मां कात्यायनी की पूजा का शुभ मुहूर्त: शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2026 को शारदीय नवरात्रि के छठे दिन मां दुर्गा के छठे स्वरूप मां कात्यायनी की आराधना की जाएगी। लखनऊ के पंचांग के अनुसार, इस दिन अभिजीत मुहूर्त सुबह 11 बजकर 28 मिनट से दोपहर 12 बजकर 14 मिनट तक रहेगा। गोधूलि मुहूर्त शाम 5 बजकर 13 मिनट से 6 बजकर 1 मिनट तक है, जबकि प्रदोष काल शाम 5 बजकर 37 मिनट से 7 बजकर 7 मिनट तक रहेगा। मां कात्यायनी की पूजा विशेष रूप से गोधूलि बेला में करना शुभ माना जाता है। अलग-अलग शहरों में सूर्योदय, सूर्यास्त और मुहूर्त के समय में अंतर हो सकता है, इसलिए अपने स्थानीय पंचांग के अनुसार समय का मिलान करना उचित रहेगा। नवरात्रि के छठे दिन माता की आराधना करने से जुड़ी धार्मिक मान्यता है कि भक्तों को साहस, आत्मविश्वास, धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा और कठिन परिस्थितियों का सामना करने की शक्ति प्राप्त होती है। मां कात्यायनी को आदिशक्ति का तेजस्वी स्वरूप माना जाता है। देवी के इस स्वरूप की पूजा में लाल और पीले रंग के वस्त्र, पीले फूल, रोली, अक्षत, धूप और दीप का विशेष महत्व बताया गया है। पूजा शुरू करने से पहले स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूजा स्थल को साफ करके मां की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। इसके बाद कलश और भगवान गणेश का स्मरण करें, घी का दीपक जलाएं और श्रद्धापूर्वक माता को फूल, अक्षत तथा रोली अर्पित करें। मां को शहद, मिठाई, हलवा-पूरी और शहद से बने व्यंजनों का भोग लगाने की परंपरा है। पीले फूल, हल्दी की गांठें और अन्य पूजन सामग्री भी श्रद्धानुसार अर्पित की जा सकती हैं। पूजा के दौरान मां कात्यायनी के मंत्रों का जाप करें, उनकी कथा सुनें और अंत में आरती करके परिवार की सुख-समृद्धि तथा कल्याण की प्रार्थना करें।
मां कात्यायनी के मंत्र और उनके जाप का महत्व: देवी कात्यायनी की उपासना में मंत्रों का विशेष स्थान है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, श्रद्धापूर्वक मंत्र जाप करने से मन एकाग्र होता है और साधक अपनी मनोकामना के लिए देवी से प्रार्थना करता है। विशेष रूप से विवाह में विलंब का सामना कर रही अविवाहित कन्याओं द्वारा मां कात्यायनी की आराधना किए जाने की परंपरा है। मान्यता है कि विवाह की कामना से इस मंत्र का नियमित जाप करने पर विवाह के अनुकूल अवसर प्राप्त होने की प्रार्थना की जाती है। पहला मंत्र है— “कात्यायनी महामाये, महायोगिन्यधीश्वरी। नन्दगोपसुतं देवी, पति मे कुरु ते नमः॥” इस मंत्र में देवी से मनोकामना पूरी करने और इच्छित जीवनसाथी की प्राप्ति के लिए प्रार्थना की जाती है। दूसरा मंत्र है— “ॐ देवी कात्यायन्यै नमः॥” यह मां कात्यायनी को समर्पित सरल मंत्र है, जिसका जाप भक्त पूजा के समय कर सकते हैं। तीसरा मंत्र है— “या देवी सर्वभूतेषु मां कात्यायनी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥” इसके माध्यम से देवी के उस स्वरूप को नमन किया जाता है, जो समस्त प्राणियों में शक्ति के रूप में विद्यमान माना जाता है। चौथा मंत्र है— “चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना। कात्यायनी शुभं दद्याद् देवी दानवघातिनि॥” इस मंत्र में सिंह पर विराजमान और दुष्ट शक्तियों का विनाश करने वाली देवी से शुभ फल देने की प्रार्थना की जाती है। विवाह की कामना से मां कात्यायनी की पूजा करने वाले भक्त इस मंत्र का भी जाप करते हैं— “कात्यायनी महामाये, महायोगिन्यधीश्वरी। नन्दगोपसुतं देवी, पति मे कुरु ते नमः॥” इसके अतिरिक्त “ॐ ह्रीं नमः॥” मंत्र का जाप भी श्रद्धानुसार किया जा सकता है। मंत्र जाप करते समय मन को शांत रखें और अपनी प्रार्थना स्पष्ट भाव से करें। धार्मिक मान्यताओं में मंत्र जाप को आस्था और साधना का माध्यम माना गया है; विवाह जैसे महत्वपूर्ण जीवन निर्णयों में आपसी सहमति, अनुकूलता और व्यावहारिक परिस्थितियों का महत्व भी बना रहता है।
