हर साल आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को दशहरा यानी विजयादशमी का पर्व पूरे देश में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन भगवान राम ने रावण का वध करके बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश दिया था। इस पर्व को देवी दुर्गा की महिषासुर पर विजय के प्रतीक के रूप में भी मनाया जाता है। दशहरा को दसरा के नाम से भी जाना जाता है, जबकि नेपाल में यह पर्व दशैं के रूप में मनाया जाता है। इस दिन शमी पूजा और अपराजिता पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। भगवान राम के साथ माता सीता, लक्ष्मण और हनुमान जी की आराधना करने की परंपरा है। धार्मिक विश्वास है कि विजयादशमी पर विधिपूर्वक पूजा करने से घर-परिवार में सुख-समृद्धि, खुशहाली और संपन्नता बनी रहती है। इसी कारण श्रद्धालु इस दिन शुभ मुहूर्त में पूजा-अर्चना करते हैं और बुराई पर अच्छाई की विजय का उत्सव मनाते हैं।
दशहरा 2026 पूजा का शुभ मुहूर्त और दशमी तिथि का समय: पंचांग के अनुसार, आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि 20 अक्टूबर 2026 को दोपहर 12:50 बजे शुरू होगी और 21 अक्टूबर 2026 को दोपहर 2:11 बजे समाप्त होगी। विजयादशमी पर पूजा के लिए विजय मुहूर्त दोपहर 1:59 बजे से 2:45 बजे तक रहेगा। वहीं, अपराह्न पूजा का समय दोपहर 1:14 बजे से 3:00 बजे तक निर्धारित है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, विजय मुहूर्त में पूजा और शुभ कार्य करना विशेष फलदायी माना जाता है। श्रद्धालु अपनी परंपरा के अनुसार इस समय भगवान राम, माता सीता, लक्ष्मण और हनुमान जी की पूजा कर सकते हैं। शमी और अपराजिता की पूजा भी विजयादशमी की प्रमुख धार्मिक परंपराओं में शामिल है। पूजा करते समय परिवार की सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना की जाती है।
रावण दहन का समय और पूजा की पूरी विधि: विजयादशमी के दिन सूर्यास्त के बाद रावण, कुंभकरण और मेघनाद के पुतलों का दहन किया जाता है। 20 अक्टूबर 2026 को देश के विभिन्न रामलीला मैदानों में शाम लगभग 5:45 बजे से रात 8:30 बजे के बीच रावण दहन के कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। हालांकि, अलग-अलग शहरों और रामलीला समितियों के कार्यक्रमों के अनुसार समय में अंतर हो सकता है। पूजा के लिए सुबह स्नान करने के बाद साफ-सुथरे वस्त्र पहनें और पूजा स्थल पर भगवान राम, माता सीता, लक्ष्मण तथा हनुमान जी की प्रतिमा स्थापित करें। इसके बाद विधि-विधान से पूजा करें और मां दुर्गा का भी पूजन करें। देवी-देवताओं को रोली, चंदन, अक्षत, पुष्प और नैवेद्य अर्पित करें। पूजा के बाद हवन और आरती करें तथा प्रसाद वितरित करें। शाम को अपने क्षेत्र में निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार रावण दहन में शामिल हों। आयोजन स्थल पर जाने से पहले स्थानीय समय की जानकारी अवश्य लें।
नवरात्रि के बाद जौ का क्या करें, जानें धार्मिक मान्यता: नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना के साथ जौ बोने की परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जौ को शुभता और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। नवरात्रि के 9 दिनों तक जौ की देखभाल और पूजा की जाती है। मान्यता है कि जौ का हरा-भरा, लंबा और सीधा बढ़ना आर्थिक समृद्धि तथा धन लाभ का संकेत देता है, जबकि काले, पीले या छोटे आकार के जौ को प्रतिकूल संकेत माना जाता है। हालांकि, ये धार्मिक मान्यताएं हैं। नवरात्रि समाप्त होने और दशमी तिथि आने पर श्रद्धालु जौ का सम्मानपूर्वक विसर्जन करते हैं। इसके लिए सबसे पहले देवी दुर्गा की विधिपूर्वक पूजा करें और कलश तथा जौ को दीपक दिखाएं। इसके बाद जाने-अनजाने में हुई गलतियों के लिए देवी मां से क्षमा प्रार्थना करें। फिर श्रद्धापूर्वक जौ को उठाकर किसी पवित्र नदी या साफ तालाब में प्रवाहित कर दें। ध्यान रखें कि विसर्जन ऐसी जगह किया जाए जहां जौ पर लोगों के पैर न पड़ें।
जौ विसर्जन के दूसरे तरीके और घर में रखने की परंपरा: यदि आसपास नदी या तालाब उपलब्ध नहीं है, तो जौ को पीपल या बरगद के पेड़ के नीचे सम्मानपूर्वक रखा जा सकता है। इन्हें घर के किसी बड़े गमले या बगीचे की मिट्टी में मिलाना भी एक विकल्प है, जिससे जौ मिट्टी में प्राकृतिक खाद के रूप में मिल जाएंगे। धार्मिक मान्यता के अनुसार, कुछ सुंदर और हरी-भरी जौ की पत्तियों को लाल कपड़े में बांधकर तिजोरी या धन रखने के स्थान पर रखने से धन-धान्य में बरकत बनी रहती है। कुछ लोग जौ को कलावे या मौली से बांधकर घर के मुख्य द्वार पर भी टांगते हैं। इसे घर में सकारात्मक ऊर्जा के संचार और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा की मान्यता से जोड़ा जाता है। कई क्षेत्रों में दशमी के दिन घर के पुरुष सदस्य और बच्चे जौ के कुछ तिनके कान के पीछे रखते हैं। लोकमान्यता के अनुसार, इसे अच्छे स्वास्थ्य और सौभाग्य से जोड़कर देखा जाता है। ये सभी परंपराएं अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में भिन्न हो सकती हैं।
जौ से जुड़ी सावधानियां और दशहरा परंपराओं का ध्यान: नवरात्रि के बाद जौ का विसर्जन करते समय धार्मिक आस्था और स्वच्छता दोनों का ध्यान रखना चाहिए। जौ को कूड़ेदान में फेंकने से बचें और ऐसी जगह पर न छोड़ें जहां लोगों के पैरों के नीचे वे कुचले जाएं। यदि नदी या तालाब में विसर्जन संभव हो, तो स्वच्छ और उपयुक्त स्थान चुनें। अन्यथा घर के गमले या बगीचे की मिट्टी में जौ को दबाना एक व्यावहारिक विकल्प है। तिजोरी में जौ रखने या मुख्य द्वार पर टांगने जैसी परंपराओं का पालन करने वाले लोग उन्हें साफ और सम्मानजनक तरीके से रखें। दशहरा पर भगवान राम, माता सीता, लक्ष्मण, हनुमान जी और मां दुर्गा की पूजा के साथ विजयादशमी का पर्व मनाया जाता है। रावण दहन बुराई पर अच्छाई की विजय का संदेश देता है, जबकि नवरात्रि के जौ का विसर्जन देवी की आराधना से जुड़ी परंपराओं का समापन माना जाता है।














































