मां ब्रह्मचारिणी की पूजा का महत्व और प्रिय भोग: 12 अक्टूबर 2026 को शारदीय नवरात्रि का दूसरा दिन है। इस दिन मां दुर्गा के दूसरे स्वरूप मां ब्रह्मचारिणी की पूजा-अर्चना की जाती है। देवी का यह स्वरूप तपस्या, संयम, साधना और दृढ़ संकल्प का प्रतीक माना जाता है। मां ब्रह्मचारिणी श्वेत वस्त्र धारण करती हैं। उनके दाहिने हाथ में जपमाला और बाएं हाथ में कमंडल सुशोभित रहता है। धार्मिक मान्यता है कि उनकी आराधना से साधक को धैर्य, आत्मबल और कठिन परिस्थितियों का सामना करने की शक्ति प्राप्त होती है। मां को मिश्री, शक्कर, सफेद मिठाई और गन्ने का रस अर्पित करना शुभ माना जाता है। पूजा के समय स्वच्छ और हल्के या सफेद रंग के वस्त्र धारण करें। माता की प्रतिमा या तस्वीर के सामने दीपक जलाकर रोली, अक्षत, चंदन, धूप और सफेद फूल अर्पित करें। इसके बाद मां को मिश्री, शक्कर या गन्ने के रस का भोग लगाएं। पूजा के दौरान श्रद्धापूर्वक मंत्र जाप करें और अंत में मां ब्रह्मचारिणी की आरती करके अपनी मनोकामना निवेदित करें।
मां ब्रह्मचारिणी के पूजा मंत्र और आरती: मां ब्रह्मचारिणी की उपासना के लिए मुख्य मंत्र है— ॐ देवी ब्रह्मचारिण्यै नमः। इसके साथ देवी की स्तुति का पाठ भी किया जा सकता है— या देवी सर्वभूतेषु ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥ पूजा में इस मंत्र का 108 बार जाप करने की परंपरा बताई गई है। जाप करते समय रुद्राक्ष की माला का उपयोग किया जा सकता है और मन को एकाग्र रखना चाहिए। मां की आरती में उनकी तपस्या, ज्ञान और भक्तों को सुख देने वाली शक्ति का गुणगान किया जाता है। आरती की शुरुआत इन पंक्तियों से होती है— जय अम्बे ब्रह्मचारिणी माता। जय चतुरानन प्रिय सुख दाता॥ ब्रह्मा जी के मन भाती हो। ज्ञान सभी को सिखलाती हो॥ ब्रह्म मन्त्र है जाप तुम्हारा। जिसको जपे सरल संसारा॥ जय गायत्री वेद की माता। जो जन जिस दिन तुम्हें ध्याता॥ कमी कोई रहने ना पाये। कोई भी दुख सहने न पाये॥ उसकी विरति रहे ठिकाने। जो तेरी महिमा को जाने॥ रुद्राक्ष की माला ले कर। जपे जो मन्त्र श्रद्धा दे कर॥ आलस छोड़ करे गुणगाना। मां तुम उसको सुख पहुंचाना॥ ब्रह्मचारिणी तेरो नाम। पूर्ण करो सब मेरे काम॥ भक्त तेरे चरणों का पुजारी। रखना लाज मेरी महतारी॥ आरती के बाद मां से परिवार की सुख-शांति और जीवन में संयम बनाए रखने की प्रार्थना की जाती है।
तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा और स्वरूप का महत्व: नवरात्रि के तीसरे दिन मां दुर्गा के तीसरे स्वरूप मां चंद्रघंटा की आराधना की जाती है। उनके मस्तक पर अर्धचंद्र के आकार का चिह्न सुशोभित रहता है, इसी कारण उन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है। उनका स्वरूप तेजस्वी और शक्तिशाली माना जाता है तथा उनका वाहन सिंह है। धार्मिक कथाओं में मां चंद्रघंटा को दुष्ट शक्तियों का दमन करने और भक्तों की रक्षा करने वाली देवी बताया गया है। उनकी दस भुजाओं में विभिन्न अस्त्र-शस्त्र और पूजन से जुड़ी वस्तुएं सुशोभित रहती हैं। उनके स्वरूप को साहस, निर्भयता और आत्मविश्वास से जोड़कर देखा जाता है। आध्यात्मिक मान्यता के अनुसार मां चंद्रघंटा का संबंध मणिपुर चक्र से भी माना जाता है। उनकी पूजा से भक्तों को कठिन परिस्थितियों का सामना करने का साहस और मन को स्थिर रखने की प्रेरणा मिलने की मान्यता है। मां चंद्रघंटा को चमेली के फूल विशेष रूप से प्रिय माने जाते हैं। इनके अभाव में पीले या लाल फूल अर्पित किए जा सकते हैं। भोग में दूध, शहद, खीर, पेड़े या दूध से बनी मिठाई चढ़ाने की परंपरा है। पूजा के दौरान धूप-दीप जलाकर रोली, अक्षत, चंदन और सिंदूर अर्पित करें तथा श्रद्धापूर्वक मंत्रों का जाप करें।
