व्रत का महत्व: जितिया का व्रत माताओं के लिए बेहद कठिन और महत्वपूर्ण व्रत माना जाता है। इस दिन माताएं अपनी संतान की लंबी आयु, उत्तम स्वास्थ्य और खुशहाली की कामना के लिए निर्जला उपवास रखती हैं। जितिया को जीउतिया और जीवित्पुत्रिका व्रत के नाम से भी जाना जाता है। यह व्रत आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है। जितिया व्रत की परंपरा मुख्य रूप से बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश में प्रचलित है, जबकि नेपाल के मधेश क्षेत्र में भी महिलाएं इस व्रत को श्रद्धा के साथ करती हैं। इस व्रत में माताएं पूरे दिन बिना अन्न और जल के रहती हैं, इसलिए इसे कठिन व्रतों में गिना जाता है। पहली बार जितिया व्रत रखने वाली महिलाओं के लिए इसकी तीन दिवसीय प्रक्रिया और प्रत्येक दिन के नियमों को समझना विशेष रूप से जरूरी होता है।
जितिया व्रत की तिथि: वर्ष 2026 में जितिया का मुख्य व्रत 3 अक्टूबर, शनिवार को रखा जाएगा। पंचांग के अनुसार आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 3 अक्टूबर को सुबह 7 बजकर 59 मिनट पर शुरू होगी और 4 अक्टूबर को सुबह 5 बजकर 51 मिनट पर समाप्त होगी। अष्टमी तिथि के आधार पर 3 अक्टूबर को जितिया का निर्जला व्रत रखा जाएगा। हालांकि इसकी धार्मिक प्रक्रिया केवल व्रत वाले दिन तक सीमित नहीं रहती, बल्कि तीन दिनों तक चलती है। पहले दिन नहाय-खाय किया जाता है, दूसरे दिन निर्जला उपवास रखा जाता है और तीसरे दिन पूजा-पाठ तथा सूर्य देव को अर्घ्य देने के बाद पारण किया जाता है। इसलिए व्रत रखने वाली महिलाओं के लिए 2 अक्टूबर से शुरू होने वाली पूरी प्रक्रिया और 4 अक्टूबर को होने वाले पारण का समय पहले से जानना आवश्यक है।
नहाय-खाय की परंपरा: जितिया व्रत की शुरुआत 2 अक्टूबर, शुक्रवार को नहाय-खाय से होगी। इस दिन व्रत रखने वाली महिलाएं स्नान आदि करने के बाद सात्विक भोजन ग्रहण करती हैं और इसके साथ अगले दिन रखे जाने वाले निर्जला उपवास की तैयारी करती हैं। नहाय-खाय के भोजन में नोनी का साग, मडुआ की रोटी और कद्दू या लौकी की सब्जी खाने की परंपरा है। इस दिन सात्विक आहार ग्रहण करने का विशेष महत्व माना जाता है। नहाय-खाय के बाद अगले दिन व्रती महिलाएं निर्जला उपवास में प्रवेश करती हैं, इसलिए इस दिन की भोजन परंपरा जितिया व्रत की पूरी प्रक्रिया का अहम हिस्सा मानी जाती है। पहली बार व्रत रखने वाली महिलाओं को नहाय-खाय के दिन निर्धारित पारंपरिक भोजन और सात्विक आहार की परंपरा का ध्यान रखना चाहिए।
निर्जला व्रत का नियम: 3 अक्टूबर, शनिवार को जितिया का मुख्य निर्जला व्रत रखा जाएगा। इस दिन व्रती महिलाएं न तो अन्न ग्रहण करती हैं और न ही जल पीती हैं। व्रत वाले दिन माताएं सूर्योदय से पहले यानी सुबह 3 बजे उठकर मीठा भोजन या दही-चूड़ा ग्रहण करती हैं। इसके बाद सूर्योदय के साथ ही निर्जला व्रत शुरू हो जाता है। पूरे दिन माताएं बिना भोजन और पानी के रहकर अपनी संतान की लंबी आयु, उत्तम स्वास्थ्य और खुशहाली की कामना करती हैं। जितिया व्रत में निर्जला उपवास इसकी सबसे कठिन और महत्वपूर्ण अवस्था मानी जाती है। इसलिए पहली बार व्रत रखने वाली महिलाओं के लिए यह समझना जरूरी है कि सूर्योदय से पहले भोजन करने के बाद सूर्योदय होते ही उपवास शुरू हो जाता है और इसके बाद अन्न तथा जल दोनों का सेवन नहीं किया जाता।
पूजा और सूर्य देव को अर्घ्य: जितिया व्रत की धार्मिक प्रक्रिया में पूजा-पाठ के साथ सूर्य देव को अर्घ्य देने की भी परंपरा है। निर्जला उपवास के अगले दिन व्रती महिलाएं पूजा-पाठ करती हैं और सूर्य देव को अर्घ्य देने के बाद ही व्रत खोलने की प्रक्रिया पूरी करती हैं। व्रत के दौरान माताएं अपनी संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और जीवन में सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। जितिया की तीन दिवसीय परंपरा में दूसरे दिन का निर्जला उपवास सबसे कठिन चरण होता है, जबकि तीसरे दिन पूजा और अर्घ्य के बाद पारण के साथ व्रत की प्रक्रिया पूरी होती है। इसलिए व्रती महिलाओं के लिए पूजा-पाठ और अर्घ्य की परंपरा को भी व्रत के महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में माना जाता है।
पारण का समय और आहार: जितिया व्रत का पारण 4 अक्टूबर, रविवार को किया जाएगा। व्रती महिलाएं सुबह 6 बजकर 15 मिनट के बाद अपना व्रत खोल सकती हैं। पारण से पहले पूजा-पाठ करने और सूर्य देव को अर्घ्य देने की परंपरा है। इसके बाद ही व्रत खोला जाता है। पारण के दिन भी सात्विक भोजन ग्रहण करने का विशेष ध्यान रखा जाता है। इस दिन मडुआ की रोटी और नोनी का साग खाने की परंपरा है। तीन दिनों तक चलने वाली जितिया व्रत की प्रक्रिया में नहाय-खाय, निर्जला उपवास और पारण तीनों चरणों का अपना महत्व है। 2 अक्टूबर को नहाय-खाय, 3 अक्टूबर को निर्जला व्रत और 4 अक्टूबर को सुबह 6 बजकर 15 मिनट के बाद पारण के साथ वर्ष 2026 का जितिया व्रत पूरा होगा।











































