सनातन धर्म और वैदिक ज्योतिष में समय की गणना अत्यंत सूक्ष्म और वैज्ञानिक तरीके से की गई है। इसी खगोलीय और आध्यात्मिक गणना का एक अहम हिस्सा है ‘मलमास’, जिसे ‘अधिक मास’ या ‘पुरुषोत्तम मास’ के नाम से भी जाना जाता है। साल 2026 में इस पवित्र और रहस्यमयी माह की शुरुआत 17 मई 2026 से हो चुकी है। यह वह समय होता है जब लौकिक या सांसारिक कार्यों को विराम देकर आध्यात्मिक उन्नति की ओर कदम बढ़ाया जाता है।
आइए विस्तार से समझते हैं कि आखिर मलमास क्यों लगता है, इसके पीछे की खगोलीय मान्यता क्या है, भगवान विष्णु से इसका क्या संबंध है और इस दौरान किन कार्यों को करने की सख्त मनाही होती है।
खगोलीय और ज्योतिषीय दृष्टिकोण: क्यों जुड़ता है यह अतिरिक्त महीना?
हिंदू पंचांग मुख्य रूप से सूर्य (Solar) और चंद्र (Lunar) वर्ष की गणनाओं पर आधारित होता है। सूर्य वर्ष लगभग 365 दिन और 6 घंटे का होता है, जबकि चंद्र वर्ष लगभग 354 दिनों का होता है। इन दोनों वर्षों के बीच हर साल लगभग 11 दिनों का अंतर आ जाता है। यह अंतर तीन वर्षों में बढ़कर लगभग एक महीने (33 दिन) के बराबर हो जाता है।
सूर्य और चंद्र वर्ष के बीच इसी बड़े असंतुलन को दूर करने और ऋतुओं के चक्र को सही बनाए रखने के लिए, हिंदू पंचांग में हर तीन साल में एक अतिरिक्त महीना जोड़ दिया जाता है। इसी अतिरिक्त महीने को ‘अधिक मास’ या ‘मलमास’ कहा जाता है। ज्योतिषीय दृष्टि से, जिस चंद्र मास में सूर्य की कोई संक्रांति (सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश) नहीं होती, उसे मलमास घोषित किया जाता है। संक्रांति न होने के कारण इस महीने को मलिन (अपवित्र) माना गया है।
पौराणिक कथा: कैसे ‘मलिन मास’ बन गया भगवान विष्णु का प्रिय ‘पुरुषोत्तम मास’
धार्मिक ग्रंथों और पुराणों में मलमास के संदर्भ में एक अत्यंत रोचक और भावुक कथा वर्णित है। कथा के अनुसार, जब इस अतिरिक्त महीने की उत्पत्ति हुई, तो इसका कोई स्वामी या देवता नहीं था। सूर्य संक्रांति न होने के कारण इसे शुभ कार्यों के लिए अयोग्य और ‘मलिन’ मान लिया गया। देवों और मनुष्यों ने इसका तिरस्कार करना शुरू कर दिया।
अपने इस अपमान और दुर्दशा से अत्यंत दुखी होकर मलमास रोते हुए वैकुंठ धाम पहुंचा और जगत के पालनहार भगवान श्री हरि विष्णु के चरणों में गिर पड़ा। मलमास ने अपनी व्यथा सुनाते हुए कहा कि, “हे प्रभु! संसार में हर महीने का कोई न कोई अधिपति है, लेकिन मेरा कोई अस्तित्व नहीं, सब मेरा तिरस्कार करते हैं।”
मलमास की इस करुण पुकार को सुनकर भगवान विष्णु का हृदय द्रवित हो उठा। उन्होंने मलमास को वरदान देते हुए कहा, “आज से मैं तुम्हें अपना नाम देता हूँ। अब से तुम ‘पुरुषोत्तम मास’ के नाम से जाने जाओगे और मैं स्वयं तुम्हारा स्वामी हूँगा।”
भगवान विष्णु ने यह भी घोषणा की कि जो भी भक्त इस महीने के दौरान निष्काम भाव से दान-पुण्य, परोपकार, दीपदान, भगवद गीता का पाठ और विष्णु सहस्रनाम का जाप करेगा, उसे अन्य महीनों की तुलना में कई गुना अधिक पुण्य फल की प्राप्ति होगी और अंततः वह मेरे परम धाम को प्राप्त करेगा। इसी कारण मलमास में आध्यात्मिक साधना का विशेष महत्व है।
मलमास के दौरान वर्जित कार्य: भूलकर भी न करें ये गलतियां
