योगी कैबिनेट का बड़ा फैसला: उत्तर प्रदेश की वर्तमान सरकार ने आगामी त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों को लेकर एक बहुत बड़ा और अत्यंत महत्वपूर्ण फैसला लिया है। राजधानी Lucknow में सोमवार को आयोजित हुई कैबिनेट की बैठक में इस दूरगामी प्रभाव वाले प्रस्ताव को हरी झंडी दे दी गई है। सरकार की इस अहम बैठक में कुल 12 प्रस्तावों को पास किया गया जिनमें समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन सबसे खास है। इस फैसले के तहत उत्तर प्रदेश राज्य स्थानीय ग्रामीण निकाय समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन बहुत जल्द किया जाना सुनिश्चित हुआ है। कैबिनेट की मुहर लगने के बाद अब इस विशेष आयोग के गठन की आधिकारिक और कानूनी प्रक्रिया को तेजी से शुरू कर दिया गया है।
हाईकोर्ट का अहम आदेश: इस महत्वपूर्ण आयोग के गठन के पीछे न्यायपालिका के आदेश और एक कानूनी याचिका की पृष्ठभूमि मुख्य रूप से जुड़ी हुई है। दरअसल Allahabad High Court में इस संबंध में दायर एक याचिका के बाद अदालत ने राज्य सरकार को कड़ा आदेश जारी किया था। अदालत ने साफ कहा था कि राज्य में समय पर चुनाव सुनिश्चित करने के लिए पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन तुरंत किया जाना चाहिए। इसी कानूनी आदेश और माननीय उच्चतम न्यायालय के दिशा-निर्देशों के अनुपालन में योगी सरकार ने आज इस प्रस्ताव पर मुहर लगाई है। अदालत के इस हस्तक्षेप के बाद अब राज्य सरकार पूरी तरह से कानूनी और संवैधानिक दायरे में रहकर चुनाव कराने की तैयारी में है।
फैसले का मुख्य राजनीतिक महत्व: राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि योगी सरकार पंचायत चुनावों में ओबीसी के आरक्षण का एक नया और ठोस आधार तैयार करना चाहती है। इसके लिए यह समर्पित आयोग पंचायत स्तर पर पिछड़े वर्ग की वास्तविक सामाजिक और राजनीतिक हिस्सेदारी का गहन अध्ययन करने का काम करेगा। इसी अध्ययन से प्राप्त रिपोर्ट के आधार पर आगामी चुनावों में पिछड़े वर्ग के लोगों के लिए सीटों का आरक्षण तय किया जाएगा। इसे राज्य में आगामी पंचायत चुनावों से ठीक पहले सरकार का एक बहुत बड़ा राजनीतिक और सामाजिक कदम माना जा रहा है। इस निर्णय से ग्रामीण क्षेत्रों के पिछड़े वर्ग के नागरिकों को स्थानीय निकायों में उनकी आबादी के अनुसार उचित प्रतिनिधित्व मिल सकेगा।
संवैधानिक प्रावधान और अधिकार: उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम 1947 की धारा-11क (2) के तहत राज्य सरकार को आरक्षण देने का कानूनी अधिकार प्राप्त है। इसके साथ ही उत्तर प्रदेश क्षेत्र पंचायत एवं जिला पंचायत अधिनियम 1961 की धारा-7क (1) एवं 19क (1) में भी यही प्राविधान है। इन कानूनी प्राविधानानुसार राज्य सरकार एक आदेश द्वारा त्रिस्तरीय पंचायतों के स्थानों एवं पदों को विभिन्न वर्गों के लिए आरक्षित करती है। यह आरक्षण मुख्य रूप से अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और पिछड़े वर्गों के उत्थान के लिए नियमों के अनुसार किया जाता है। इन स्थापित कानूनी धाराओं के तहत ही राज्य सरकार को पंचायत स्तर पर पदों को आरक्षित करने की अंतिम शक्ति दी गई है।
आरक्षण की सीमा और सर्वेक्षण: सरकार द्वारा जारी नोटिस के अनुसार त्रिस्तरीय पंचायतों के पदों का अनुपात कुल पदों की संख्या से यथाशक्य जनसंख्या के समान होगा। इसका मतलब यह है कि संबंधित वर्ग की जनसंख्या का जो अनुपात राज्य की कुल जनसंख्या से है वही आरक्षण का आधार बनेगा। नोटिस में यह भी स्पष्ट रूप से प्राविधानित है कि पिछड़े वर्गों के लिए यह आरक्षण कुल पदों के 27 प्रतिशत से अधिक नहीं होगा। आरक्षण की इस अधिकतम 27 प्रतिशत की सीमा का पालन करना राज्य सरकार और इस आयोग के लिए पूरी तरह से अनिवार्य होगा। यदि पिछड़े वर्गों की जनसंख्या के सटीक आंकड़े उपलब्ध नहीं होते हैं तो नियत रीति से सर्वेक्षण करके जनसंख्या अवधारित की जाएगी।
आयोग की संरचना और योग्यता: राज्य सरकार द्वारा गठित किए जाने वाले इस समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग में कुल पांच योग्य सदस्यों को नियुक्त किया जाएगा। इस आयोग में केवल उन्हीं व्यक्तियों को जगह मिलेगी जो पिछड़े वर्गों से संबंधित विभिन्न जटिल मामलों का अच्छा ज्ञान रखते हों। इन पांच सदस्यों में से एक सदस्य Allahabad High Court के सेवानिवृत्त न्यायाधीशों में से एक महत्वपूर्ण व्यक्ति होंगे। इन सेवानिवृत्त न्यायाधीश को ही राज्य सरकार द्वारा इस विशेष आयोग के अध्यक्ष के रूप में आधिकारिक तौर पर नामांकित किया जाएगा। आयोग के इस अध्यक्ष और सभी सदस्यों का संपूर्ण कार्यकाल सामान्य तौर पर उनकी आधिकारिक नियुक्ति की तारीख से 06 माह का होगा।





































