विघ्नहर्ता गणपति के अद्भुत स्वरूप से समझना है प्रबंधन तो इसे जरूर पढ़ें
विघ्नहर्ता श्री गणेश हमारे भीतर हैं।
प्रकृति, पर्यावरण और जीवन को सम्मान और संरक्षण देकर ही हम अपने भीतर के विघ्नहर्ता श्री गणेश को जगा सकते हैं। विघ्नहर्ता श्री गणेश के अद्भुत स्वरूप को समझना पाना मुश्किल है। विघ्नहर्ता श्री गणेश जितनी भी कथाएं हैं, श्रुति, स्मृति,धर्मसूत्र, मीमांसा, पुराण, महापुराण, गणेश यत्र तत्र, सर्वत्र हैं। विघ्नहर्ता श्री गणेश मानव की सोच के अंतस्थल में है। श्री गणेश शाश्वत हैंं और सनातन हैंं।गणपति के समृद्धि और लाभ संतानें हैं। लोक में सबसे ज़्यादा उनकी व्याप्ति हैंं। श्री गणेश को प्रकृति से बहुत प्यार है। इसीलिए उन्हें दूब घास बहुत प्रिय है। पर्यावरण से लगाव है, इसलिए इसके पास मोर, सांप, चूहों का निवास है। चित्रकार और मूर्तिकार सबसे ज्यादा उन्हीं पर प्रयोग करते हैं। उन्हें गणनायक गणपति हैं।
प्रबंधन की मिसाल हैं गणपति
तिलक महराज ने जब सामाजिक क्रांति की सोची तो गणपति के लोकाधार को देखते हुए उन्हें ही ज़रिया बनाया।
शास्त्रों और परंपराओं में विघ्नहर्ता श्री गणेश का अर्थ विघ्न बाधाओं को समूल से नाश करना है। मनुष्य जीवन भर शुभ और अशुभ के बीच फसा रहता है। उसे इस बात का पता नहीं रहता है की उसके लिए अच्छा क्या है और बुरा क्या है। लेकिन वो इस अशुभ और शुभ के बीच में संतुलन बनाएं रखते है। ये संतुलन ही गणेश है। शिव और पार्वती के पुत्र गणेश प्रकृति की शक्तियों के एक विराट रूपक हैं।इस रूपक के लिए असंख्य मिथक हैं। सब ने अपनी अपनी सोच को बताया है। उनके रूप में प्रकृति और मनुष्य के बीच संपूर्ण सामंजस्य का एक आदर्श प्रतीक गढ़ा गया है, जो जीवन प्रबन्धन की मिसाल है।कुंआरे गणेश बैरागी हैं। विवाहित गणेश गृहस्थ जीवन के प्रतीक हैं। दक्षिण में उन्हें कुंआरा और उत्तर भारत में शादी शुदा मानते हैंं। छात्र से लेकर बुजुर्ग तक गणेश जीवन के हर चरण की ज़रूरतों के देवता हैंं। इकलौते देवता हैंं। जो ज्ञान की देवी सरस्वती और ऐश्वर्य की देवी लक्ष्मी दोनो के निकट हैं।
इसलिए कहा गया विनायक.
