धर्म ग्रंथों के अनुसार, भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को वराह जयंती (Varah Jayanti 2022) का पर्व मनाया जाता है। इस बार ये तिथि 30 अगस्त, मंगलवार को है।
इस दिन भगवान वराह की पूजा विशेष रूप से की जाती है। भगवान विष्णु ने वराह अवतार लेकर हिरण्याक्ष नामक दैत्य का वध किया था, जिसने पृथ्वी को ले जाकर समुद्र में छिपा दिया था। भगवान वराह का जन्म ब्रह्मा की नाक से हुआ था। आगे जानिए भगवान वराह की पूजा विधि और उनके जन्म की कथा के बारे में.
इस विधि से करें पूजा (Varah Jayanti 2022 Puja Vidhi)
– वराह जयंती पर सुबह स्नान आदि करने के बाद व्रत-पूजा का संकल्प लें। इसके बाद भगवान वराह की मूर्ति या चित्र एक साफ स्थान पर स्थापित करें।
– अगर भगवान वराह का चित्र या प्रतिमा न हो तो उसके स्थान पर भगवान विष्णु का चित्र या प्रतिमा की पूजा भी कर सकते हैं।
– भगवान वराह के चित्र के सामने शुद्ध घी की दीपक जलाएं। इसके बाद कुंकुम, अबीर, गुलाल, रोली, चावल आदि चीजें चढ़ाएं।
– इसके फूल, फूल, माला से पूजा करें। अपनी इच्छा अनुसार पकवानों का भोग लगाएं और अंत में आरती कर पूजा का समापन करें।
– व्रत का संकल्प लिया है तो उसके अनुसार कार्य करें। इस तरह वराह जयंती पर पूजा-व्रत आदि करने से भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं।
क्यों लिया था भगवान विष्णु ने वराह अवतार? (Varah Jayanti Katha)
– पौराणिक कथाओं के अनुसार, हिरण्याक्ष नाम का एक महाभयंकर दैत्य था। उसने तपस्या करके ब्रह्माजी से कई वरदान प्राप्त कर लिए थे। एक दिन उसने पृथ्वी को ले जाकर समुद्र में छिपा दिया।
– तब ब्रह्मा की नाक से भगवान विष्णु वराह रूप में प्रकट हुए। भगवान विष्णु के इस रूप को देखकर सभी देवताओं व ऋषि-मुनियों ने उनकी स्तुति की। सबके आग्रह पर भगवान वराह ने पृथ्वी को ढूंढना प्रारंभ किया।
– इसके बाद वे समुद्र के अंदर जाकर अपने दांतों पर रखकर पृथ्वी को बाहर ले आए। जब हिरण्याक्ष ने यह देखा तो उसने भगवान विष्णु के वराह रूप को युद्ध के लिए ललकारा। दोनों में भीषण युद्ध हुआ।
– भगवान वराह ने हिरण्याक्ष का वध कर दिया। इसके बाद भगवान वराह ने अपने खुरों से जल को स्तंभित कर उस पर पृथ्वी को स्थापित कर दिया। ये भगवान विष्णु के तीसरे अवतार माने जाते हैं।



































