उत्तर प्रदेश में लोकतंत्र की सबसे निचली और महत्वपूर्ण इकाई ‘पंचायत’ के भविष्य को लेकर अब गेंद Allahabad High Court के पाले में है। जहां एक ओर सरकार आरक्षण और परिसीमन की जटिलताओं में फंसी है, वहीं दूसरी ओर समय पर चुनाव न होने की स्थिति में कानूनी चुनौती पेश की गई है।
कार्यकाल की समय-सीमा (Tenure Facts): यूपी में पिछली पंचायतों का गठन मई 2021 में हुआ था। नियमों के अनुसार:
- मौजूदा पंचायतों का कार्यकाल 26 मई 2026 को समाप्त हो रहा है।
- राज्य में 57,965 ग्राम पंचायतें, 826 क्षेत्र पंचायतें और 75 जिला पंचायतें हैं।
- यदि कार्यकाल समाप्त होने से पहले चुनाव अधिसूचना जारी नहीं होती, तो पंचायतों की कमान निर्वाचित प्रतिनिधियों के बजाय सरकारी अधिकारियों (प्रशासकों) के हाथ में चली जाएगी।
High Court का रुख और सरकारी जवाब: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए State Election Commission से जवाब मांगा है। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से पूछा है कि क्या चुनाव कार्यक्रम को समय पर अंतिम रूप दिया जा सकता है। इस पर पंचायती राज मंत्री Om Prakash Rajbhar का कहना है कि सरकार कोर्ट के हर आदेश का पालन करने के लिए तैयार है, लेकिन मामला फिलहाल उप-विचाराधीन है।
आगे क्या होगा? (Future Outlook): यदि सरकार विधानसभा चुनाव से पहले रिस्क नहीं लेना चाहती, तो वह ओबीसी आरक्षण की रिपोर्ट आने में देरी का हवाला देकर चुनावों को टाल सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि Delimitation (परिसीमन) और आरक्षण प्रक्रिया में तीन महीने से अधिक का समय लगता है, तो 2026 में चुनाव होना नामुमकिन होगा। ऐसे में ग्रामीण क्षेत्रों के विकास कार्यों पर सीधा असर पड़ सकता है, क्योंकि बजट का अधिकार निर्वाचित प्रधानों के पास नहीं रहेगा।



































