ज्योतिषाचार्य पं.अविनाश मिश्र शास्त्री (चित्रकूटधाम)
“सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज” —
श्रीकृष्ण केवल योगेश्वर नहीं, वरन् संपूर्ण जीवन-कला के आचार्य भी हैं। वे लीला, शौर्य, सौंदर्य और संस्कृति के समन्वय का जीवंत प्रतीक हैं।
जब श्रीकृष्ण ने आवंतिपुर (उज्जयिनी) के महर्षि सांदीपनि के आश्रम में शिक्षा ग्रहण हेतु प्रवेश किया, तब वे मात्र ६४ दिन वहाँ ठहरे। और उन्हीं ६४ दिनों में उन्होंने ६४ कलाओं का सम्पूर्ण अभ्यास कर लिया — जो यह स्पष्ट करता है कि वे केवल ब्रह्मस्वरूप ही नहीं, अपितु मानव रूप में पूर्णता के आदर्श भी हैं।
️चौंसठ कलाएँ क्या हैं-
ये केवल कलाएँ नहीं, अपितु मानव जीवन की विविध पूर्णताएँ हैं — जिनमें संगीत, शिल्प, अभिनय, विज्ञान, मंत्र-तंत्र, भोजन-वस्त्र निर्माण, नीति और युक्ति तक सब कुछ समाहित है। इन कलाओं में पारंगत होना मनुष्य को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — चारों पुरुषार्थों की योग्यता प्रदान करता है।
️भगवान श्रीकृष्ण जिन ६४ कलाओं में निष्णात थे, उनका संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत है-
१। नृत्यकला २। वाद्य वादन ३। गायन विद्या ४। अभिनय व नाट्य ५। इंद्रजाल विद्या ६। आख्यान-रचना ७। गंधद्रव्य निर्माण ८। पुष्पाभरण संयोजन ९। बेताल-विद्या १०। बालक्रीड़ा ११। विजय-प्राप्ति की विद्या
१२। मन्त्र प्रयोग १३। शकुन-विचार १४। रत्न-छेदन १५। यन्त्र-रचना १६। सांकेतिक भाषा १७। जल का नियमन १८। बेल-बूटे बनाना १९। पूजनोपहार सज्जा २०। पुष्प-शयन रचना २१। पक्षी भाषा अनुकरण २२। वृक्ष चिकित्सा २३। पशु-पक्षी युद्धकला २४। उच्चाटन प्रयोग
२५। गृह निर्माण २६। दरी-गलीचा निर्माण २७। बढ़ईकला २८। बेंत एवं आसन निर्माण २९। व्यंजन निर्माण ३०। हस्त-कौशल ३१। वेष परिवर्तन ३२। पेय निर्माण ३३। द्यूत-क्रीड़ा ३४। छन्द-ज्ञान ३५। वस्त्र विलोप कला ३६। आकर्षण विद्या ३७। वस्त्राभूषण निर्माण
३८। पुष्पमाला निर्माण ३९। तांत्रिक प्रयोग ४०। पुष्प चूड़ामणि सज्जा ४१। कठपुतली निर्माण ४२। मूर्ति निर्माण ४३। पहेली समाधान ४४। सिलाई, कसीदाकारी ४५। केश विन्यास ४६। मनोविचार जानना ४७। भाषाओं का ज्ञान ४८। सांकेतिक लेखन ४९। रत्न-परीक्षण ५०। धातु निर्माण५१। मणियों के रंग की पहचान ५२। खनिज की पहचान ५३। चित्रकला ५४। वस्त्र व अंगों का रंजन
५५। शयन सज्जा ५६। मणियों से फर्श सज्जा ५७। कूटनीति ५८। ग्रंथ-पाठन कौशल ५९। नवीन रचनात्मकता ६०। समस्यापूर्ति ६१। कोश-ज्ञान ६२। मन में पदपूर्ति६३। युक्तिपूर्वक कार्यसिद्धि६४। कर्णाभूषण निर्माण चौंसठ कलाएँ भारतीय संस्कृति का दिव्य आधार हैं —
ये जीवन को केवल आनंदमय ही नहीं, अपितु आध्यात्मिक रूप से परिपूर्ण बनाती हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने इन कलाओं में पारंगत होकर यह प्रदर्शित किया कि मनुष्य को केवल ज्ञानी ही नहीं, कलामय भी होना चाहिए
विविधता में पूर्णता — यही है श्रीकृष्ण का कला-दर्शन!
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