ईरान का 10-सूत्रीय प्रस्ताव और उसकी कठोर शर्तें शांति वार्ता की औपचारिक शुरुआत से पहले ही ईरान ने अपना ’10-सूत्रीय शांति प्रस्ताव’ (10-Point Peace Proposal) सामने रख दिया है। ईरान की मुख्य मांगों में लेबनान के खिलाफ इजरायली सैन्य कार्रवाइयों को तुरंत रोकना और अमेरिका द्वारा रोकी गई ईरानी संपत्तियों (Frozen Assets) की बहाली शामिल है। हालांकि ट्रंप ने पहले इस प्रस्ताव को “बातचीत का व्यावहारिक ढांचा” कहा था, लेकिन वार्ता की मेज पर आने से पहले दोनों पक्षों के बीच अविश्वास की खाई और चौड़ी होती दिख रही है।
अविश्वास का माहौल: “मंशा अच्छी है, पर भरोसा नहीं” इस्लामाबाद पहुँचते ही ईरानी नेता क़लीबाफ़ ने अमेरिका के पिछले रिकॉर्ड पर सवाल उठाते हुए कहा कि उनके साथ बातचीत का अनुभव हमेशा “टूटे वादों” का रहा है। वहीं, अमेरिकी पक्ष से जेडी वैंस ने भी चेतावनी दी है कि यदि ईरान ने ‘धोखा’ देने की कोशिश की, तो अमेरिका का रुख बेहद सख्त होगा। यह “सद्भावना बनाम अविश्वास” (Goodwill vs Distrust) की लड़ाई इस वार्ता को दुनिया की सबसे जटिल कूटनीतिक प्रक्रिया बनाती है।
पाकिस्तान की भूमिका और मध्यस्थता का भार पाकिस्तान इस वार्ता में एक महत्वपूर्ण ‘Mediator’ (मध्यस्थ) की भूमिका निभा रहा है। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ, सेना प्रमुख आसिम मुनीर और विदेश मंत्री इशाक डार की मौजूदगी यह दर्शाती है कि पाकिस्तान इस क्षेत्र में स्थिरता लाने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा रहा है। डार ने उम्मीद जताई है कि यह वार्ता एक ‘स्थायी और टिकाऊ समाधान’ (Sustainable Solution) की ओर ले जाएगी।
निष्कर्ष: भविष्य का फैसला यह वार्ता ऐसे समय में हो रही है जब एक छोटी सी चूक भी युद्ध की लपटों को भड़का सकती है। जहाँ एक तरफ ईरान अपनी संप्रभुता और संपत्तियों की रक्षा करना चाहता है, वहीं ट्रंप प्रशासन का लक्ष्य परमाणु कार्यक्रम पर लगाम लगाना और वैश्विक व्यापार मार्ग को सुरक्षित करना है। आने वाले कुछ घंटे यह तय करेंगे कि जेडी वैंस और ईरानी प्रतिनिधिमंडल किसी समझौते पर पहुँच पाते हैं या यह वार्ता भी इतिहास के “टूटे वादों” का हिस्सा बन जाएगी।



































