परमाणु नीति: North Korea ने अपने परमाणु नीति कानून के अनुच्छेद 3 को संशोधित किया है। अब किम जोंग-उन के नेतृत्व पर संकट आने पर परमाणु हमला होगा। यदि दुश्मन ताकतें शीर्ष नेतृत्व को निशाना बनाती हैं तो सेना पलटवार करेगी। यह संशोधन 22 मार्च को प्योंगयांग में सुप्रीम पीपल्स असेंबली में हुआ। इस ऐतिहासिक बदलाव का उद्देश्य देश के सर्वोच्च नेता की रक्षा करना है।
नेतृत्व का डर: प्रोफेसर आंद्रेई लैंकोव के अनुसार उत्तर कोरिया अब बहुत डरा हुआ है। अमेरिका-इजरायल के ‘डीकैपिटेशन’ हमलों की क्षमता देखकर प्योंगयांग में चिंता बढ़ी है। ईरान के नेतृत्व का एक बड़ा हिस्सा अचानक खत्म होना उनके लिए चेतावनी है। अब प्योंगयांग ने इसे संविधान में शामिल कर अधिक जोर दिया है। किसी भी युद्ध की शुरुआत में नेतृत्व खत्म होना निर्णायक हो सकता है।
स्वचालित हमला: संशोधन के बाद अब कमांड सिस्टम पर खतरा आते ही हमला शुरू होगा। यह हमला बिना किसी मानवीय आदेश के स्वचालित और तुरंत किया जाएगा। दक्षिण कोरिया की खुफिया एजेंसी NIS ने सरकारी अधिकारियों को इसकी ब्रीफिंग दी। किम जोंग-उन ने अपनी अनुपस्थिति में भी जवाबी कार्रवाई सुनिश्चित कर दी है। परमाणु बलों को अब संवैधानिक रूप से जवाबी हमले का अधिकार प्राप्त है।
निगरानी का खतरा: प्योंगयांग की सबसे बड़ी चिंता वर्तमान में सैटेलाइट निगरानी तकनीक बनी हुई है। आधुनिक सैटेलाइट से मिलने वाली सटीक जानकारी किम के लिए बड़ा खतरा है। हालांकि, उत्तर कोरिया की इंट्रानेट प्रणाली पर सरकार का बहुत कड़ा नियंत्रण है। दुश्मन देशों के लिए यहां डिजिटल सेंधमारी करना एक बड़ी चुनौती साबित होगी। उनकी चिंताएं बेबुनियाद नहीं हैं क्योंकि सैटेलाइट तकनीक बहुत उन्नत है।
सेना की वफादारी: उत्तर कोरिया की सेना अपने सर्वोच्च नेता के प्रति पूरी तरह वफादार है। किसी भी हमले की स्थिति में वे जवाबी आदेशों का सख्ती से पालन करेंगे। प्रोफेसर लैंकोव का मानना है कि दक्षिण कोरिया से हमले की संभावना नहीं है। इसलिए कोई भी जवाबी परमाणु कार्रवाई सीधे United States को निशाना बनाएगी। सेना के जवान किम जोंग-उन के लिए किसी भी हद तक जाएंगे।
बढ़ता तनाव: कोरियाई प्रायद्वीप में स्थिति लगातार तनावपूर्ण और युद्ध जैसी बनी हुई है। उत्तर कोरिया ने अपनी नई हॉवित्जर तोपों से सियोल को धमकी दी है। यह तोपखाना सीमा के बेहद करीब तैनात किया जाना एक बड़ा सैन्य कदम है। दोनों देशों के बीच शांति संधि न होने से खतरा हमेशा बना रहता है। फिलहाल पूरा क्षेत्र परमाणु युद्ध की आशंका के साये में जी रहा है।



































