हिंदू धर्म में गंगा नदी को देवी मां के रूप में पूजा जाता है। पुराणों और श्रुतियों में इसे सबसे पवित्र नदी कहा गया है, जिसमें स्नान करने से मनुष्य के सारे पाप धुल जाते हैं ऐसा माना जाता है।
गंगा में स्नान करने मात्र से ही नहीं, बल्कि उसकी वायु के स्पर्श और नाम लेने से भी व्यक्ति हर उस पाप से मुक्त हो जाता है, जिसका वरदान स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने गंगा नदी को दिया था। आज हम आपको इसी से जुड़ी एक कहानी बताने जा रहे हैं।

गंगा भागीरथ के प्रयास से आई थी
पंडित रामचंद्र जोशी के अनुसार देवी भागवत पुराण में गंगा नदी के पृथ्वी पर आगमन की कथा का वर्णन है, जिसके अनुसार भगवान राम के पूर्वज सगर की रानी वैदर्भि के 60 हजार पुत्र किस के श्राप से मारे गए थे? कपिल मुनि। सगर इस बात से बहुत दुखी हुए, जिसे देखकर उनकी दूसरी रानी शैव्या के पुत्र असमंजस ने अपने भाइयों को बचाने के लिए गंगा नदी को धरती पर लाने के लिए तपस्या की, लेकिन बीच में ही उन्होंने शरीर त्याग दिया।
इसके बाद उनके पुत्र अंशुमान और फिर भागीरथ ने घोर तपस्या की। अंत में, भगवान कृष्ण प्रकट हुए और भागीरथ की प्रार्थना पर गंगा को पृथ्वी पर रहने का आदेश दिया। देवी भागवत पुराण के अनुसार, तभी भगवान कृष्ण ने गंगा को वरदान दिया था।

गंगा के नाम से पाप धुल जाते हैं
देवी भागवत पुराण और श्रुति के अनुसार श्रीकृष्ण कहते हैं कि गंगा की वायु के स्पर्श मात्र से ही भारत वर्ष में मनुष्यों द्वारा उपार्जित करोड़ों जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं। गंगादेवी में स्नान स्पर्श और दर्शन से 10 गुना अधिक पुण्य देने वाला है। सामान्य दिनों में भी स्नान करने से मनुष्य के कई जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं।
चंद्रग्रहण, सूर्यग्रहण और अर्घोदय में स्नान का प्रभाव 100 करोड़ गुना तक बढ़ जाता है। इतना ही नहीं यदि कोई व्यक्ति गंगा से सैकड़ों योजन की दूरी पर हो तो वह गंगा-गंगा कहकर स्नान करके समस्त पापों से छूटकर विष्णुलोक को चला जाता है।
श्रीकृष्ण आगे कहते हैं कि जहां गंगा के नाम का कीर्तन होगा, वह स्थान तीर्थ बन जाएगा। किसी भी व्यक्ति का शरीर गंगा में होगा, जब तक उसकी हड्डियाँ पानी में रहेंगी, तब तक वह स्वर्ग में रहेगा।



