विघ्नहर्ता श्री गणेश की शारीरिक संरचना की भी एक दार्शनिक दृष्टि है, उनका मस्तक हाथी का , चूहा उनका वाहन है, नंदी मित्र और अभिभावक, मोर और सांप परिवार के सदस्य हैं। पर्वत आवास है, वन क्रीड़ा स्थल, आकाश तले निवास अर्थात छत नाम की कोई चीज है। उनका प्रचलित रूप गढ़ने में नदी की बड़ी भूमिका रही है। मान्यता है कि पार्वती ने अपने शरीर के मैल से एक छोटी-सी आकृति गढ़ी थी। गणेश को माता पार्वती ने अपने उबटन से बनाया था।एक बार मां पार्वती ने हल्दी और तेल से बना उबटन लगाया। जब वह उबटन उनके पसीने में भीगकर त्वचा पर सूख गया तो मां ने उसे झाड़ दिया। उस झड़े हुए उबटन से गणेश का जन्म हुआ। इसीलिए उन्हें विनायक कहा गया। फिर उसे गंगा में नहला दिया। गंगा के स्पर्श से आकृति में जान आई और वह विशाल हो गए। पार्वती ने उसे पुत्र कहा, तो देवताओं ने उसे गांगेय कहकर संबोधित किया।
देवताओं में सर्वोपरि
एक बार माता पार्वती ने इस जीवधारी पुतले को द्वार पर प्रहरी के रूप में बैठा दिया और उसे आदेश दिया कि वह किसी भी व्यक्ति को अंदर न आने दें।फिर वे स्नान करने चली गईं। कुछ ही समय बाद वहां शिव आए। उन्हें गणेश के जन्म के बारे में कुछ भी नहीं पता था। उनसे सर्वथा अपरिचित गणेश ने शिव जी को भी अंदर जाने से रोक दिया। जब ऐसा गणेश ने कहा तब शिव क्रोधित हो गए। और उन्होंने अपने त्रिशूल से गणेश का सिर काट दिया। गणेश का जब गला कटा तब उन्होंने बहुत उच्च स्वर में मां बोला। माता दौड़े दौड़े आई। पार्वती ने देखा तो वे बहुत दुखी हुईं। तब माता पार्वती को प्रसन्न करने के लिए शिव ने एक हाथी के बच्चे का सिर गणेश के धड़ से लगाकर उन्हें पुनर्जीवित कर दिया। तभी से गणेश, गजानन, कहलाए। गणेश के शिरच्छेदन की घटना चतुर्थी के दिन ही हुई थी।बालक की आकृति से पार्वती बहुत दुखी हुई तो सभी देवताओं ने उन्हें आशीर्वाद और अतुलनीय उपहार भेंट किए। इंद्र ने अंकुश, वरुण ने पाश, ब्रह्मा ने अमरत्व, लक्ष्मी ने ऋद्धि सिद्धि और सरस्वती ने समस्त विद्याएं प्रदान कर उन्हें देवताओं में सर्वोपरि बना दिया।
गणों के अधिपति हैं गणेश
श्री गणेश सभी देवताओं में प्रथम पूज्यनीय है। उन्हें जल का अधिपति माना गया है। उनके चार हाथों में से एक हाथ में जल का प्रतीक शंख है। दूसरे हाथ में सौंदर्य का प्रतीक कमल है, तीसरे हाथ में संगीत की प्रतीक वीणा है, चौथे हाथ में शक्ति का प्रतीक परशु या फरसा है। यह सर्वमान्य है कि काव्य के छंद की उत्पत्ति प्रकृति में मौजूद विविध ध्वनियों से हुई थी। गणेश, छंद शास्त्र के आठों गणों के अधिष्ठाता देवता हैं। यह भी एक कारण है कि उन्हें गणेश नाम दिया गया। प्रकृति में हर तरफ बहुतायत से उपलब्ध हरी-भरी दूब गणेश को सर्वाधिक प्रिय है।
बहुत लोकप्रिय हैं गोबर गणेश
