प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली कैबिनेट की नियुक्ति समिति ने एक बहुत ही बड़े फैसले को अपनी अंतिम मंजूरी दी है। केंद्र सरकार ने गुरुवार को वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी महेश दीक्षित को इंटेलिजेंस ब्यूरो का नया निदेशक नियुक्त कर दिया है। यह नियुक्ति देश के खुफिया तंत्र के नेतृत्व में एक अहम और रणनीतिक बदलाव को पूरी तरह से और स्पष्ट रूप से दर्शाती है। वे देश की इस सबसे प्रमुख और पुरानी आंतरिक खुफिया एजेंसी में एक नई और बहुत ही बड़ी जिम्मेदारी संभालने जा रहे हैं। सरकार को पूरी उम्मीद है कि उनके नेतृत्व में देश की यह खुफिया एजेंसी और भी अधिक सशक्त और परिणामदायी बनकर उभरेगी।
आंध्र प्रदेश कैडर के हैं अधिकारी: देश की प्रमुख खुफिया एजेंसी के नए निदेशक बनाए गए महेश दीक्षित मूल रूप से आंध्र प्रदेश कैडर के वरिष्ठ अधिकारी हैं। वे साल 1993 बैच के एक बहुत ही होनहार और तेजतर्रार आईपीएस अधिकारी के तौर पर पूरे विभाग में अपनी पहचान रखते हैं। इंटेलिजेंस ब्यूरो में स्पेशल डायरेक्टर के तौर पर काम करते हुए उन्होंने अपनी बेहतरीन कार्यक्षमता का बार-बार परिचय दिया है। सरकार ने उनके इसी शानदार अनुभव और बेहतरीन ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए उन्हें यह सर्वोच्च जिम्मेदारी सौंपने का बड़ा फैसला किया है। वे इस नए पद पर निवर्तमान प्रमुख तपन कुमार डेका की जगह लेंगे, जो हिमाचल प्रदेश कैडर के अधिकारी हैं।
विशेष नियमों के तहत नियुक्ति: महेश दीक्षित को इस नए और अहम पद पर नियुक्त करने के लिए सरकार ने एक विशेष और आधिकारिक आदेश जारी किया है। इस आधिकारिक आदेश के अनुसार, उन्हें अपना पदभार ग्रहण करने की तारीख से पूरे दो वर्ष का कार्यकाल प्रदान किया गया है। इसके अलावा जरूरत पड़ने पर वे अगले सरकारी आदेश तक भी इस महत्वपूर्ण पद पर अपनी उत्कृष्ट सेवाएं देते रहेंगे। उन्हें यह निर्धारित कार्यकाल प्रदान करने के लिए ऑल इंडिया सर्विसेज नियमों के विशेष और महत्वपूर्ण प्रावधानों का भी प्रमुखता से उपयोग किया गया है। साथ ही वित्तीय नियमों के तहत उन्हें आवश्यक सेवा विस्तार देकर इस हाई-प्रोफाइल नियुक्ति को पूरी तरह से कानूनी रूप दिया गया है।
घाटी में निभाया है अहम रोल: महेश दीक्षित के शानदार करियर का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि वे एक बहुत ही जमीन से जुड़े हुए अधिकारी रहे हैं। उन्होंने अपने लंबे सेवाकाल का एक बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण हिस्सा जम्मू-कश्मीर जैसे संवेदनशील राज्य में काम करते हुए बिताया है। श्रीनगर में रहते हुए उन्होंने आईबी के सब्सिडियरी इंटेलिजेंस ब्यूरो के प्रमुख के तौर पर भी अपनी उत्कृष्ट और शानदार सेवाएं दी हैं। जब साल 2019 में वहां से अनुच्छेद 370 को हटाया गया था, तब उन्होंने घाटी की सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने में बहुत अहम भूमिका निभाई थी। घाटी में सभी प्रकार के खुफिया ऑपरेशंस की कमान संभालने और शांति स्थापित करने में उनका यह योगदान बेहद ही खास और सराहनीय रहा है।
कट्टरपंथ और घुसपैठ पर लगाम: देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए हमेशा खतरा बने रहने वाले तत्वों से निपटने में उनकी विशेष और बहुत ही खास महारत है। नए खुफिया प्रमुख के पास सीमा पार से होने वाले काउंटर-टेररिज्म का एक बहुत ही व्यापक और शानदार अनुभव मौजूद है। उन्होंने पाकिस्तान प्रायोजित आतंकियों के घुसपैठ नेटवर्क को पूरी तरह से ध्वस्त करने वाले कई बेहद संवेदनशील ऑपरेशंस का सीधा नेतृत्व किया है। देश विरोधी कट्टरपंथ पर लगाम लगाने और देश के खुफिया नेटवर्क को निचले स्तर तक मजबूत करने में वे हमेशा आगे रहे हैं। उनके इन निरंतर प्रयासों से ही देश के भीतर पनपने वाली कई आतंकी साजिशों को समय रहते नाकाम करने में बड़ी सफलता मिली है।
नक्सलवाद के मोर्चे पर भी कार्य: आतंकवाद और अलगाववाद के साथ-साथ उन्होंने देश के सामने मौजूद अन्य बड़ी सुरक्षा चुनौतियों पर भी काफी गंभीरता से काम किया है। भारत के लिए हमेशा एक बड़ी चुनौती रहे वामपंथी उग्रवाद या नक्सलवाद से जुड़े संवेदनशील मोर्चों पर भी उन्होंने अहम जिम्मेदारियां संभाली हैं। इंटेलिजेंस ब्यूरो के भीतर रहते हुए उन्होंने नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में खुफिया तंत्र को मजबूत करने की दिशा में काफी सराहनीय काम किया है। उनकी यह महत्वपूर्ण नियुक्ति ऐसे समय में हुई है जब देश के सामने आंतरिक सुरक्षा की चुनौतियां लगातार अपने नए रूप ले रही हैं। उनका यह लंबा और जमीनी अनुभव देश की पूरी आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था को पहले से कहीं अधिक मजबूत और सुरक्षित बनाने में बहुत काम आएगा।





































