जस्टिस यशवंत वर्मा का इस्तीफा केवल एक पद त्याग नहीं है, बल्कि यह एक लंबी कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया का परिणाम माना जा रहा है। सूत्रों के अनुसार, उनके खिलाफ चल रही जांच इतनी गंभीर स्तर पर पहुँच गई थी कि संसद द्वारा उन्हें पद से हटाने की प्रक्रिया (Impeachment/Removal Process) शुरू होने की प्रबल संभावना बन गई थी।
न्यायिक सफर और विरोध (Career Timeline):
- 2014: जस्टिस वर्मा पहली बार इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज नियुक्त हुए।
- 2021: उनका स्थानांतरण दिल्ली हाईकोर्ट में किया गया।
- 2025: दिल्ली आवास पर आग लगने और नकदी मिलने के बाद वापस इलाहाबाद हाईकोर्ट भेजा गया।
बार एसोसिएशन का कड़ा रुख (Protest by Lawyers): जब सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे जस्टिस वर्मा को वापस इलाहाबाद भेजने का निर्णय लिया, तब इलाहाबाद हाईकोर्ट के वकीलों और Bar Association ने इसका पुरजोर विरोध किया था। वकीलों का तर्क था कि जिस जज पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हों, उन्हें किसी भी उच्च न्यायालय में पदस्थापित करना न्यायपालिका की गरिमा के विरुद्ध है।
इस्तीफे के मायने: कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि President को इस्तीफा सौंपना इस बात का संकेत है कि जस्टिस वर्मा जांच का सामना करने या संभावित निष्कासन की अपमानजनक प्रक्रिया से बचना चाहते थे। फिलहाल उनके खिलाफ चल रही आंतरिक जांच के निष्कर्षों पर सबकी नजरें टिकी हुई हैं, क्योंकि इस्तीफा देने के बाद भी भ्रष्टाचार के आरोपों से उन्हें पूरी तरह क्लीन चिट नहीं मिली है।



































