वार्ता की पूर्व शर्तें: ईरान का कड़ा रुख इस्लामाबाद पहुँचते ही ईरानी प्रतिनिधिमंडल ने अपनी प्राथमिकताओं को सार्वजनिक कर दिया है। संसद स्पीकर मोहम्मद बागेर गालिबाफ ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि शांति वार्ता तभी सार्थक होगी जब उनकी दो प्रमुख मांगें पूरी की जाएंगी। पहली शर्त लेबनान में इजरायली हमलों पर तुरंत रोक और स्थायी युद्धविराम (Ceasefire) है, जहाँ हिजबुल्लाह और इजरायली सेना के बीच भीषण गोलाबारी जारी है। दूसरी मांग अमेरिका द्वारा ब्लॉक की गई ईरानी संपत्तियों (Frozen Assets) की तत्काल रिहाई है। ईरान का मानना है कि उनकी अर्थव्यवस्था को बंधक बनाकर कोई भी न्यायपूर्ण समझौता नहीं किया जा सकता।
इजरायल-हिजबुल्लाह संघर्ष और वार्ता की जटिलता यह वार्ता ऐसे समय में हो रही है जब दक्षिणी लेबनान की सीमा पर बारूद की गंध कम नहीं हुई है। ईरान के लिए हिजबुल्लाह की सुरक्षा उसकी रणनीतिक जीत का हिस्सा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जेडी वेंस इजरायल को लेबनान में रुकने के लिए मजबूर नहीं कर पाते, तो गालिबाफ और उनका प्रतिनिधिमंडल बातचीत की मेज छोड़ सकता है। अमेरिका के लिए इजरायल को शांत करना और ईरान को संतुष्ट करना एक साथ संभव नहीं दिख रहा, जिससे यह वार्ता ‘डेडलॉक’ की ओर बढ़ती नजर आ रही है।
पाकिस्तान की धरती पर वैश्विक भविष्य का फैसला पाकिस्तान ने इस वार्ता के लिए जो सुरक्षा घेरा तैयार किया है, वह इसकी महत्ता को दर्शाता है। इस्लामाबाद आज दुनिया की ‘कूटनीतिक राजधानी’ बना हुआ है। यदि जेडी वेंस और गालिबाफ के बीच कोई सहमति बनती है, तो यह मध्य-पूर्व के लिए एक नए युग की शुरुआत होगी। लेकिन यदि 28 फरवरी के मिनाब हमले का जख्म और लेबनान का वर्तमान युद्ध बाधा बनते हैं, तो दुनिया को एक और भीषण सैन्य संघर्ष के लिए तैयार रहना होगा। ट्रंप का “वर्ल्ड्स मोस्ट पावरफुल रीसेट” का नारा इस वार्ता की विफलता के बाद हकीकत में बदल सकता है, जो वैश्विक शांति के लिए चिंता का विषय है।



































