दोबारा छुट्टी पाने के अधिकार पर मुहर लखनऊ की उच्च न्यायालय पीठ ने मंगलवार को महिला अधिकारों को लेकर एक प्रगतिशील रुख अपनाते हुए कहा कि दूसरी बार मातृत्व अवकाश लेने के लिए दो साल के अंतराल की शर्त को अनिवार्य नहीं बनाया जा सकता। अदालत ने यह व्यवस्था दी कि एक बार छुट्टी लेने के तुरंत बाद या दो साल के भीतर भी महिला दोबारा अवकाश की हकदार है। जस्टिस करुणेश सिंह पवार की बेंच ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि वित्तीय हैंडबुक के संकुचित नियम किसी भी महिला के वैधानिक अधिकारों का हनन नहीं कर सकते, विशेषकर तब जब मामला मातृत्व से जुड़ा हो।
प्रशासनिक अस्वीकृति को दी गई चुनौती यह कानूनी विवाद तब शुरू हुआ जब मनीषा यादव के मातृत्व अवकाश के अनुरोध को सरकारी अधिकारियों ने 4 अप्रैल 2026 को एक आदेश जारी कर खारिज कर दिया था। याचिकाकर्ता ने इस अन्याय के खिलाफ न्यायपालिका का दरवाजा खटखटाया और तर्क दिया कि मैटरनिटी बेनिफिट एक्ट-1961 का मुख्य उद्देश्य कामकाजी महिलाओं को प्रसव के दौरान और उसके बाद आवश्यक सहायता प्रदान करना है। उन्होंने दलील दी कि इस अधिनियम के प्रावधानों को किसी भी सरकारी आदेश की तुलना में वरीयता मिलनी चाहिए क्योंकि यह सीधे तौर पर जीवन और स्वास्थ्य के अधिकार से जुड़ा है।
राज्य सरकार की दलील और कोर्ट का प्रतिवाद सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से यह तर्क दिया गया कि वित्तीय हैंडबुक के नियम 153(1) के तहत दो प्रसव अवकाशों के बीच 24 महीने का अंतर होना कानूनी रूप से जरूरी है। परंतु न्यायालय ने इस दलील को कमजोर पाया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मैटरनिटी बेनिफिट एक्ट संसद की इच्छा का परिणाम है और एक केंद्रीय अधिनियम होने के नाते इसका दर्जा किसी भी राज्य के कार्यकारी नियमों से बहुत ऊपर है। यदि राज्य के नियम केंद्रीय कानून के विरुद्ध जाते हैं, तो उन्हें अमान्य माना जाएगा और केवल संसद द्वारा निर्मित कानून ही प्रभावी होगा।
अन्यायपूर्ण तरीके से खारिज अर्जी का विश्लेषण केस के विवरण के अनुसार, याचिकाकर्ता की पहली संतान का जन्म 2021 में हुआ था और उन्होंने 2022 में दूसरी बार छुट्टी के लिए आवेदन दिया था। विभाग ने इसे नियमों का उल्लंघन मानते हुए नामंजूर कर दिया था। कोर्ट ने इसे गलत ठहराते हुए कहा कि मातृत्व के लाभों को तकनीकी आधारों पर रोकना कानून की मूल भावना के खिलाफ है। अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता को जानबूझकर परेशान किया गया और उनके संवैधानिक अधिकारों की अनदेखी की गई, जो कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्वीकार्य नहीं है।
छुट्टी मंजूर करने का न्यायिक आदेश उच्च न्यायालय ने प्रशासन द्वारा दिए गए नकारात्मक आदेश को दरकिनार करते हुए याचिकाकर्ता को बड़ी जीत दिलाई। पीठ ने संबंधित अधिकारी को आदेश दिया कि मनीषा यादव को बिना किसी देरी के मातृत्व अवकाश का लाभ दिया जाए। कोर्ट ने निर्दिष्ट किया कि उनकी यह छुट्टी 6 अप्रैल 2026 से प्रभावी मानी जाएगी और 2 अक्टूबर 2026 तक जारी रहेगी। इस आदेश के माध्यम से कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि महिलाओं के स्वास्थ्य और परिवार नियोजन के अधिकारों के साथ कोई समझौता नहीं किया जाएगा।
कानूनी प्रावधानों की सर्वोच्चता का संदेश अदालत का यह फैसला इस बात को पुन: स्थापित करता है कि कल्याणकारी कानून (Welfare Laws) हमेशा प्रशासनिक सीमाओं से ऊपर होते हैं। यह निर्णय यह सुनिश्चित करता है कि कार्यस्थलों पर महिलाओं को मातृत्व के कारण किसी भी प्रकार के भेदभाव या परेशानी का सामना न करना पड़े। हाई कोर्ट ने इस फैसले के माध्यम से कार्यपालिका को यह याद दिलाया है कि उनका कर्तव्य नियमों का पालन करना है, न कि कानून की गलत व्याख्या करके किसी के अधिकारों को छीनना। यह लेख इस बात की पुष्टि करता है कि न्याय और कानून की जीत हमेशा सर्वोपरि होती है।



