मां कात्यायनी का ध्यान मंत्र और स्वरूप का वर्णन: नवरात्रि के छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा से पहले उनके ध्यान मंत्र का पाठ करने की परंपरा है। इस मंत्र में देवी के तेजस्वी स्वरूप, उनके आभूषणों, वाहन और भक्तों को अभय प्रदान करने वाली मुद्रा का वर्णन मिलता है। ध्यान मंत्र इस प्रकार है— “वन्दे वाञ्छित मनोरथार्थ चन्द्रार्धकृतशेखराम्। सिंहआरूढा चतुर्भुजा कात्यायनी यशस्विनीम्॥ स्वर्णवर्णा आज्ञाचक्र स्थिताम् षष्ठम दुर्गा त्रिनेत्राम्। वराभीत करां षगपदधरां कात्यायनसुतां भजामि॥ पटाम्बर परिधानां स्मेरमुखी नानालङ्कार भूषिताम्। मञ्जीर, हार, केयूर, किङ्किणि, रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥ प्रसन्नवदना पल्लवाधरां कान्त कपोलाम् तुगम् कुचाम्। कमनीयां लावण्यां त्रिवलीविभूषित निम्न नाभिम्॥” इस ध्यान मंत्र में मां को सिंह पर आरूढ़, चार भुजाओं वाली, स्वर्ण के समान तेजस्वी और अनेक आभूषणों से सुशोभित देवी के रूप में स्मरण किया गया है। मां कात्यायनी को आज्ञा चक्र से भी जोड़ा जाता है। योग परंपरा में आज्ञा चक्र को एकाग्रता, अंतर्दृष्टि और चेतना से संबंधित माना जाता है। नवरात्रि के इस दिन साधक देवी के चरणों में समर्पण का भाव रखते हुए ध्यान और पूजा करता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, माता की आराधना मन में साहस, अनुशासन और सकारात्मक संकल्प को मजबूत करने की प्रेरणा देती है। पूजा के दौरान मंत्र का उच्चारण अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार किया जा सकता है। यदि संस्कृत के किसी शब्द के उच्चारण में कठिनाई हो, तो उसके अर्थ को समझते हुए श्रद्धापूर्वक पाठ करना भी साधना का हिस्सा माना जाता है।
मां कात्यायनी की पौराणिक कथा और महिषासुर के वध का प्रसंग: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महर्षि कात्यायन देवी दुर्गा के परम भक्त थे। उनकी इच्छा थी कि आदिशक्ति उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लें। इस मनोकामना की पूर्ति के लिए उन्होंने लंबे समय तक कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर देवी भगवती ने उनकी इच्छा स्वीकार की और उनके यहां पुत्री के रूप में प्रकट हुईं। महर्षि कात्यायन के घर जन्म लेने के कारण देवी का नाम कात्यायनी पड़ा। कथा के अनुसार, उस समय महिषासुर नामक असुर का अत्याचार बढ़ता जा रहा था। अपनी शक्ति के घमंड में चूर महिषासुर ने देवताओं को पराजित कर स्वर्ग पर अधिकार कर लिया था। उसके अत्याचारों से परेशान होकर देवताओं ने भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महादेव से सहायता की प्रार्थना की। धार्मिक कथा में वर्णन मिलता है कि देवताओं के तेज से एक दिव्य शक्ति प्रकट हुई, जिसने महिषासुर का सामना किया। महर्षि कात्यायन ने इस देवी की विशेष आराधना की, इसलिए उनका नाम कात्यायनी प्रसिद्ध हुआ। आगे चलकर देवी ने महिषासुर का वध करके देवताओं को उसके आतंक से मुक्ति दिलाई। इसी कारण मां कात्यायनी को महिषासुर मर्दिनी के रूप में भी स्मरण किया जाता है। एक अन्य पौराणिक प्रसंग में बताया जाता है कि देवी के इस स्वरूप की उत्पत्ति आश्विन कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को हुई थी और महर्षि कात्यायन ने शुक्ल पक्ष की सप्तमी, अष्टमी तथा नवमी को उनकी पूजा की थी। दशमी के दिन देवी ने महिषासुर का वध किया। अलग-अलग धार्मिक परंपराओं में इस कथा के विवरण में भिन्नता मिल सकती है, लेकिन सभी में देवी की शक्ति और अधर्म पर धर्म की विजय का संदेश प्रमुख है। मां कात्यायनी से जुड़ी एक अन्य प्रसिद्ध मान्यता ब्रज की गोपियों की आराधना से संबंधित है। कहा जाता है कि श्रीकृष्ण को पति रूप में पाने की कामना से गोपियों ने यमुना तट पर देवी कात्यायनी की पूजा की थी। इसी परंपरा के कारण ब्रज क्षेत्र में मां कात्यायनी को विशेष श्रद्धा से पूजा जाता है। स्कन्द पुराण से जुड़ी परंपराओं में भी देवी के प्राकट्य और उनकी शक्ति का उल्लेख मिलता है। इन कथाओं का मूल संदेश भक्तिभाव, संकल्प, अन्याय के विरोध और धर्म की रक्षा से जुड़ा है।