गोबर के गणेश तो बहुत लोकप्रिय हैं। गणेश के प्रति सम्मान का अर्थ है, कि प्रकृति में मौजूद सभी जीव-जंतुओं, जल, हवा, जंगल और पर्वत का सम्मान है। शास्त्रों में उल्लेख है कि आम, पीपल और नीम के पत्तों वाली गणेश की मूर्ति घर के मुख्यद्वार पर लगाने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार बना रहता है। गणेश के प्रति सम्मान का अर्थ है कि प्रकृति में मौजूद सभी जीव-जंतुओं, जल, हवा, जंगल और पर्वत का सम्मान है। किसी भी शुभ कार्य का आरम्भ करने के पहले श्री गणेश पूजा करने की परंपरा है।
हमारे भीतर हैं गणेश
विनायक मंदिरों में तो होते ही है लेकिन वो हमारे साथ हमेशा होते है। गणेश को भुलाने का असर प्रकृति के साथ-साथ हमारे रिश्तों पर भी पड़ा है। आज प्रकृति अपने अस्तित्व के सबसे बड़े संकट से रूबरू है और इस संकट में हम उसके साथ नहीं, उसके खिलाफ खड़े हैं। गणेश के अद्भुत स्वरूप को समझना और पाना है, तो उसके लिए असंख्य मंदिरों और मूर्तियों की स्थापना, मंत्रों और भजन-कीर्तन का कोई अर्थ नहीं। प्रकृति, पर्यावरण और जीवन को सम्मान और संरक्षण देकर ही हम अपने भीतर के श्री गणेश को जगा सकते हैं। वे बहुत दयालु होते है।
भोग वाले लड्डू में भी साइंस
श्री गणेश को मोदक बहुत प्रिय है।मोदक को जिस आकार में बनाया जाता है, उसमें ऊपर की ओर त्रिकोण बना हुआ होता है। तंत्र विद्या में ऊपर की ओर उठता त्रिकोण, आध्यात्मिक सत्य का प्रतीक है, जबकि, नीचे की ओर बना त्रिकोण, भौतिक सत्य का प्रतीक है। भगवान गणेश चलते फिरते नहीं है। एक जगह बैठ कर वे लिखने पढ़ने का काम करते हैं। उनका पेट निकला हुआ है, शरीर भारी है, गणेश लड्डू बहुत अधिक खाते हैं। एक डायबेटिक के सारे लक्षण उनमें हैं। ऐसे में हमने उनके भोग का क्या इन्तज़ाम किया? गजाननं भूत गणादिवेशितम्, कपित्थ जम्बू फल चारू भक्षणम. यानी कैथा और जामुन उनके प्रिय भोग हैं जिसे आयुर्वेद में मधुमेह की दवा मानते हैं, यानी गणेश का प्रबन्धन, उनका लेखकीय कौशल, प्रकृति से उनका तादात्म सब कुछ वैज्ञानिक है।
गणेश पूजा की विश्वव्यापी मान्यता
गणेश चतुर्थी केवल महाराष्ट्र से जुड़े हुए नहीं है। बल्कि गणपति पूजा जापान, चीन, कंबोडिया, इंडोनेशिया, थाईलैंड,मलाया, जावा, सुदूर मैक्सिको और तिब्बत तक में पहुंच गयी है।इन देशों में बहुतायत से गणेश प्रतिमाओं का उपलब्ध होना इस बात का प्रमाण है कि गणेश पूजा की विश्वव्यापी मान्यता है, उन्हें गणराज्य के अध्यक्ष के रूप में स्वीकार किया जाता था।
बाल गंगाधर तिलक ने पुनर्प्रतिष्ठित किया
यह पर्व स्वतंत्रता से पहले सन् 1900 में बाल गंगाधर तिलक ने गणपति की मूर्ति स्थापित करके भारत में इस पर्व की पुनर्प्रतिष्ठित किया। उन्होंने इन पूजा पांडालों को जनचेतना और सामाजिक पुनरूत्थान से जोड़ा।इसी बहाने लोग इकठ्ठा होने लगे। तिलक महराज ने गणेशोत्सव को स्वाधीनता आन्दोलन की पहचान बना दिया। तब से जगह जगह पर गणेश जी की भव्य प्रतिमाएं स्थापित होती हैं. गणेशोत्सव गणेश चतुर्थी से अनंत चौदस तक मनाया जाने वाला एक धार्मिक सामाजिक पर्व बन गया। इसके ज़रिए हजारों जगहों पर भारतीय कला और संस्कृति की भिन्न भिन्न छवियों के दर्शन होते हैं।
