शारदीय नवरात्रि की महासप्तमी का महत्व: आज 17 अक्टूबर को शारदीय नवरात्रि का सातवां दिन है, जिसे महासप्तमी के नाम से भी जाना जाता है। यह तिथि मां दुर्गा के सातवें स्वरूप मां कालरात्रि की आराधना के लिए समर्पित है। महासप्तमी से दुर्गा पूजा के उत्सव की शुरुआत होती है और विभिन्न स्थानों पर बने पूजा पंडालों में माता रानी का आगमन होता है। मां कालरात्रि को देवी पार्वती का अत्यंत उग्र स्वरूप माना जाता है, लेकिन उनकी शक्ति शुभ और मंगलकारी है। इसी कारण उन्हें देवी शुभंकरी के नाम से भी पुकारा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन विधिपूर्वक पूजा करने और देवी के मंत्रों का जाप करने से भय, नकारात्मक शक्तियों और जीवन की परेशानियों से मुक्ति मिलती है। श्रद्धालु मां कालरात्रि की आराधना करके सुख, सुरक्षा और मंगल की कामना करते हैं।
मां कालरात्रि के विशेष मंत्र का महत्व और जाप: नवरात्रि की सप्तमी पर मां कालरात्रि के सामान्य पूजा मंत्र के साथ विशेष मंत्र का जाप भी किया जाता है। मंत्रमहोदधि में वर्णित एक विशेष मंत्र को 133 अक्षरों वाला बताया गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, नवरात्रि में इस मंत्र का जाप करने से साधक की शक्ति बढ़ती है और आकर्षण तथा प्रभाव में वृद्धि होती है। इस मंत्र को परंपरागत रूप से विशेष साधना से जोड़कर देखा जाता है। इसका जाप श्रद्धा और एकाग्रता के साथ करना चाहिए। विशेष मंत्र इस प्रकार है—ॐ ऐं ह्रीं क्लीं श्रीं काहेन्श्रवरी सर्वजन मनोहरे सर्वमुख स्तंभिनि सर्व राजवशंकरि सर्वदुष्ट निर्दलिनि सर्व स्त्री पुरुषाकर्षिणी बंदिश्रृंखलास्त्रोटय त्रोटय सर्वशत्रून् भञ्जय भञ्जय द्वेष्टृन् निर्दलय निर्दलय सर्वं स्तंभ्य स्तंभय मोहनास्त्रेण द्वेषिणा उच्चाटय उच्चाटय सर्वं वशं कुरु कुरु स्वाहा देहि देहि सर्वं कालरात्रि कामिनि गणेश्वरि।
सप्तमी पर मां कालरात्रि के पूजा मंत्र, प्रार्थना और स्तुति: मां कालरात्रि की आराधना में सबसे पहले उनके मूल मंत्र का जाप किया जाता है—ॐ देवी कालरात्र्यै नमः॥ इसके बाद देवी की प्रार्थना पढ़ी जाती है—एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता। लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्त शरीरिणी॥ वामपादोल्लसल्लोह लताकण्टकभूषणा। वर्धन मूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी॥ देवी की स्तुति के लिए यह मंत्र पढ़ें—या देवी सर्वभूतेषु माँ कालरात्रि रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥ भय और संकट से मुक्ति की प्रार्थना के लिए मंत्र है—जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतार्ति हारिणि। जय सार्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तु ते॥ श्रद्धालु इन मंत्रों और स्तुतियों का जाप करके मां कालरात्रि से भय दूर करने, संकटों से रक्षा करने और परिवार में सुख-शांति बनाए रखने की प्रार्थना करते हैं।
मां कालरात्रि को चढ़ाएं गुड़, लाल फूल और मालपुआ: महासप्तमी की पूजा में मां कालरात्रि को गुड़ या गुड़ से बनी मिठाइयों का भोग लगाना शुभ माना जाता है। इस दिन देवी को गुड़ का हलवा और चावल तथा गुड़ से बनी खीर भी अर्पित की जा सकती है। भोग में मालपुआ शामिल करने की भी परंपरा है। फूलों में गुड़हल और गुलाब विशेष रूप से अर्पित किए जाते हैं, क्योंकि मां कालरात्रि को लाल रंग के फूल प्रिय माने जाते हैं। रातरानी के फूल को भी देवी की पूजा में विशेष स्थान दिया जाता है। श्रद्धालु अपनी श्रद्धा और पूजा की परंपरा के अनुसार इन प्रसादों तथा फूलों को अर्पित करें। पूजा के दौरान स्वच्छता, एकाग्रता और भक्ति का ध्यान रखना चाहिए।
दशहरा 2026 की तारीख और विजय मुहूर्त का समय: वर्ष 2026 में विजयादशमी की तारीख को लेकर असमंजस है, क्योंकि आश्विन शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि दो दिनों तक रहेगी। पंचांग के अनुसार, दशमी तिथि 20 अक्टूबर, मंगलवार को दोपहर 12 बजकर 50 मिनट पर शुरू होगी और 21 अक्टूबर को दोपहर 2 बजकर 11 मिनट पर समाप्त होगी। उदया तिथि के आधार पर 21 अक्टूबर को दशहरा मनाने का मत सामने आता है, जबकि विजय मुहूर्त और प्रदोष काल के महत्व के कारण 20 अक्टूबर की शाम को भी रावण दहन किया जा सकता है। 20 अक्टूबर को विजय मुहूर्त दोपहर 1 बजकर 59 मिनट से 2 बजकर 45 मिनट तक रहेगा। अपराह्न पूजा का समय दोपहर 1 बजकर 14 मिनट से शाम 3 बजकर 30 मिनट तक बताया गया है। विजय मुहूर्त में पूजा-पाठ और शुभ कार्य करना फलदायी माना जाता है। तिथि के दो दिनों तक रहने के कारण पूजा और उत्सव का समय तय करते हुए स्थानीय पंचांग तथा क्षेत्रीय परंपरा का ध्यान रखना जरूरी है।
रावण दहन का शुभ समय और विजयादशमी का धार्मिक महत्व: दशहरे पर रावण दहन के लिए प्रदोष काल को विशेष महत्व दिया जाता है। 20 अक्टूबर को प्रदोष काल शाम 5 बजकर 47 मिनट से शुरू होगा। स्थानीय पंचांग और परंपरा के अनुसार इसी अवधि में रावण दहन का समय निर्धारित किया जा सकता है। निशिता मुहूर्त 20 अक्टूबर की रात 11 बजकर 41 मिनट से 21 अक्टूबर की रात 12 बजकर 31 मिनट तक बताया गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, विजयादशमी के दिन भगवान श्रीराम ने रावण का वध करके अधर्म पर धर्म और बुराई पर अच्छाई की विजय का संदेश दिया था। इसी प्रसंग की स्मृति में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन किया जाता है। विजयादशमी शारदीय नवरात्रि के समापन का भी प्रतीक है। नौ दिनों तक व्रत रखने वाले श्रद्धालु इस दिन पूजा-अर्चना के बाद व्रत का पारण करते हैं और सुख, समृद्धि तथा विजय की कामना करते हैं।













































