उत्तर प्रदेश में चुनावी बिसात अब PDA (Pichhda, Dalit, Alpsankhyak) के इर्द-गिर्द सिमटती नजर आ रही है। अखिलेश यादव का हालिया बयान इसी रणनीति का हिस्सा है। मायावती द्वारा सपा पर ‘दलित विरोधी’ होने के आरोपों का जवाब देते हुए अखिलेश ने बहुत नपे-तुले अंदाज में 2019 के गठबंधन की याद दिलाई।
मायावती और सपा के रिश्तों की हकीकत (Relationship with BSP)
जब पत्रकारों ने अखिलेश से पूछा कि मायावती उन्हें दलितों का हितैषी नहीं मानतीं, तो उन्होंने बेहद रणनीतिक जवाब दिया। उन्होंने कहा, “हमारे और मायावती जी के संबंध 2019 में रहे हैं और हम आज भी उनके समाज के लिए लड़ रहे हैं।” यह बयान दर्शाता है कि अखिलेश यादव अभी भी Dalit Vote Bank को साधने के लिए बसपा के प्रति नरम रुख अपनाए हुए हैं। उन्होंने दावा किया कि बसपा के बाद अगर किसी ने बाबा साहेब की सबसे ज्यादा प्रतिमाएं लगवाई हैं, तो वह समाजवादी पार्टी ही है।
बीजेपी का ‘दिखावा’ बनाम सपा की ‘लड़ाई’ (Political Showmanship vs. Ideological Battle)
अखिलेश यादव का मानना है कि बीजेपी अब चुनाव नजदीक देख ‘छतरी’ जैसे प्रतीकात्मक कार्यों में जुट गई है। जबकि सपा का PDA फार्मूला एक ठोस वैचारिक लड़ाई है। उनका तर्क है कि बीजेपी ने संस्थानों का निजीकरण (Privatization) करके दलितों के रोजगार और आरक्षण को खत्म कर दिया है।
निष्कर्ष (Conclusion)
अखिलेश यादव का यह रुख स्पष्ट करता है कि आगामी लोकसभा या विधानसभा चुनावों में वे दलित वोटों को बसपा के पाले से अपनी ओर खींचने की पुरजोर कोशिश करेंगे। अंबेडकर प्रतिमा पर छतरी का मुद्दा केवल एक प्रतीक है, असली लड़ाई Socio-Economic Justice और वोट बैंक की हिस्सेदारी की है। उत्तर प्रदेश की जनता अब इस प्रतीकों की राजनीति और असल हक की लड़ाई के बीच अपना फैसला सुनाएगी।



































