सत्तारूढ़ प्रशासन के विरुद्ध जन आक्रोश नेपाल की नवनिर्वाचित बालेन शाह सरकार अपने कार्यकाल के शुरुआती दिनों में ही एक बड़े संकट के भंवर में फंस गई है। सरकार द्वारा भारत से आयातित व्यक्तिगत वस्तुओं पर लगाए गए सीमा शुल्क ने नागरिकों को आंदोलित कर दिया है। 100 नेपाली रुपये से अधिक की किसी भी वस्तु पर टैक्स वसूलने का आदेश जनता के लिए गले की फांस बन गया है। भारत-नेपाल सीमा पर स्थित व्यापारिक केंद्रों में लोग सरकार के इस फरमान के विरुद्ध नारेबाजी कर रहे हैं। आम जनमानस का मानना है कि इस तरह के छोटे करों से केवल गरीबों का उत्पीड़न हो रहा है, जिसके विरोध में पूरे देश में प्रदर्शन तेज हो गए हैं।
सख्ती के साथ नियमों का नया दौर अप्रैल महीने की पहली तारीख से लागू हुए इस नियम ने सीमावर्ती क्षेत्रों की तस्वीर बदल दी है। यद्यपि प्रशासन का कहना है कि यह नियम पुराना है, परंतु बालेन सरकार ने इसे जिस कड़ाई से लागू करने का निर्देश दिया है, वह पहले कभी नहीं देखा गया। सशस्त्र प्रहरी बल (APF) को सीमा चौकियों पर तैनात कर हर छोटे-बड़े सामान की सघन तलाशी ली जा रही है। चीनी, दाल, तेल और यहाँ तक कि घर में इस्तेमाल होने वाली साधारण सब्जियों पर भी ड्यूटी लगाई जा रही है। स्थानीय अधिकारियों को जो रियायत देने का अधिकार पहले प्राप्त था, उसे अब पूरी तरह समाप्त कर दिया गया है, जिससे सीमा पर स्थिति गंभीर हो गई है।
तराई और बीरगंज में बढ़ा तनाव नेपाल का तराई इलाका, जो अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण खरीदारी के लिए भारतीय बाजारों पर आश्रित है, इस निर्णय से सबसे अधिक प्रभावित हुआ है। बीरगंज की सड़कों पर व्यापारियों और मधेशी युवाओं का भारी जमावड़ा देखा जा रहा है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि भारत के साथ नेपाल के संबंध रोटी-बेटी के हैं और दैनिक उपभोग की वस्तुओं पर टैक्स लगाना एक तरह का आर्थिक शोषण है। सीमा पर लगी लंबी कतारें और लोगों की परेशानी सरकार के प्रति नफरत में बदल रही है। स्थानीय लोगों के अनुसार, सरकार उन्हें अपनी जरूरतों के लिए संघर्ष करने पर मजबूर कर रही है।
विपक्ष की सक्रियता और सामाजिक न्याय का सवाल नेपाली राजनीति के गलियारों में बालेन शाह के इस कदम की चौतरफा आलोचना हो रही है। मुख्य विपक्षी दल नेपाली कांग्रेस ने सरकार को चेतावनी दी है कि वे जनता की भावनाओं के साथ खिलवाड़ न करें। विपक्षी नेताओं का कहना है कि यह निर्णय देश के गरीब तबके को कुचलने जैसा है और इससे सामाजिक समरसता बिगड़ सकती है। न केवल विपक्षी दल, बल्कि काठमांडू के जागरूक नागरिक और कुछ सत्ताधारी गठबंधन के सहयोगी भी इस फैसले को अव्यवहारिक मान रहे हैं। सीमावर्ती जिलों में रहने वाले मध्यम वर्गीय परिवारों के बीच सरकार की साख तेजी से गिर रही है।
आर्थिक सुदृढ़ीकरण पर सरकार का स्पष्टीकरण विरोध की आग को देखते हुए सरकार ने स्पष्ट किया है कि उसका इरादा जनता को परेशान करना नहीं, बल्कि नेपाल की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाना है। सरकार के आर्थिक सलाहकारों का मानना है कि सीमा शुल्क में होने वाली चोरी से देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा था। सीमा शुल्क विभाग का तर्क है कि भारत के साथ बढ़ते व्यापार असंतुलन को रोकने के लिए आयात पर नियंत्रण आवश्यक है। सरकार चाहती है कि लोग बाहरी सामानों के बजाय स्वदेशी उत्पादों का उपयोग करें, जिससे स्थानीय उद्योगों को फलने-फूलने का अवसर मिले और देश आत्मनिर्भरता की ओर बढ़े।
आंदोलन की आहट और बालेन शाह की परीक्षा नेपाल में वर्तमान अशांति का माहौल संकेत दे रहा है कि यदि सरकार ने तत्काल वार्ता का रास्ता नहीं अपनाया, तो यह विरोध प्रदर्शन एक बड़ी क्रांति में तब्दील हो सकता है। युवाओं के बीच लोकप्रिय रहे बालेन शाह के लिए यह समय बहुत नाजुक है, क्योंकि उनका एक गलत फैसला उनकी लोकप्रियता को स्थायी नुकसान पहुँचा सकता है। यह विवाद न केवल एक आर्थिक मुद्दा है, बल्कि बालेन शाह की राजनीतिक कुशलता और शासन क्षमता की कसौटी भी है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि नेपाल सरकार इस जटिल समस्या का समाधान कैसे निकालती है।



































