सनातन धर्म में कई ऐसे पवित्र ग्रंथ है जिसमें मनुष्य जीवन और ज्ञान से जुड़ी बातों का उल्लेख किया गया है इन्हीं में से एक है श्रीमद्भागवत गीता। जिसमें भगवान श्रीकृष्ण के उपदेशों का वर्णन मिलता है।
महाभारत युद्ध के दौरान भगवान कृष्ण ने अर्जुन को जो उपदेश दिए थे उसे ही गीता का उपदेश कहा गया है, मान्यता है कि ये उपदेश मनुष्य जीवन को सही मार्ग दिखाने का कार्म करते है।

जो भी व्यक्ति इन उपदेशों को अपने जीवन में उतार लेता है वह सुखी और सफल जीवन जीता है, आपको बता दें कि इस पवित्र ग्रंथ में धर्म, प्रेम और कर्म का पाठ पढ़ाया गया है, श्रीमद्भागवत गीता में बताया गया है कि व्यक्ति का क्रोध कब पुण्य के समान हो जाता है, तो आज हम इसी पर चर्चा कर रहे हैं, तो आइए जानते है।

जानिए क्रोध कब बनता है पुण्य-
श्रीमद्भागवत गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं कि क्रोध तब पुण्य के समान हो जाता है जब वह धर्म और मर्यादा के लिए किया जाए, और सहनशीलता तब पाप बन जाती है जब वह धर्म और मर्यादा को बचा न पाएं। गीता में वर्णित है कि मनुष्य नहीं बल्कि उसके कर्म अच्छे और बुरे होते है और कर्मों के अनुसार ही व्यक्ति को अपने जीवन में फल की प्राप्ति होती है।

श्रीमद्भागवत गीता भगवान ने कहा है कि दूसरे के कर्तव्य का पालन करने से भय होता है और स्वधर्म में मरना भी बेहतर माना जाता है यानी मनुष्य को कभी किसी दूसरे की नकल नहीं करनी चाहिए बल्कि स्वधर्म को पहचाननाा बेहतर होता है, ऐसे में अगर कोई व्यक्ति किसी दूसरे का अनुसरण करता है तो उसके मन में भय पैदा हो सकता है। ऐसे में इस डर से मुक्ति का एक ही मार्ग श्रीकृष्ण भगवान ने बताया है जिसके अनुसार मनुष्य को अपना स्वधर्म पहचानना और उसी पर जीना चाहिए।





