यद्यपि आध्यात्मिक और धार्मिक कार्यों के लिए मलमास सर्वश्रेष्ठ माना गया है, लेकिन सांसारिक और मांगलिक कार्यों के लिए इस महीने को निषेध (वर्जित) बताया गया है। शास्त्रों के अनुसार इस अवधि में निम्नलिखित कार्यों को करने से बचना चाहिए:
1. विवाह और सगाई (मांगलिक कार्य पूर्णतः वर्जित) मलमास के दौरान विवाह, सगाई या रोका जैसे रिश्ते तय करने वाले मांगलिक कार्य भूलकर भी नहीं करने चाहिए। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, इस दौरान ग्रहों और देवताओं का आशीर्वाद सांसारिक कार्यों पर नहीं होता। यदि इस माह में विवाह किया जाए, तो पति-पत्नी के बीच वैचारिक मतभेद, अलगाव की स्थिति और जीवन में भारी उतार-चढ़ाव आने की प्रबल संभावना रहती है।
2. उपनयन (जनेऊ) और मुंडन संस्कार की मनाही हिंदू धर्म के 16 संस्कारों में मुंडन और जनेऊ (उपनयन) संस्कार का बहुत महत्व है। मलमास की अवधि में इन संस्कारों को करना घोर अशुभ माना गया है। ऐसा माना जाता है कि इस दौरान किए गए संस्कार बच्चे के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा के बजाय नकारात्मकता ला सकते हैं और उनका भविष्य बाधाओं से घिर सकता है।
3. गृह प्रवेश और नव-निर्माण का आरंभ यदि आप अपने सपनों का नया घर बना रहे हैं या उसमें प्रवेश (Shift) करने की योजना बना रहे हैं, तो मलमास के दौरान इसे रोक देना ही उचित है। मलिन मास में गृह प्रवेश करने से घर में वास्तु दोष उत्पन्न हो सकता है, परिवार के सदस्यों के बीच अकारण कलह-क्लेश बढ़ सकता है और घर की सुख-शांति भंग हो सकती है।
4. नए व्यापार या कार्य का शुभारंभ कारोबारियों और उद्यमियों के लिए यह समय नया निवेश करने या नई कंपनी शुरू करने के लिए अनुकूल नहीं होता। मलमास में शुरू किए गए किसी भी नए व्यापार या स्टार्टअप में बरकत नहीं होती और व्यक्ति को भारी आर्थिक घाटे या मानसिक तनाव का सामना करना पड़ सकता है।
5. स्वर्ण, रजत और कीमती आभूषणों की खरीदारी से बचें आमतौर पर भारतीय संस्कृति में सोना-चांदी खरीदना शुभता का प्रतीक है, लेकिन मलमास में आभूषणों की खरीदारी को निषेध माना गया है। इस अवधि में खरीदी गई मूल्यवान वस्तुएं समृद्धि लाने के बजाय धन के अपव्यय (फिजूलखर्ची) का कारण बन सकती हैं।
6. भूमि, भवन और संपत्ति के सौदे न करें नई प्रॉपर्टी, प्लॉट या फ्लैट खरीदने की योजना को मलमास खत्म होने तक टाल देना चाहिए। इस दौरान किसी भी तरह की रियल एस्टेट डील या संपत्ति के कागजातों पर हस्ताक्षर करने से भविष्य में कानूनी विवाद या संपत्ति से जुड़े नुकसान का खतरा बना रहता है।
7. तामसिक आहार और व्यसनों से सख्त दूरी मलमास शरीर और मन की शुद्धि का महीना है। इस पूरे महीने के दौरान सात्विक जीवन शैली अपनानी चाहिए। मांस, मदिरा, लहसुन, प्याज, या किसी भी प्रकार के नशे (तामसिक भोजन) का सेवन सर्वथा वर्जित है। तामसिक भोजन के सेवन से मन में उग्रता आती है और व्यक्ति ईश्वरीय कृपा से वंचित होकर जीवन में कई तरह की शारीरिक और मानसिक परेशानियों से घिर सकता है।
निष्कर्ष: मलमास या पुरुषोत्तम मास कोई अशुभ समय नहीं है, बल्कि यह भौतिक दौड़-भाग को रोककर अपने भीतर झांकने और ईश्वर के करीब जाने का एक स्वर्णिम अवसर है। सांसारिक इच्छाओं पर नियंत्रण रखकर यदि इस माह का उपयोग ध्यान, सेवा और ईश्वरीय भक्ति में किया जाए, तो यह जीवन का सबसे फलदायी समय साबित हो सकता है।





































