सनातन हिंदू धर्म और भारतीय दर्शन का मूल आधार हमारे चार वेद हैं, जिन्हें ‘श्रुति’ (अर्थात जो सुना गया हो) कहा जाता है। इन चार पवित्रतम वेदों में ‘यजुर्वेद’ का अत्यंत महत्वपूर्ण और अद्वितीय स्थान है। ऋग्वेद के पश्चात इसे प्रायः दूसरा सबसे प्रमुख वेद माना जाता है। यजुर्वेद मुख्य रूप से यज्ञों, हवनों और विविध कर्मकाण्डों की वास्तविक प्रक्रियाओं को संपन्न करने के लिए गद्य और पद्य मंत्रों का एक विशाल संग्रह है। यद्यपि यजुर्वेद में ऋग्वेद के लगभग 663 मंत्र ज्यों के त्यों पाए जाते हैं, फिर भी अपनी विशिष्ट शैली और गद्यात्मक प्रकृति के कारण इसे ऋग्वेद से सर्वथा भिन्न और स्वतंत्र माना जाता है। यज्ञ के दौरान पुरोहितों द्वारा उच्चारित किए जाने वाले इन गद्यात्मक मंत्रों को ही ‘यजुस’ कहा जाता है।
ऐतिहासिक एवं भौगोलिक पृष्ठभूमि
वैदिक काल के विकास क्रम को समझने के लिए वेदों की रचना-स्थली को जानना अत्यंत आवश्यक है। जहाँ एक ओर ऋग्वेद की रचना ‘सप्त-सिन्धु’ (वर्तमान में पश्चिमोत्तर भारत और पाकिस्तान का क्षेत्र) के प्रदेश में हुई थी, वहीं समय के साथ आर्यों के सभ्यतागत विस्तार के फलस्वरूप यजुर्वेद की रचना कुरुक्षेत्र के पावन प्रदेश में हुई। यह वह समय था जब आर्यों का सामाजिक और राजनीतिक केंद्र सिंधु नदी घाटी से खिसक कर गंगा-यमुना के दोआब और कुरुक्षेत्र की ओर आ गया था।
इतिहासकारों और वैदिक विद्वानों के एक बड़े वर्ग के मतानुसार, यजुर्वेद का रचनाकाल मुख्य रूप से 1400 ईसा पूर्व से लेकर 1000 ईसा पूर्व के मध्य माना जाता है। यह वह दौर था जब वैदिक समाज में यज्ञीय अनुष्ठानों का महत्व अपने चरम पर था और एक सुव्यवस्थित कर्मकाण्ड प्रणाली विकसित हो रही थी।
‘यजुर्वेद’ शब्द की व्युत्पत्ति, नामकरण और मुख्य विषय
‘यजुर्वेद’ शब्द का निर्माण दो मूल शब्दों की संधि से हुआ है: ‘यजुष्’ + ‘वेद’। संस्कृत व्याकरण के अनुसार ‘यज्’ धातु का अर्थ होता है—समर्पण, पूजा, या यज्ञ करना।
इस वेद का मुख्य विषय ही यजन या समर्पण की क्रिया है। इसके अंतर्गत ईश्वर और प्रकृति के प्रति समर्पण के कई रूप बताए गए हैं:
- पदार्थों का हवन: अग्नि में घी, समिधा (ईंधन), और औषधियों की आहुति देना।
- कर्म और सेवा: समाज और मानव जाति की सेवा करना तथा तर्पण या श्राद्ध कर्म करना।
- आध्यात्मिक यजन: योग, ध्यान और अपनी इंद्रियों पर निग्रह (नियंत्रण) प्राप्त करना। श्रीमद्भगवद्गीता (4.26) में भी इसी भाव को दर्शाते हुए कहा गया है कि श्रोत्रादि इंद्रियों को संयम रूपी अग्नि में हवन करना ही सच्चा समर्पण है।
