड़ा कूटनीतिक कदम उठाते हुए अमेरिका को चौंका दिया है। प्राप्त जानकारी के अनुसार, पाकिस्तान के इस्लामाबाद शहर में दोनों देशों के मध्य लंबे समय से चले आ रहे विवादों को सुलझाने के लिए दूसरे चरण की शांति वार्ता आयोजित करने की योजना बनाई जा रही थी। लेकिन, तेहरान ने अंतिम क्षणों में एकतरफा फैसला लेते हुए इस शांति वार्ता का पूर्ण रूप से बहिष्कार कर दिया है। इस महत्वपूर्ण घटनाक्रम की सार्वजनिक पुष्टि ईरान की आधिकारिक और राज्य-संचालित समाचार एजेंसी ‘इस्लामिक रिपब्लिक न्यूज एजेंसी’ (IRNA) द्वारा की गई है। आईआरएनए ने माइक्रोब्लॉगिंग साइट एक्स पर एक स्पष्ट संदेश जारी करते हुए यह ऐलान किया है कि इस्लामी गणराज्य ईरान अब अमेरिका के साथ इस प्रस्तावित दूसरे दौर की बातचीत की मेज पर नहीं बैठेगा।
वार्ता रद्द करने के पीछे ईरान द्वारा बताए गए ठोस कारण ईरान ने बिना किसी कारण के इस वार्ता से मुंह नहीं मोड़ा है, बल्कि उसने इसके पीछे अमेरिका की हठधर्मिता को जिम्मेदार ठहराया है। आईआरएनए के हवाले से जारी किए गए आधिकारिक बयान में स्पष्ट किया गया है कि ईरान के वार्ता से दूर रहने का मुख्य कारण वाशिंगटन का अड़ियल और अनुचित रवैया है। ईरान का कड़ा विरोध इस बात पर है कि अमेरिका लगातार ऐसी ज्यादा और भारी मांगें कर रहा है जिन्हें पूरा करना तेहरान के लिए असंभव है। इसके साथ ही, अमेरिका की तरफ से रखी जा रही अवास्तविक अपेक्षाएं, बातचीत के हर चरण में उनके कूटनीतिक रुख में होने वाला निरंतर बदलाव, और उनके बयानों में दिखने वाला भारी विरोधाभास इस वार्ता को निरर्थक बना रहा है। सबसे बड़ा मुद्दा ईरान के खिलाफ अमेरिका द्वारा लगातार जारी रखी गई आक्रामक नौसैनिक नाकाबंदी है। ईरान इसे एक सामान्य कूटनीतिक दबाव नहीं, बल्कि दोनों देशों के बीच लागू सीजफायर का खुला और सीधा उल्लंघन मानता है।
ट्रंप की चेतावनी और बुनियादी ढांचे को नष्ट करने का अल्टीमेटम इस तनाव को चरम पर पहुंचाने में अमेरिकी राजनीतिक नेतृत्व की धमकियों का भी बड़ा हाथ है। शांति वार्ता से ईरान के हटने की घोषणा से ठीक पहले, रविवार के दिन पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया नेटवर्क ‘ट्रुथ सोशल’ का उपयोग करते हुए ईरान को एक बहुत ही खतरनाक अल्टीमेटम दिया था। ट्रंप ने अपने शब्दों में जरा भी नरमी न बरतते हुए स्पष्ट रूप से कहा था कि यदि ईरान मौजूदा परिस्थितियों में अमेरिका द्वारा पेश किए गए नए समझौते को स्वीकार करने से इनकार करता है, तो इसके परिणाम भयावह होंगे। उन्होंने खुली धमकी दी कि ऐसी स्थिति में अमेरिकी सैन्य बल कार्रवाई करने से पीछे नहीं हटेंगे और वे ईरान के महत्वपूर्ण पुलों और देश को रोशन करने वाले विशाल पावर प्लांट (बिजली संयंत्रों) को मलबे में तब्दील कर देंगे।
इस्लामाबाद में नई डील की पेशकश और सैन्य कार्रवाई का खौफ ट्रंप ने अपनी धमकियों के बीच इस बात का भी खुलासा किया कि कूटनीतिक प्रयास पूरी तरह से बंद नहीं हुए हैं। उन्होंने जानकारी दी कि उनका एक विशेष वार्ताकार दल सोमवार को पाकिस्तान के इस्लामाबाद पहुंच रहा है। इस अमेरिकी टीम का मुख्य उद्देश्य ईरान के सामने एक सर्वथा नई, पारदर्शी और कथित तौर पर उचित शर्तों वाली डील (समझौता) प्रस्तुत करना है। हालांकि, यह कूटनीतिक पेशकश भारी सैन्य दबाव के साये में की जा रही है। ट्रंप ने अपनी बात को दोहराते हुए एक बार फिर यह स्पष्ट किया कि यदि ईरानी नेतृत्व ने इस बार भी अड़ियल रवैया अपनाया और इस्लामाबाद में पेश की गई इस डील को खारिज कर दिया, तो अमेरिका के पास ईरान के बुनियादी ढांचों, विशेषकर उनके पावर प्लांट और पुलों को तबाह करने के अलावा कोई और विकल्प नहीं बचेगा।
समुद्री क्षेत्र में बढ़ता तनाव और जहाजों पर हमले की रिपोर्ट केवल राजनीतिक मंच पर ही नहीं, बल्कि समुद्र की लहरों पर भी दोनों देशों के बीच युद्ध जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई है। ट्रंप ने अपने बयानों में ईरान पर एक बहुत ही गंभीर सैन्य आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि ईरान ने हाल ही में व्यापारिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य में अकारण गोलीबारी की घटनाओं को अंजाम दिया है। अमेरिका का तर्क है कि यह गोलीबारी न केवल एक आक्रामक कृत्य है, बल्कि यह सीधे तौर पर दोनों पक्षों के बीच सहमति से लागू किए गए युद्धविराम का नकारा जाना है। ट्रंप के अनुसार, ईरानी सैन्य बलों द्वारा दागे गए गोलों का लक्ष्य कोई सैन्य पोत नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक जहाज थे। उन्होंने विशेष रूप से यह दावा किया कि इस गोलीबारी की चपेट में एक फ्रांसीसी जहाज और एक ब्रिटिश मालवाहक पोत (फ्रेटर) आए हैं, जो अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानूनों का खुला उल्लंघन है।
युद्धविराम टूटने की कगार पर और भविष्य की अनिश्चितताएं राजनीतिक विश्लेषकों और अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों की राय में ईरान का यह अप्रत्याशित कदम एक बहुत बड़े खतरे की घंटी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बहिष्कार ऐसे समय में हुआ है जब दोनों देशों के बीच लागू मौजूदा युद्धविराम की समय सीमा खत्म होने में महज कुछ ही दिन शेष बचे हैं। इस घटनाक्रम ने क्षेत्र में शांति स्थापित करने और तनाव को कम करने की बची-खुची उम्मीदों पर भी पानी फेर दिया है और नए सिरे से युद्ध की आशंकाओं को जन्म दे दिया है। ईरान ने वार्ता के इस दुखद अंत के लिए पूरी तरह से वाशिंगटन की आक्रामक नीतियों और अनुचित दबाव को कटघरे में खड़ा किया है। अब पूरी दुनिया की नजरें अमेरिका के अगले कदम पर हैं कि वह इस कूटनीतिक झटके का जवाब कैसे देता है। यह तय है कि ईरान के इस कड़े रुख से पूरे मिडिल ईस्ट (मध्य पूर्व) में अस्थिरता और संकट का एक नया और गहरा दौर शुरू हो सकता है।



