मां कात्यायनी की पूजा का महत्व, विवाह की कामना और भोग की परंपरा: नवरात्रि के छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा को शक्ति, साहस और मनोकामना की पूर्ति की प्रार्थना से जोड़कर देखा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि अविवाहित कन्याएं विवाह में आ रही बाधाओं को दूर करने और योग्य जीवनसाथी की कामना से देवी की आराधना करती हैं। विवाह की इच्छा रखने वाले भक्त “कात्यायनी महामाये, महायोगिन्यधीश्वरी। नन्दगोपसुतं देवी, पति मे कुरु ते नमः॥” मंत्र का जाप करते हैं। इस मंत्र का उल्लेख श्रीकृष्ण को पति रूप में पाने की कामना से गोपियों द्वारा की गई कात्यायनी पूजा की परंपरा से भी जोड़ा जाता है। श्रद्धालु इस दिन व्रत रखकर, पूजा करके और मंत्र का जाप करके माता से अपने जीवन में शुभ अवसरों की प्रार्थना करते हैं। मां कात्यायनी को शहद प्रिय भोग के रूप में अर्पित करने की मान्यता है। इसके साथ हलवा-पूरी, मिठाई और शहद युक्त पान भी श्रद्धानुसार चढ़ाया जाता है। पूजा में लाल या पीले वस्त्र धारण करने, पीले फूल अर्पित करने और दीपक जलाने की परंपरा भी प्रचलित है। कुछ परिवारों में पूजा की विधि स्थानीय परंपरा और कुलाचार के अनुसार अलग हो सकती है। इस दिन भक्त देवी की कथा सुनते हैं, मंत्रों का जाप करते हैं और आरती के माध्यम से अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं। मां कात्यायनी की उपासना का आध्यात्मिक पक्ष भी महत्वपूर्ण माना जाता है। साधक देवी के सामने अपनी चिंताओं और इच्छाओं को रखते हुए आत्मविश्वास, विवेक और कठिन परिस्थितियों से लड़ने की शक्ति की कामना करता है। विवाह संबंधी मंत्रों का जाप आस्था का विषय है; इसके साथ योग्य जीवनसाथी की तलाश, परिवारों के बीच संवाद, आपसी सम्मान और सही निर्णय भी आवश्यक हैं। नवरात्रि का यह दिन भक्तों को अपनी मनोकामनाओं के साथ-साथ अपने आचरण, विचार और कर्मों को बेहतर बनाने का संकल्प लेने की प्रेरणा देता है।
मां कात्यायनी की आरती: पूजा और मंत्र जाप के बाद देवी की आरती करने की परंपरा है। आरती के समय दीपक जलाकर मां के चरणों में श्रद्धा अर्पित की जाती है और परिवार की सुख-शांति, समृद्धि तथा कल्याण की कामना की जाती है। मां कात्यायनी की विशेष आरती इस प्रकार है— “जय कात्यायनी मां, मैया जय कात्यायनी मां। उपमा रहित भवानी, दूं किसकी उपमा॥ मैया जय… गिरजापति शिव का तप, असुर रम्भ कीन्हां। वर-फल जन्म रम्भ गृह, महिषासुर लीन्हां॥ मैया जय… कर शशांक-शेखर तप, महिषासुर भारी। शासन कियो सुरन पर, बन अत्याचारी॥ मैया जय… त्रिनयन ब्रह्म शचीपति, पहुंचे, अच्युत गृह। महिषासुर वध हेतु, सुर कीन्हौं आग्रह॥ मैया जय… सुन पुकार देवन मुख, तेज हुआ मुखरित। जन्म लियो कात्यायनी, सुर-नर-मुनि के हित॥ मैया जय… अश्विन कृष्ण-चौथ पर, प्रकटी भवभामिनि। पूजे ऋषि कात्यायन, नाम कात्यायनी॥ मैया जय… अश्विन शुक्ल-दशमी को, महिषासुर मारा। नाम पड़ा रणचण्डी, मरणलोक न्यारा॥ मैया जय… दूजे कल्प संहारा, रूप भद्रकाली। तीजे कल्प में दुर्गा, मारा बलशाली॥ मैया जय… दीन्हौं पद पार्षद निज, जगतजननि माया। देवी संग महिषासुर, रूप बहुत भाया॥ मैया जय… उमा रमा ब्रह्माणी, सीता श्रीराधा। तुम सुर-मुनि मनमोहिनी, हरिये भव-बाधा॥ मैया जय…” आरती पूरी होने के बाद भक्त माता को प्रणाम करके अपनी मनोकामना व्यक्त कर सकते हैं। मां कात्यायनी की आराधना में श्रद्धा, संयम और सकारात्मक संकल्प को विशेष महत्व दिया जाता है। नवरात्रि के इस पावन अवसर पर मां से प्रार्थना करें कि वे सभी को साहस, विवेक, सद्बुद्धि और अपने कर्तव्यों का पालन करने की शक्ति प्रदान करें।













