चूंकि इस वेद में अधिकांशतः यज्ञों और हवनों को संपन्न करने के नियम, विधान और तकनीकी प्रक्रियाएं दी गई हैं, इसलिए यह ग्रंथ पूरी तरह से कर्मकाण्ड प्रधान है। इस ग्रंथ के गहन अध्ययन से हमें उत्तर वैदिक कालीन आर्यों के सामाजिक ताने-बाने, उनकी उन्नत धार्मिक मान्यताओं, और उस समय की सुदृढ़ ‘वर्ण-व्यवस्था’ तथा ‘वर्णाश्रम धर्म’ की एक बहुत ही स्पष्ट और प्रामाणिक झाँकी मिलती है।
यजुर्वेद में वर्णित प्रमुख यज्ञ और अनुष्ठान
यजुर्वेद संहिताओं में वैदिक काल के धर्म को जीवन में उतारने के लिए अनेक विशिष्ट यज्ञों का विस्तृत वैज्ञानिक और आध्यात्मिक विवरण प्राप्त होता है। इनमें से कुछ प्रमुख यज्ञ निम्नलिखित हैं, जिनका आयोजन तत्कालीन चक्रवर्ती सम्राटों से लेकर सामान्य गृहस्थों तक द्वारा किया जाता था:
- अग्निहोत्र: यह एक दैनिक अनुष्ठान है, जिसे सूर्योदय और सूर्यास्त के समय अग्नि में आहुति देकर संपन्न किया जाता है।
- अश्वमेध यज्ञ: यह एक विशाल और अत्यंत महत्वपूर्ण राजकीय यज्ञ था, जिसे कोई भी शक्तिशाली चक्रवर्ती सम्राट अपने साम्राज्य की सीमाओं के विस्तार और संप्रभुता को सिद्ध करने के लिए करता था।
- राजसूय यज्ञ: जब कोई राजा राज्याभिषेक के उपरांत सिंहासन पर आसीन होता था, तब प्रभुत्व और दैवीय अधिकार प्राप्त करने के लिए यह यज्ञ किया जाता था।
- वाजपेय यज्ञ: शक्ति, समृद्धि और समाज में सर्वोच्च स्थान प्राप्त करने के लिए राजाओं और ब्राह्मणों द्वारा किया जाने वाला एक प्रमुख अनुष्ठान।
- सोमयज्ञ और अग्निचयन: देवताओं को प्रसन्न करने के लिए सोमरस की आहुति और विशेष आकार (जैसे गरुड़) की यज्ञवेदी का निर्माण कर अग्नि स्थापित करने की जटिल प्रक्रिया।
राष्ट्रोत्थान और स्वाधीनता हेतु प्रार्थना (राष्ट्रिय वंदना)
यजुर्वेद केवल कर्मकाण्ड तक सीमित नहीं है; इसमें राष्ट्र प्रेम, समाज कल्याण और स्वाधीनता की अत्यंत उच्च भावना भी समाहित है। यजुर्वेद के 22वें अध्याय के 22वें मंत्र में एक अत्यंत सशक्त राष्ट्र-प्रार्थना की गई है, जो आज भी प्रासंगिक है:
मूल संस्कृत मंत्र: ओ३म् आ ब्रह्मन् ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायतामाराष्ट्रे राजन्यः शूरऽइषव्योऽतिव्याधी महारथो जायतां दोग्ध्री धेनुर्वोढ़ाऽनड्वानाशुः सप्तिः पुरन्धिर्योषा जिष्णू रथेष्ठाः सभेयो युवास्य यजमानस्य वीरो जायतां निकामे-निकामे नः पर्जन्यो वर्षतु फलवत्यो नऽओषधयः पच्यन्तां योगक्षेमो नः कल्पताम् ॥ (यजुर्वेद 22.22)
