विधानसभा के समक्ष विरोध की गूँज 69 हजार शिक्षक भर्ती मामले में न्याय की प्रतीक्षा कर रहे अभ्यर्थियों ने 22 अप्रैल को लखनऊ की सड़कों पर उतरकर एक बार फिर सरकार के विरुद्ध बिगुल फूंक दिया। विधानसभा का घेराव करने पहुँचे इन अभ्यर्थियों ने विरोध स्वरूप अपने गले में झाड़ू और मटकी बांधी हुई थी, जो शासन के प्रति उनके गहरे तिरस्कार को प्रदर्शित कर रहा था। भारी संख्या में जुटे इन प्रदर्शनकारियों ने जमकर नारेबाजी की और अपनी नियुक्तियों की मांग को लेकर अड़े रहे। इस विरोध प्रदर्शन ने एक बार फिर उत्तर प्रदेश के शिक्षा विभाग और भर्ती बोर्ड की कार्यप्रणाली को सुर्खियों में ला दिया है।
सरकार की मंशा पर उठाए गए सवाल प्रदर्शनकारी युवाओं का सीधा आरोप है कि योगी आदित्यनाथ सरकार दलित और पिछड़ा वर्ग के अभ्यर्थियों को रोजगार देने के पक्ष में नहीं है। अभ्यर्थियों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट में चल रहे मुकदमे में सरकार की ओर से जानबूझकर ढिलाई बरती जा रही है और कोई वरिष्ठ वकील पक्ष रखने के लिए नहीं भेजा जा रहा है। उचित पैरवी के अभाव में यह मामला निरंतर खिंचता जा रहा है। अभ्यर्थियों का तर्क है कि यदि सरकार वास्तव में न्याय करना चाहती, तो वह प्रभावी कानूनी कदम उठाकर इस विवाद का समाधान बहुत पहले ही कर चुकी होती।
हिरासत और ईको गार्डन का स्थानांतरण विधानसभा परिसर को घेरने की कोशिश कर रहे सैकड़ों अभ्यर्थियों को यूपी पुलिस ने बलपूर्वक रोक दिया। स्थिति को बिगड़ते देख पुलिस ने दर्जनों प्रदर्शनकारियों को हिरासत में ले लिया और उन्हें धरना स्थल ईको गार्डन की ओर रवाना कर दिया। अभ्यर्थियों का कहना है कि वे पिछले 3 वर्षों से लगातार आरक्षण में हुई धांधली का विरोध कर रहे हैं, लेकिन सरकार सुनने के बजाय पुलिस का प्रयोग कर रही है। ईको गार्डन में भी अभ्यर्थियों ने अपना धरना जारी रखा है और वे मुख्यमंत्री से सीधे संवाद की मांग कर रहे हैं ताकि भर्ती का रास्ता साफ हो सके।
नई चयन सूची पर अटकी कानूनी प्रक्रिया यह विवाद तब और गहरा गया जब इलाहाबाद हाई कोर्ट ने जून 2020 और जनवरी 2022 की पुरानी सूचियों को खारिज करते हुए सरकार को तगड़ा झटका दिया था। कोर्ट ने यूपी सरकार को यह जिम्मेदारी सौंपी थी कि वह 2019 की एटीआरई परीक्षा के आधार पर नए सिरे से 69 हजार शिक्षकों की सूची तैयार करे और इसे तीन महीने की समय-सीमा में लागू करे। आदेश के बावजूद नई सूची जारी न होने और कानूनी अड़चनों के कारण हजारों चयनित अभ्यर्थियों की नियुक्तियां अधर में लटकी हुई हैं, जिससे उनकी नाराजगी चरम पर है।
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और अधूरी पहल शिक्षक भर्ती का यह मामला अब सर्वोच्च न्यायालय की चौखट पर है, जहाँ साल 2024 में इसकी पहली सुनवाई हुई थी। अभ्यर्थियों का मानना है कि सरकार की निष्क्रियता इस देरी की मुख्य वजह है। उनका कहना है कि जब तक सरकार की ओर से कोर्ट में ठोस हलफनामा और स्पष्ट नीति पेश नहीं की जाती, तब तक सुप्रीम कोर्ट से कोई अंतिम फैसला आना मुश्किल है। सरकारी रवैये से क्षुब्ध ये युवा अब आर-पार की लड़ाई लड़ने का मन बना चुके हैं, क्योंकि वे वर्षों से मानसिक और आर्थिक तनाव झेलने को मजबूर हैं।
छह वर्षों का संघर्ष और आरक्षित सीटों का संकट प्रदर्शनकारियों के अनुसार, यह केवल एक भर्ती का सवाल नहीं बल्कि 19 हजार सीटों पर आरक्षण के सही कार्यान्वयन का मुद्दा है। आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थी पिछले 6 सालों से सड़कों पर संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन उनकी मांगें अनसुनी रह गई हैं। उन्होंने प्रशासन पर आरोप लगाया है कि कई जिलों में प्रमुख आंदोलनकारियों को हाउस अरेस्ट कर उनके लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन किया जा रहा है। इन चुनौतियों के बावजूद, अभ्यर्थियों का संकल्प है कि वे आरक्षण के इस कथित घोटाले को बेनकाब करके ही दम लेंगे और अपना अधिकार प्राप्त करेंगे।



