मां चंद्रघंटा के मंत्र और जाप की विधि: मां चंद्रघंटा की पूजा में सबसे प्रमुख मंत्र है— ॐ देवी चन्द्रघण्टायै नमः॥ इसके अतिरिक्त शक्ति की वंदना के लिए ऐं श्रीं शक्तयै नमः। मंत्र का जाप किया जा सकता है। देवी के ध्यान के लिए यह मंत्र भी महत्वपूर्ण माना जाता है— पिण्डज प्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकैर्युता। प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता॥ देवी स्तुति का पाठ इस प्रकार है— या देवी सर्वभूतेषु मां चन्द्रघण्टा रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥ इन मंत्रों का जाप 11, 21 या 108 बार किया जा सकता है। श्रद्धालु अपनी सुविधा के अनुसार लाल चंदन या रुद्राक्ष की माला का उपयोग कर सकते हैं। पूजा के लिए सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूजा स्थल को साफ कर माता की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। गंगाजल या शुद्ध जल छिड़ककर स्थान की शुद्धि करें, फिर दीपक और धूप जलाएं। मां को पुष्प, अक्षत, चंदन और सिंदूर अर्पित करें। पूजा के दौरान घंटी या शंख बजाने की भी परंपरा है। इसके बाद भोग लगाकर दुर्गा चालीसा या दुर्गा सप्तशती का पाठ किया जा सकता है। अंत में मां चंद्रघंटा की आरती करें और पूजा में हुई किसी भी भूल के लिए क्षमा मांगते हुए अपनी मनोकामना निवेदित करें।
नवरात्रि में माता के आगमन का वाहन और उसके संकेत: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार नवरात्रि में मां दुर्गा के आगमन का वाहन पर्व शुरू होने वाले दिन के आधार पर निर्धारित किया जाता है। इस संबंध में प्रचलित श्लोक है— शशि सूर्य गजारूढ़ा शनिभौमे तुरंगमे। गुरौशुक्रे च दोलायां बुधे नौका प्रकीर्तिता॥ इस मान्यता के अनुसार सोमवार या रविवार को नवरात्रि शुरू होने पर माता का वाहन हाथी, मंगलवार या शनिवार को घोड़ा, बुधवार को नाव और गुरुवार या शुक्रवार को पालकी माना जाता है। हाथी पर माता के आगमन को अच्छी वर्षा, समृद्धि और खुशहाली का संकेत माना जाता है। घोड़े पर आगमन को शासन-व्यवस्था में बदलाव, संघर्ष या प्राकृतिक चुनौतियों से जोड़कर देखा जाता है। नाव पर आगमन को कार्यों की सिद्धि और मनोकामनाओं की पूर्ति का प्रतीक माना जाता है, जबकि पालकी पर आगमन को स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों और अशांति से जोड़ने वाली मान्यता प्रचलित है। इस संदर्भ में एक अन्य श्लोक भी बताया जाता है— गजेश जलदा देवी क्षत्रभंग तुरंगमे। नौकायां कार्यसिद्धिः स्यात् दोलायां मरणं ध्रुवम्॥ इन श्लोकों की व्याख्या पारंपरिक धार्मिक मान्यताओं के अंतर्गत की जाती है। इस बार माता के हाथी पर आगमन को वर्षा और सुख-समृद्धि के अनुकूल संकेत के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, वाहन से जुड़े इन संकेतों को धार्मिक परंपरा और आस्था के संदर्भ में ही समझना चाहिए।
निष्कर्ष: श्रद्धा, संयम और विधिपूर्वक पूजा का महत्व: नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा तपस्या, धैर्य और आत्मसंयम की प्रेरणा देती है, जबकि तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की आराधना साहस, शक्ति और निर्भयता का प्रतीक मानी जाती है। दोनों देवियों के मंत्रों का जाप करते समय उच्चारण स्पष्ट रखें और मन को एकाग्र बनाए रखें। पूजा में उपलब्ध सामग्री के अनुसार फूल, दीप, धूप और भोग अर्पित किए जा सकते हैं। मंत्रों की संख्या अपनी श्रद्धा और सुविधा के अनुसार निर्धारित करें। मां दुर्गा के आगमन के वाहन से जुड़े संकेत भी धार्मिक परंपराओं का हिस्सा हैं। इनसे संबंधित शुभ-अशुभ संकेत ज्योतिषीय और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित हैं।














