विस्तृत हिंदी अर्थ: हे परब्रह्म! हमारे इस प्यारे राष्ट्र में जन्म लेने वाले ब्राह्मण (विद्वान) आत्मिक और ब्रह्म तेज से संपन्न हों। यहाँ के क्षत्रिय (रक्षक) अदम्य साहसी, शस्त्र विद्या में निपुण, शत्रुओं के दल का विनाश करने वाले और महारथी हों। हमारे राष्ट्र की गाएं प्रचुर मात्रा में दूध देने वाली हों, हमारे बैल कृषि और भार वहन करने में मजबूत हों, और हमारे अश्व (घोड़े) अत्यंत तीव्र गति वाले हों। इस राष्ट्र की नारियाँ सर्वगुण संपन्न, विदुषी और आधारस्वरूपा हों। यहाँ के युवा सभ्य, विजयी और वीर योद्धा बनें। हमारी इच्छा और आवश्यकता के अनुसार समय-समय पर जीवनदायिनी वर्षा हो। हमारी वनस्पतियाँ और औषधियां हमेशा रसीले फलों और आरोग्य गुणों से लदी रहें, और अंततः, हम सभी देशवासियों को पूर्ण स्वाधीनता और योग-क्षेम (अप्राप्त की प्राप्ति और प्राप्त की रक्षा) की निरंतर प्राप्ति होती रहे।
यजुर्वेद के सम्प्रदाय, मुख्य शाखाएं और संहिताएं
यजुर्वेद का अध्ययन करने वाली विशाल परंपरा मुख्य रूप से दो बड़े संप्रदायों या शाखाओं में विभाजित है:
- ब्रह्म सम्प्रदाय (कृष्ण यजुर्वेद) – जिसका प्रचलन मुख्य रूप से दक्षिण भारत में अधिक रहा है।
- आदित्य सम्प्रदाय (शुक्ल यजुर्वेद) – जिसका प्रचलन और प्रभाव मुख्य रूप से उत्तर भारत में है।
महर्षि पतंजलि ने अपने महाभाष्य में यजुर्वेद की 101 शाखाओं का उल्लेख किया था, किंतु काल के थपेड़ों और संरक्षण के अभाव में वर्तमान समय में केवल पाँच शाखाएं ही शेष बची हैं: काठक (कठ), कपिष्ठल, मैत्रायणी, तैत्तिरीय और वाजसनेयी।
1. कृष्ण यजुर्वेद (ब्रह्म सम्प्रदाय)
वर्तमान में कृष्ण यजुर्वेद की केवल 4 संहिताएं ही उपलब्ध हैं: तैत्तिरीय, मैत्रायणी, कठ और कपिष्ठल-कठ। कृष्ण यजुर्वेद की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें वैदिक मंत्रों के साथ-साथ उनकी व्याख्या करने वाले गद्यात्मक अंश (ब्राह्मण ग्रंथों का हिस्सा) भी एक ही स्थान पर मिश्रित रूप में मौजूद हैं। मंत्रों और ब्राह्मण भागों का यह ‘एकत्र मिश्रण’ ही इसे ‘कृष्ण’ (अस्पष्ट या मिश्रित) स्वरूप प्रदान करता है। इसकी तैत्तिरीय संहिता को ‘आपस्तम्ब संहिता’ के नाम से भी जाना जाता है।
2. शुक्ल यजुर्वेद (आदित्य सम्प्रदाय)
इसके विपरीत, शुक्ल यजुर्वेद में मंत्रों और उनकी व्याख्याओं को पूरी तरह से अलग-अलग रखा गया है। इसमें मंत्रों का विशुद्ध, अमिश्रित और अत्यंत स्पष्ट रूप देखने को मिलता है, जिसके कारण इसे ‘शुक्ल’ (श्वेत या शुद्ध) कहा जाता है। वर्तमान में इसकी केवल दो प्रधान संहिताएं ही उपलब्ध हैं:
- माध्यंदिन संहिता
- काण्व संहिता