विघ्नविनाशक शक्ति के धारक
शास्त्रों में गणेश जी का वर्णन करते हुए लिखा गया है-
वक्रतुंड महाकाय। सूर्यकोटि सम प्रभ। निर्विघ्न कुरु मे देव। सर्व कार्येषु सर्वदा॥
अर्थात्- जिनकी सूंड़ वक्र है, जिनका शरीर महाकाय है, जो करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी हैं।ऐसे सब कुछ प्रदान करने में सक्षम शक्तिमान श्री गणेश जी सदैव मेरे विघ्न हरें। वेदों में ‘नमो गणेभ्यो गणपतिभ्वयश्चवो नमो नम:’ अर्थात गणों और गणों के स्वामी श्री गणेश को नमस्का।
कुशाग्र स्मरण शक्ति के मालिक हैं गजानन
हमारा शरीर पांच तत्त्वों से निर्मित है और इन तत्त्वों के पांच अधिदेव माने जाते है। आकाश तत्त्व के शिव देवता, वायु तत्त्व के भगवती देवता, अग्नि के सूर्य देव और पृथ्वी तत्त्व के देवता श्री गणेश हैं। गणेश जी गज मस्तक हैं अर्थात वह बुद्धि के देवता हैं। इनकी स्मरण शक्ति अत्यन्त कुशाग्र है। ऐसा कहा जाता है की हाथी अपनी याददाश्त के लिए जाना जाता है। हाथी की भ्रांति उनकी प्रवृत्ति प्रेरणा का उद्गम स्थान धीर, गंभीर, शांत और स्थिर चेतना में है। हाथी की आंखें अपेक्षाकृत बहुत छोटी होती हैं और उन आंखों के भावों को समझ पाना बहुत कठिन होता है। शासक भी वही सफल होता है जिसके मनोभावों को पढ़ा और समझा न जा सके।
शक्तिशाली व स्वाभिमानी शासक के प्रतीक
गज मुख के कान भी इस बात के प्रतीक हैं कि शासक जनता की बात को सुनने के लिए कान सदैव खुले रखें, यदि शासक जनता की ओर से अपने कान बंद कर लेगा तो मुश्किल होगी, शासक को हाथी की ही भांति शक्तिशाली एवं स्वाभिमानी होना चाहिए। हाथी बिना झुके ही अपनी सूंड की सहायता से सब कुछ उठा कर अपना पोषण कर सकता है। शासक को किसी भी परिस्थिति में दूसरों के सामने झुकना नहीं चाहिए। उनका उदर बहुत लम्बा है, उसमें हर बात समा जाती है।शासक में हर बात को पचाने की क्षमता होनी चाहिए।
सात्विक देवता हैं गणेश जी
श्री गणेश शारीरिक रचना से पूर्ण रूप से सात्विक दिखते है। गणेश सभी देवों में प्रथम पूज्य हैं। शिव के गणों के अध्यक्ष होने के कारण इन्हें गणेश और गणाध्यक्ष भी कहा जाता है।गणेश जी को प्रथम लिपिकार माना जाता है। उन्होंने ही देवताओं की प्रार्थना पर वेद व्यास जी द्वारा रचित महाभारत को लिपिबद्ध किया था। ऐसी धार्मिक मान्यता है की जैन एवं बौद्ध धर्मों में भी गणेश पूजा का विधान है। गणेश मंगलमूर्ति भी कहे जाते हैं क्योंकि इनके सभी अंग जीवन को सही दिशा देते हैं।
बुद्धि और विवेक से परिपूर्ण
