प्राकृतिक आपदा का कहर और सीस्मोलॉजी रिपोर्ट मंगलवार की सुबह मणिपुर के निवासियों के लिए भय की दस्तक लेकर आई, जब 5.2 की तीव्रता वाले भूकंप ने पूरे क्षेत्र को हिलाकर रख दिया। राष्ट्रीय भूकंप विज्ञान केंद्र (NCS) की रिपोर्ट बताती है कि इस झटके की गहराई सतह से 62 किलोमीटर नीचे थी, जिसके कारण इसके झटके दूर-दराज के राज्यों जैसे असम, मेघालय और नागालैंड तक महसूस किए गए। यद्यपि भूकंप की तीव्रता मध्यम से तेज श्रेणी की थी, किंतु सौभाग्यवश तत्काल प्रभाव से किसी इमारत के गिरने या किसी व्यक्ति के हताहत होने की सूचना प्राप्त नहीं हुई है। आपदा प्रबंधन विभाग ने क्षेत्र में सर्वेक्षण शुरू कर दिया है ताकि आंतरिक इलाकों की स्थिति का जायजा लिया जा सके।
भूकंप का सटीक समय और जनता की प्रतिक्रिया कामजोंग को केंद्र बनाकर आए इस भूकंप का समय सुबह 05:59:33 बजे दर्ज किया गया। सुबह की पहली किरण के साथ आए इस कंपन ने लोगों को बिस्तर छोड़ने पर मजबूर कर दिया। घरों के बर्तन गिरने और छतों के चरमराने की आवाजों के बीच लोग ‘भूकंप-भूकंप’ चिल्लाते हुए गलियों में एकत्र हो गए। उत्तर-पूर्व भारत के इस हिस्से में भूकंप आना कोई नई बात नहीं है, लेकिन वर्तमान सामाजिक तनाव के बीच इस प्राकृतिक झटके ने लोगों की मानसिक व्याकुलता को और अधिक बढ़ा दिया है। लोग काफी समय तक सुरक्षित स्थानों पर ही दुबके रहे।
हिंसा की आग में जलता मणिपुर और सुरक्षा चुनौतियां भूकंपीय हलचल के बीच मणिपुर में जारी सांप्रदायिक और राजनीतिक हिंसा ने स्थिति को और अधिक जटिल बना दिया है। राज्य के पहाड़ी और मैदानी इलाकों में लगातार हो रही हत्याओं और उपद्रवों ने प्रशासन की नींद उड़ा रखी है। इसी माह की शुरुआत में संदिग्ध चरमपंथियों द्वारा किए गए हमलों में कई नागरिकों और बच्चों को निशाना बनाया गया, जिससे पूरे राज्य में आक्रोश की लहर दौड़ गई है। जगह-जगह हो रहे विरोध प्रदर्शनों और बंद के कारण सुरक्षा बलों को हाई अलर्ट पर रखा गया है, फिर भी उपद्रवी तत्व अशांति फैलाने के नए रास्ते खोज रहे हैं।
आर्थिक और सामाजिक गतिविधि पर बंद का प्रहार मणिपुर के विभिन्न जिलों में सोमवार को जनजीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त रहा। मैतेई बहुल घाटी क्षेत्रों और नागा प्रभुत्व वाले उखरुल व सेनापति जैसे पहाड़ी जिलों में संगठनों द्वारा बुलाए गए बंद का पूर्ण प्रभाव देखा गया। सभी निजी और सरकारी स्कूल, कॉलेज तथा दुकानें बंद रहीं। सार्वजनिक वाहनों का आवागमन न होने के कारण यात्रियों और मरीजों को अस्पताल पहुँचने में भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। यह बंद उन मासूमों की याद में और न्याय की मांग के लिए बुलाया गया है जिन्होंने हालिया हमलों में अपनी जान गंवाई है।
महिला संगठनों का कड़ा रुख और पांच दिवसीय हड़ताल इम्फाल घाटी के उरीपोक और नागरम जैसे क्षेत्रों में ‘मीरा पैबिस’ (महिला कार्यकर्ताओं) ने कमान संभाल ली है। उन्होंने बिष्णुपुर में हुए उस कायराना बम विस्फोट के विरोध में पांच दिनों की पूर्ण बंदी की घोषणा की है, जिसने एक परिवार को पूरी तरह तबाह कर दिया। 7 अप्रैल की उस रात ने सबको रुला दिया जब एक पांच वर्षीय बालक और उसकी नन्हीं बहन की नींद में ही बम धमाके से मौत हो गई। उनकी माँ आज भी अस्पताल में जिंदगी और मौत की जंग लड़ रही है। इस घटना ने समाज के हर वर्ग के भीतर गुस्से की अग्नि प्रज्वलित कर दी है।
सीआरपीएफ कैंप पर हमला और गोलीबारी की घटना जैसे-जैसे आक्रोश बढ़ा, विरोध प्रदर्शनों ने हिंसक मोड़ ले लिया। एक उत्तेजित भीड़ ने सीआरपीएफ के कैंप को निशाना बनाने और वहां घुसने की कोशिश की, जिससे स्थिति अनियंत्रित हो गई। भीड़ को तितर-बितर करने के लिए की गई सुरक्षा बलों की कार्रवाई और गोलीबारी में तीन व्यक्तियों की मृत्यु हो गई और दर्जनों लोग घायल हुए। अस्पताल के आंकड़ों के अनुसार, घायलों में कई की स्थिति गंभीर है। मणिपुर आज एक ऐसे दोराहे पर खड़ा है जहाँ एक तरफ प्राकृतिक आपदाओं का जोखिम है और दूसरी तरफ अपनों के बीच ही फैला विद्वेष और खून-खराबा है।



































