बाराबंकी के टिकरिया गांव में जमीन को लेकर उठा विवाद अब एक नया मोड़ ले चुका है। लखनऊ के रहने वाले प्रॉपर्टी डीलर आनंद वर्मा ने सत्ता पक्ष के नेता पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने जमीन पर जबरन कब्जा करने और मजदूरों को पीटने का दावा प्रमुखता से किया है। लेकिन भाजपा एमएलसी अंगद सिंह ने इन सभी आरोपों को बेबुनियाद और पूरी तरह से मनगढ़ंत बताया है। उन्होंने इस पूरे प्रकरण की असली कहानी सामने रखकर शिकायतकर्ता के दावों की हवा निकाल दी है।
कंपनी और पुरानी रजिस्ट्री: आरोपी नेता के अनुसार विवादित जमीन की सच्चाई शिकायतकर्ता के दावों से बिल्कुल अलग है। उनका कहना है कि यह विवादित जमीन आज से करीब चौदह साल पहले ही बिक चुकी थी। शिकायतकर्ता आनंद वर्मा उस समय ‘मैपल्स’ नाम की एक रियल एस्टेट कंपनी का संचालन करते थे। उन्होंने अपनी इसी कंपनी के माध्यम से फरवरी दो हजार बारह में इस जमीन का सौदा किया था। उस समय दो हजार स्क्वायर फीट की इस जमीन की पूरी रजिस्ट्री एक महिला के नाम कर दी गई थी।
सरकारी कागजों में दर्ज नाम: जमीन की इस पुरानी खरीद-फरोख्त में सभी कानूनी प्रक्रियाओं का पूरी तरह से पालन किया गया था। यह रजिस्ट्री दुर्गावती नाम की एक महिला के पक्ष में पूरी तरह से कानूनी रूप से की गई थी। रजिस्ट्री होने के बाद राजस्व विभाग के सरकारी कागजों में दाखिल-खारिज की प्रक्रिया भी पूरी हो गई थी। इसका सीधा मतलब है कि सरकारी रिकॉर्ड में यह जमीन पूरी तरह से उस महिला के नाम दर्ज थी। इसलिए अब इतने सालों बाद इस जमीन पर पुराने मालिक का दावा करना पूरी तरह से गलत है।
वसीयत और वारिस: इस जमीन की कानूनी स्थिति समय के साथ आगे बढ़ती रही और नए वारिसों के नाम दर्ज हुए। कुछ समय बाद जमीन की मालकिन दुर्गावती जी का दुखद रूप से निधन हो गया था। उनके निधन के बाद उनकी लिखी गई वसीयत के आधार पर कानूनी प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया। इस वसीयत के अनुसार यह दो हजार स्क्वायर फीट की जमीन उनके पांच बच्चों के नाम आ गई। इसके बाद त्रिपाठी परिवार के ये सभी बच्चे इस विवादित जमीन के वैध और कानूनी मालिक बन गए।
नियमों के तहत खरीद: जमीन खरीदने वाले नेता ने अपने पक्ष में बेहद मजबूत और वैध कानूनी तर्क दिए हैं। एमएलसी अंगद सिंह का कहना है कि इस विवादित जमीन के ठीक पीछे उनका अपना एक प्लॉट मौजूद है। उनका यह अपना प्लॉट गाटा संख्या दो सौ सोलह में स्थित है जो इस जमीन से सटा हुआ है। इसलिए उन्होंने पूरी कानूनी जांच-पड़ताल करने के बाद नियमों के तहत त्रिपाठी परिवार से यह जमीन खरीदी है। उन्होंने इस जमीन की अपने नाम पर एकदम वैध तरीके से पूरी रजिस्ट्री करवा ली है।
झूठे दावों की पोल: इस पूरी कानूनी व्याख्या के बाद प्रॉपर्टी डीलर के सभी दावे बहुत ही कमजोर नजर आते हैं। अंगद सिंह का स्पष्ट कहना है कि जब जमीन साल दो हजार बारह में ही बिक चुकी है तो विवाद कैसा। उनके अनुसार अब इस बेची जा चुकी जमीन पर हक जताने का कोई मतलब ही नहीं बनता है। उनके ऊपर लगाए गए तोड़फोड़ और जबरन कब्जे के सभी आरोप पूरी तरह से झूठे साबित होते हैं। यह पूरी कवायद केवल एक साफ-सुथरी छवि वाले नेता को बेवजह राजनीतिक रूप से बदनाम करने के लिए है।





































