शिन्हुआ की रिपोर्ट और बीजिंग में दोनों नेताओं की रहस्यमयी बैठक वैश्विक स्तर पर ईरान और अमेरिका के बीच हाल ही में घोषित किए गए सीजफायर के लागू रहने के बावजूद कूटनीतिक सरगर्मियां लगातार जारी हैं, इसी कड़ी में बुधवार को बीजिंग में एक बहुत ही अहम और उच्च स्तरीय मुलाकात संपन्न हुई है। इस मुलाकात में तेहरान के विदेश मंत्री वांग यी ने अपने ईरानी समकक्ष अब्बास अराघची के साथ विशेष तौर पर चर्चा की। इस महत्वपूर्ण कूटनीतिक बैठक की आधिकारिक जानकारी ईरान की सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ द्वारा दुनिया के सामने प्रस्तुत की गई है। हालांकि, शिन्हुआ की इस रिपोर्ट में केवल मुलाकात होने की पुष्टि की गई है और इसके आगे बातचीत के विषयों या किसी भी प्रकार के विवरण को पूरी तरह से गुप्त रखा गया है। इस बैठक में क्या चर्चा हुई और इसके क्या परिणाम हो सकते हैं, इस बारे में कोई जानकारी न दिए जाने से यह मुलाकात अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में एक बड़े रहस्य का विषय बन गई है, जिसके पीछे के असली मकसदों को समझने की कोशिश की जा रही है।
मिडिल-ईस्ट में युद्ध की सुगबुगाहट से बढ़ी इजरायल और अमेरिका की चिंता कूटनीतिक मुलाकातों के इस दौर के बीच ईरान ने अपनी क्षेत्रीय रणनीतियों में भी बदलाव किया है और उसने एक बार फिर से मिडिल-ईस्ट में युद्ध की आग को भड़काने का काम किया है। ईरान की इस नई आक्रामकता और उकसावे की कार्रवाइयों ने न केवल क्षेत्रीय स्थिरता को खतरे में डाल दिया है, बल्कि इसने अमेरिका और इजरायल की टेंशन को भी बहुत अधिक बढ़ा दिया है। मिडिल-ईस्ट में इस तरह से दोबारा जंग के हालात पैदा होने से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सामने एक बेहद ही कड़ी और जटिल कूटनीतिक चुनौती खड़ी हो गई है। ट्रंप प्रशासन के लिए इस स्थिति को संभालना इसलिए भी मुश्किल हो रहा है क्योंकि एक तरफ तो सीजफायर का पालन करने का दबाव है और दूसरी तरफ अपने सहयोगियों की सुरक्षा और क्षेत्र में शक्ति संतुलन को बनाए रखने की भारी जिम्मेदारी भी उनके कंधों पर आ गई है।
सीजफायर के दावों के बीच अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर ईरानी हमले मिडिल-ईस्ट में बढ़ते इस गंभीर तनाव के बीच एक विरोधाभासी स्थिति देखने को मिल रही है जहाँ अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप लगातार यह बयान दे रहे हैं कि ईरान और अमेरिका के बीच शांति स्थापित करने वाला सीजफायर अभी भी पूरी तरह से लागू है। ट्रंप के इन दावों के बिल्कुल विपरीत, जमीनी हकीकत यह है कि ईरान किसी भी संघर्ष विराम का पालन करता हुआ दिखाई नहीं दे रहा है और वह लगातार अमेरिकी सैन्य ठिकानों को अपना निशाना बनाते हुए उन पर हमले कर रहा है। ईरान द्वारा अमेरिकी ठिकानों पर किए जा रहे इन निरंतर हमलों के पीछे एक बहुत ही सोची-समझी कूटनीतिक और रणनीतिक चाल है। ईरान इन हमलों के जरिए यह सुनिश्चित करना चाहता है कि वह अपनी सैन्य ताकत का प्रदर्शन करके अमेरिका पर भारी दबाव बनाए, ताकि भविष्य में होने वाले किसी भी समझौते के महत्वपूर्ण बिंदुओं पर अमेरिका को अपने पक्ष में और अधिक झुकाया जा सके।