आजकल जनमानस में सबसे अधिक प्रचलित ‘माध्यंदिन संहिता’ ही है। यह एक अत्यंत विशाल ग्रंथ है जिसमें कुल 40 अध्याय, 1975 कण्डिकाएँ (अनुष्ठान कर्मों में प्रयुक्त मंत्रों के छोटे-छोटे समूह), तथा 3988 मंत्र संकलित हैं। विश्व का सबसे प्रसिद्ध ‘गायत्री मंत्र’ (36.3) और भगवान शिव को समर्पित महामृत्युंजय स्वरूप ‘त्र्यम्बकं यजामहे’ मन्त्र (3.60) इसी शुक्ल यजुर्वेद में स्पष्ट रूप से उल्लेखित हैं।
कृष्ण और शुक्ल यजुर्वेद के विभाजन की पौराणिक कथा
यजुर्वेद के कृष्ण और शुक्ल स्वरूप में विभाजित होने के पीछे एक अत्यंत रोचक पौराणिक कथा है। पुराणों के अनुसार, महर्षि वेदव्यास के एक परम ज्ञानी शिष्य थे—वैशंपायन। वैशंपायन के कुल 27 शिष्य थे, जिनमें सबसे अधिक मेधावी और प्रतिभाशाली महर्षि याज्ञवल्क्य थे।
एक बार किसी यज्ञ के दौरान याज्ञवल्क्य अपने साथी शिष्यों की अज्ञानता और कार्यप्रणाली से क्षुब्ध (नाराज) हो गए। शिष्यों के बीच उपजे इस भारी विवाद को देखकर गुरु वैशंपायन क्रोधित हो गए और उन्होंने याज्ञवल्क्य से अपनी सिखाई हुई सारी विद्या तुरंत वापस मांग ली। गुरु की आज्ञा का पालन करते हुए, क्रुद्ध याज्ञवल्क्य ने अपने भीतर समाहित संपूर्ण यजुर्वेद के ज्ञान का ‘वमन’ (उल्टी) कर दिया। कहते हैं कि वमन किए गए वे ज्ञान के कण उनके रक्त से सने होने के कारण कृष्ण (काले) वर्ण के हो गए थे। इसी मिश्रित और रक्त रंजित ज्ञान से ‘कृष्ण यजुर्वेद’ की उत्पत्ति हुई।
ज्ञान के इन अमूल्य कणों को पृथ्वी पर गिरता देख, वैशंपायन के अन्य शिष्यों ने ‘तीतर’ (Tittir) पक्षी का रूप धारण किया और उन ज्ञान रूपी दानों को चुग लिया। इसी कारण कृष्ण यजुर्वेद की सबसे प्रमुख शाखा का नाम ‘तैत्तिरीय संहिता’ पड़ा।
इसके पश्चात, महर्षि याज्ञवल्क्य ने शुद्ध ज्ञान की प्राप्ति के लिए भगवान सूर्य (आदित्य) की घोर तपस्या की। सूर्य देव ने प्रसन्न होकर उन्हें जो विशुद्ध और नया ज्ञान प्रदान किया, वही ‘शुक्ल यजुर्वेद’ (आदित्य संप्रदाय) कहलाया।
प्रमुख भाष्यकार और संरक्षण परंपरा
वैदिक मंत्रों का गूढ़ अर्थ आम जनमानस तक पहुँचाने के लिए समय-समय पर कई महान विद्वानों ने इन संहिताओं पर अपने ‘भाष्य’ (Commentaries) लिखे हैं। यजुर्वेद के भाष्यकारों में आचार्य उवट (लगभग 1040 ईस्वी) और आचार्य महीधर (लगभग 1588 ईस्वी) के भाष्य अत्यंत उल्लेखनीय और प्रामाणिक माने जाते हैं। इनके द्वारा लिखे गए भाष्य यजुर्वेद के मंत्रों का यज्ञीय और व्यावहारिक कर्मों के साथ बहुत ही सटीक संबंध स्थापित करते हैं। इसके अतिरिक्त, दक्षिण भारत में शृंगेरी मठ के शंकराचार्यों की परंपरा में भी यजुर्वेद के भाष्यों और इसके दार्शनिक अध्ययन की एक अत्यंत समृद्ध और विद्वतापूर्ण विरासत रही है, जो आज भी वेदों के संरक्षण में अपना बहुमूल्य योगदान दे रही है।





