गणेश जी का माथा काफी बड़ा है। अंग विज्ञान के अनुसार बड़े सिर वाले व्यक्ति नेतृत्व करने में योग्य होते हैं। इनकी बुद्घि कुशाग्र होती है। गणेश जी का बड़ा सिर यह भी ज्ञान देता है कि अपनी सोच को बड़ा बनाए रखना चाहिए गणपति की आंखें छोटी हैं। अंग विज्ञान के अनुसार छोटी आंखों वाले व्यक्ति चिंतनशील और गंभीर प्रकृति के होते हैं।गणेश जी के कान सूप जैसे बड़े हैं इसलिए इन्हें गजकर्ण या सूपकर्ण भी कहा जाता है। अंग विज्ञान के अनुसार लंबे कान वाले व्यक्ति भाग्यशाली और दीर्घायु होते हैं।गणेश जी के लंबे कानों का एक रहस्य यह भी है कि उनकी सुनने की क्षमता ज़्यादा है। कान के कच्चे नहीं हैं, वह सबकी सुनते हैं, फिर अपनी बुद्धि और विवेक से निर्णय लेते हैं।
चौकन्ना रहने का संकेत देते हैं गणपति के कान
बड़े कान हमेशा चौकन्ना रहने के भी संकेत देता है। गणेश जी के सूप जैसे कान से यह शिक्षा मिलती है कि जैसे सूप बुरी चीजों को छांटकर अलग कर देता है उसी तरह जो भी बुरी बातें आपके कान तक पहुंचती हैं उसे बाहर ही छोड़ दें।गणेश जी की सूंड हमेशा हिलती डुलती रहती है जो उनके हर पल सक्रिय रहने का संकेत है। यह हमें बताती है कि जीवन में सदैव सक्रिय रहना चाहिए।शास्त्रों में गणेश जी की सूंड की दिशा का भी अलग-अलग महत्व बताया गया है। मान्यता है कि जो व्यक्ति सुख-समृद्वि चाहते हैं उन्हें दायीं ओर सूंड वाले गणेश की पूजा करनी चाहिए।
टूटे हुए दांत से लिख डाला महाभारत ग्रंथ
बचपन में गणेश का परशुराम से युद्ध हुआ था।इस युद्ध में परशुराम ने अपने फरसे से भगवान गणेश का एक दांत काट दिया। इसी समय से ही गणेश जी एकदंत कहलाने लगे।अपनी इस कमी को उन्होने अपनी विशेषता बना ली। गणेश जी ने अपने टूटे हुए दांत को लेखनी बना लिया और इससे पूरा महाभारत ग्रंथ लिख डाला। गणेश जी का अस्त्र कुल्हाड़ी इस बात की प्रतीक है कि हमें भौतिकता से जुड़े हर बंधन को काटना होगा।
कार्तिकेय तप हैं तो गणेश रस
कार्तिकेय शिव के योध्दा पुत्र है , तो गणेश प्रकांड पंडित, कार्तिकेय अग्नि से जुड़े है, तो गणेश जल से, कार्तिकेय तप है तो गणेश रस, कार्तिकेय ह्रष्ट पुष्ट हैं तो गणेश स्थूल और उर्वर, कार्तिकेय योद्धा हैं, गणेश विद्वान, कार्तिकेय को अपनी सेना और हथियारों से प्रेम है तो गणेश को सम्पत्ति और बुद्धिमत्ता से, कार्तिकेय देवों के सेनापति है, तो गणेश ऋषियों के लिपिक, शिव और शक्ति के इन दो बेटों के ज़रिए ईश्वर और देवी की भावना मानवता से जुड़ती है। गणेश ने महान ऋषि वेद व्यास के कहने पर महाभारत अपने हाथों से लिखा था। इस ग्रंथ को लिखने के लिए व्यास और गणेश के बीच एक समझौता हुआ था कि व्यास इसे बिना रुके सुनाएंगे व गणेश भी बिना रुके लिखेंगे।
श्री गणेश यत्र, तत्र, सर्वत्र हैं,लेकिन सबसे अहम है ये है की श्री गणेश का मानव जीवन के केंद्र में होना। मानव की सोच के अंतस्थल में होना। गणेश शाश्वत हैंं।हमारी आस्थाओं के ओम में गणेश हैं।



