युद्ध को लंबा खींचने के पक्ष में नहीं हैं इजरायल और अमेरिका ईरान द्वारा लगातार किए जा रहे इन हमलों और उकसावे की कार्रवाइयों के बावजूद, वर्तमान में अमेरिका और इजरायल दोनों ही देशों ने एक साझा रणनीति अपना रखी है जिसके तहत वे ईरान पर कोई भी सीधा या बड़ा जवाबी हमला करने से पूरी तरह से परहेज कर रहे हैं। इन दोनों देशों द्वारा दिखाए जा रहे इस अभूतपूर्व सैन्य संयम का सबसे प्रमुख कारण यह है कि इजरायल और अमेरिका अब इस युद्ध को किसी भी कीमत पर लंबा नहीं खींचना चाहते हैं। दोनों देशों का शीर्ष नेतृत्व यह भली-भांति समझता है कि एक लंबा और सीधा युद्ध उनके आर्थिक संसाधनों, क्षेत्रीय हितों और वैश्विक छवि के लिए अत्यंत ही नुकसानदायक साबित हो सकता है। इसलिए, वे ईरान के हमलों को झेलते हुए भी संयम बरत रहे हैं ताकि स्थिति एक पूर्ण पैमाने के युद्ध में तब्दील न हो जाए और बातचीत या अन्य दबाव के साधनों से समस्या का कोई हल निकल सके।
होर्मुज जलडमरूमध्य पर ईरान की पकड़ और चीन की संभावित चाल इस पूरे परिदृश्य में बीजिंग में हुई मुलाकात ने एक नया रणनीतिक आयाम जोड़ दिया है, जिसे लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पूरी तरह से चौकन्ने और सतर्क हो गए हैं। अमेरिका को इस बात की बहुत ही गहरी और गंभीर आशंका सता रही है कि ईरान और चीन के बीच चल रही इस कूटनीतिक नजदीकी के पीछे होर्मुज जलडमरूमध्य पर ईरान की पकड़ को मजबूत बनाए रखने की कोई बड़ी साजिश हो सकती है। अमेरिका का स्पष्ट रूप से यह मानना है कि चीन इस संवेदनशील समुद्री मार्ग पर अपना परोक्ष नियंत्रण स्थापित करने के लिए कोई नई और गुप्त चाल चल सकता है, जिससे वह ईरान को ताकतवर बनाए रखे। होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक तेल व्यापार का एक बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्सा है, और वहां पर ईरान और चीन के बढ़ते गठजोड़ को अमेरिका अपने सामरिक और आर्थिक हितों के लिए एक बहुत बड़े खतरे के रूप में देख रहा है।
मार्को रुबियो का बयान और अब्बास अराघची के चीन दौरे का कूटनीतिक महत्व ईरान युद्ध शुरू होने के बाद से यह अब्बास अराघची की चीन की पहली आधिकारिक यात्रा है, और यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक समुदाय में इस यात्रा को बेहद महत्वपूर्ण और गंभीर माना जा रहा है। इस यात्रा के कूटनीतिक वजन को देखते हुए, अमेरिका को भी यह उम्मीद बंध रही है कि इस दौरान होर्मुज समस्या को दूर करने के लिए कोई रास्ता निकल सकता है। इस संदर्भ में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण बयान देते हुए यह उम्मीद जताई है कि अराघची की इस बेहद अहम यात्रा के दौरान बीजिंग अपनी कूटनीतिक मध्यस्थता का इस्तेमाल करेगा। रुबियो को आशा है कि चीन इस बातचीत के दौरान तेहरान से होर्मुज जलडमरूमध्य पर अपनी चंगुल ढीली करने और वहां वाणिज्यिक यातायात को निर्बाध चलने देने की अपील दोहराएगा, जिससे इस पूरे क्षेत्र में मंडरा रहा युद्ध का एक बड़ा खतरा कुछ हद तक कम हो सके।



































