हिन्दू धर्म शास्त्रों के अनुसार भगवान शिव को त्रिदेवों में सबसे महत्वपूर्ण और शक्तिशाली माना जाता है। शास्त्रों में भगवान शिव के विभिन्न रूपों और लीलाओं का वर्णन किया गया है। शिव को अविनाशी कहा गया है।
भगवान शिव का स्वभाव रूद्र की तरह ही सरल और सौम्य है, इसलिए शिव का एक नाम भोलेनाथ और दूसरा रुद्र है। भगवान शिव को उनके भक्त महादेव, शंकर भगवान जैसे कई नामों से पुकारते हैं। भगवान शिव को नटराज भी कहा जाता है। शिव के नटराज रूप की कथा उनके आनंदमय तांडव से जुड़ी है। आइए जानते हैं पंडित इंद्रमणि घनस्याल से भगवान शिव के नटराज नाम का क्या महत्व है।

नटराज का अर्थ
पंडित जी बताते हैं कि आनंदमय तांडव में भगवान शिव नटराज का रूप धारण करते हैं, जिसमें भगवान शिव अपने बाएं पैर पर खड़े होते हैं और अपने दाहिने पैर को ऊपर उठाते हैं। वहीं नटराज अपना बायां हाथ पीछे और आगे का हाथ हाथी की तरह रखते हैं। भगवान शिव के नटराज रूप का अर्थ है कि भगवान शिव शक्तिशाली हैं, फिर भी वे शांत दिखाई देते हैं।
नटराज रूप की पौराणिक कथा
स्कंद पुराण के अनुसार वानप्रस्थ में तपस्वी साधु को अपनी तपस्या पर गर्व हो गया। जिसके कारण वह सभी मनुष्यों को हीन प्राणी समझता था। उनके व्यवहार को देखकर भगवान शिव ने उनके अहंकार को तोड़ने का फैसला किया। इसके बाद भगवान शिव भिखारी के रूप में उन साधुओं के आश्रम पहुंचे। साधुओं को यह अहंकार था कि यह संसार केवल संतों पर आधारित है। वह भी ईश्वर को नहीं समझ पाया। लेकिन भगवान शिव ने अपने तर्क से उन सभी साधुओं को गलत साबित कर दिया, जिससे वे सभी क्रोधित हो गए और भगवान शिव को दंड देने की योजना बनाई।
यह देखकर भगवान शिव ने एक अनोखा रूप धारण किया। भगवान शिव ने नृत्य मुद्रा में आकर राक्षसों और सांपों का वध किया। शिव के इस रूप को नटराज कहा जाता है। शिव का ऐसा रूप देखकर सभी साधु डर गए और उनका अहंकार टूट गया। साधुओं ने भगवान शिव से क्षमा मांगी। इसके बाद भगवान शिव के नटराज रूप की पूजा की जाने लगी।





























