राजधानी में सन्नाटा: कूटनीति का सबसे बड़ा घेरा जब अमेरिका और ईरान जैसे दो कट्टर दुश्मन किसी तीसरे देश की धरती पर मिलते हैं, तो सुरक्षा की जिम्मेदारी ऐतिहासिक हो जाती है। पाकिस्तान ने इस चुनौती को स्वीकार करते हुए इस्लामाबाद और रावलपिंडी में पूर्ण लॉकडाउन (Full Lockdown) लागू कर दिया है। शहर की सड़कें जो कभी शोर-शराबे से भरी रहती थीं, आज वहां केवल सेना के बख्तरबंद वाहन और सुरक्षाकर्मियों के बूटों की आवाज सुनाई दे रही है।
सुरक्षा का अभूतपूर्व ढांचा (Security Infrastructure) पाकिस्तान सरकार ने इस वार्ता को सुरक्षित बनाने के लिए किसी भी प्रकार की कसर नहीं छोड़ी है:
- 10,000+ सुरक्षाकर्मी: पाकिस्तान रेंजर्स और सेना के जवान चप्पे-चप्पे पर तैनात हैं।
- संपूर्ण बंदी: स्कूल, कॉलेज, बाजार और दफ्तरों को पूरी तरह बंद कर दिया गया है ताकि किसी भी बाहरी हस्तक्षेप या विरोध प्रदर्शन को रोका जा सके।
- नो-फ्लाई ज़ोन: सुरक्षा एजेंसियों ने संबंधित क्षेत्रों में हवाई निगरानी बढ़ा दी है और आवाजाही को सीमित कर दिया है।
पाकिस्तान की भूमिका: मध्यस्थता का काँटों भरा ताज पाकिस्तान के लिए यह वार्ता उसकी अंतरराष्ट्रीय साख का सवाल है। एक तरफ अमेरिका की सैन्य धमकी है और दूसरी तरफ ईरान का अपना कड़ा रुख। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की सरकार के लिए चुनौती यह है कि वे इन दोनों पक्षों को वार्ता की मेज पर बनाए रखें। यदि यह वार्ता विफल होती है और ट्रंप अपनी सैन्य कार्रवाई की चेतावनी पर आगे बढ़ते हैं, तो इसका सबसे बड़ा असर पाकिस्तान और पूरे दक्षिण एशिया की स्थिरता पर पड़ेगा।
निष्कर्ष इस्लामाबाद की यह शांति वार्ता शांति की ओर एक कदम है या फिर एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध का शुरुआती बिंदु, यह अगले कुछ घंटों में तय हो जाएगा। ट्रंप की ‘सैन्य तैयारी’ और पाकिस्तान की ‘सुरक्षा मुस्तैदी’ के बीच, दुनिया एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहाँ गलती की कोई गुंजाइश नहीं है।



































