अमेरिका और ईरान के बीच पहले राउंड की हुई भारी गहमा-गहमी साफ तौर पर यह बता रही है कि यह वैश्विक बातचीत आगे बिल्कुल भी आसान नहीं होने वाली है। इसका मुख्य कारण यह है कि परमाणु प्रोग्राम को लेकर दोनों देशों के बीच का विवाद सुलझने के बजाय और ज्यादा गहरा गया है। ईरान अब इस बात पर पूरी तरह अड़ गया है कि उसके शांतिपूर्ण एटमी कार्यक्रम को दुनिया की कोई भी ताकत नहीं रोक सकती है। इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर स्विटजरलैंड में बातचीत को आगे बढ़ाने को लेकर ईरानी डेलीगेशन लगातार बेहद सख्त और कड़ा रुख अख्तियार कर चुका है।
राष्ट्रपति का कड़ा रुख ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान ने देश के परमाणु अधिकारों को लेकर एक बेहद मजबूत और आधिकारिक बयान जारी किया है। उन्होंने वाशिंगटन को कड़ा संदेश देते हुए कहा कि हम किसी भी देश की जबरदस्ती, दमन और अपमान के आगे कभी नहीं झुकेंगे। उन्होंने आगे कहा कि हम अपनी तरक्की और देश के विकास के अधिकार को किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ेंगे और अमेरिकी नेताओं को हमारी यह बात हर हाल में माननी ही होगी। ईरान इस मामले में इतना सख्त है कि वह अब अपने देश के अपमान के बदले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से सार्वजनिक रूप से माफी की मांग भी कर चुका है।
ट्रंप की सैन्य धमकी यह पूरा अंतरराष्ट्रीय विवाद तब शुरू हुआ जब जेनेवा में चल रही शांति वार्ता के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को एक भयानक अंजाम भुगतने की धमकी दी। ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर लिखा कि अगर ईरान ने हिजबुल्लाह को नहीं रोका, तो अमेरिका उस पर पिछले हफ्ते से भी ज्यादा बड़ा हमला करने के लिए तैयार है। ट्रंप की इस सीधी सैन्य धमकी के बाद ईरान की नेशनल असेंबली के स्पीकर मोहम्मद बाघेर गलीबाफ ने तुरंत करारा जवाब दिया। उन्होंने कहा कि अगर अमेरिकी धमकियां इतनी ही असरदार होतीं, तो वॉशिंगटन आज वैश्विक मंच पर इस तरह की खराब स्थिति में कभी नहीं पहुंचता।
वार्ताकारों के नरम सुर इस बेहद तनावपूर्ण कूटनीतिक माहौल के बीच एक दिलचस्प बात यह है कि डेलीगेशन में मौजूद अमेरिकी प्रतिनिधियों के सुर काफी नरम दिखाई दे रहे हैं। अमेरिका की तरफ से डेलीगेशन के लीडर जेडी वेंस ने सकारात्मक रुख दिखाते हुए कहा कि अमेरिका अब ईरान के साथ अपने सभी पुराने विवादों और पुरानी बातों को पीछे छोड़ने के लिए पूरी तरह तैयार है। दोनों देशों के बीच हस्ताक्षरित हुए एमओयू (MOU) के तहत ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर 60 दिन के भीतर एक ठोस समझौते पर सहमत होने का लक्ष्य रखा गया है। हालांकि, अमेरिकी प्रतिनिधियों ने यह भी साफ कर दिया है कि ईरान को परमाणु हथियार विकसित करने की अनुमति कभी नहीं मिलेगी।
राहत और वित्तीय ड्राफ्ट पहले दौर की इस 82 मिनट की बातचीत के दौरान दोनों पक्षों के बीच कुछ महत्वपूर्ण वित्तीय और रणनीतिक सहमति भी बनती हुई दिखाई दी थी। ईरानी प्रतिनिधिमंडल के एक सदस्य ने सरकारी मीडिया को बताया कि पहले दौर की वार्ता में ईरानी तेल पर लगे अमेरिकी प्रतिबंधों में बड़ी राहत देने वाले ड्राफ्ट को अंतिम रूप दे दिया गया है। इस समझौते के तहत कतर में फ्रीज किए गए ईरान के 6 अरब डॉलर की बड़ी रकम को भी वापस जारी किया जाना तय हुआ है। ईरान ने अपनी इस फ्रीज की गई विदेशी संपत्ति को वापस पाने और अपने एनर्जी सेक्टर पर लगे कड़े प्रतिबंधों में ढील देने पर अमेरिकी टीम के साथ विस्तार से चर्चा की।
मध्यस्थों की कोशिशें जारी ईरान की सरकारी समाचार एजेंसी आईआरएनए (IRNA) के अनुसार, ट्रंप के इस अपमानजनक बयान के कारण अब बातचीत का भविष्य काफी अनिश्चित और बेहद मुश्किल दौर में पहुंच गया है। इस बीच, बैठक से ईरान के वॉकआउट करने के बाद मध्यस्थता कर रहे पाकिस्तान और कतर के राजनयिकों ने ईरानी दल को मनाने की काफी कोशिशें कीं, लेकिन वे तुरंत सफल नहीं हो सके। दूसरी ओर, एसोसिएटेड प्रेस की रिपोर्ट बताती है कि ईरानी दल ने मध्यस्थों से नाता तोड़ने का कोई संकेत नहीं दिया है और वे प्रक्रिया में बने हुए हैं। इस कूटनीतिक खींचतान के बीच इज़रायल ने भी घोषणा कर दी है कि उसकी फौज दक्षिणी लेबनान के ब्यू-फोर्ट कॉसल से पीछे नहीं हटेगी।





































